Ssc special dictation #4

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अध्यक्ष जी, आप जानती हैं कि हिन्दुस्तान के हर बड़े महानगर और छोटे नगर में इसी
सिद्धांत पर बाजार बनाए गए हैं। मैं अपने गृहनगर की बात करती हूं। मैं अम्बाला छावनी से आती
हूं। वहां जाकर देखिए कि हमारे बाजारों के नाम क्या हैं - बज़ाजा बाजार, सर्राफा बाजार, कसेरा
बाजार, हलबाई बाजार, कवाड़ी बाजार, सौदागर बाजार। यह उनके नाम से पता चलता है। अगर
आपको कपड़ा खरीदना है तो बज़ाजा बाजार में जाइए, एक साथ आपको बीस दुकानें मिलेंगी।
बर्तन खरीदने हैं तो कसेरा बाजार जाइए, एक साथ पचास दुकानें मिलेंगी। सोने-चाँदी की चीजें
आपको सर्राफा बाजार में मिलेंगी। सारे प्रसाधन की सामग्री सौदागर बाजार में मिलेगी । एक जगह
जाकर अगर बीस दुकानें हैं तो किसी दुकानदार में यह हिम्मत नहीं है कि वह ग्राहक को लूट ले। वह
चीज अच्छी भी देगा और सस्ती भी देगा क्योंकि अगर आपको उसने सस्ती नहीं दी तो आप तुंरत
पांच मिनट में दूसरे दुकान में चले जाएंगे। अगर दूसरे दुकान में चीज अच्छी नहीं मिली, महंगी
मिली तो आप तीसरे दुकान में चले जाएंगे। इसलिए उसकी विवशता है कि वह चीज महंगी न बेचे।
वह चीज अच्छी बेचे, खराब न बेचे क्योंकि ग्राहक के पास चयन की गुंजाइश है, विकल्प है। मैं तो
इससे आगे कहना चाहती हूं कि जब हर जगह एक-सी चीज़, एक-सी सस्ती, एक-सी बढ़िया मिलती
है तो दुकानदार का अपना व्यवहार, इस पर आश्रित करता है कि दुकान चलती है कि नहीं चलती
है। हम और आप तो शॉरपिंग करने जाते रहे हैं। हम महिलाएं तो शॉपिंग करती ही हैं। इस बात का
बहुत ज्यादा असर पड़ता है कि अगर हर दुकान पर एक-सी चीज मिल रही है तो मीठा कौन
बोलता है, अच्छे से कौन बात करता है, अच्छा व्यवहार कौन रखता है, उसकी दुकान पर जाएं।
लेकिन जब आप इस तरह का एकाधिकारी बाजार खड़ा कर देते हैं जहां किसी तरह की कोई
गुंजाइश नहीं होती तो वह कभी भी उपभोक्ता के हित में नहीं हो पाता।
ये हमसे नाराज हुए, इन्होंने हमारे साथ बात करनी बंद कर दी। कल्याण जी हमारा
नमस्कार स्वीकार नहीं कर रहे। ये अपना ही कल्याण करना चाहते हैं, हम सब का नहीं करना
चाहते हैं। ये आपको जरूर किनारा लगाना चाहता था। हम भी किनारा लगाना चाहते हैं। हम
जितनी जल्दी चाहें, उनको हटाना चाहते हैं, लेकिन हटा नहीं पा रहे हैं । देश बचाने के लिए हमने
कहा कि जो बहुसंख्यक लोग हैं, जिनका रोजगार खेती है और एक यह खुदरा व्यापार है । मंत्री जी,
मैं शहर में रहा और गांव में भी रहा। मैं जब गांव में छुट्टियों में जाता था तो मुझे वह टोकरी वाली
फल लेकर आती हुई, सब्जी वाली दिखाई देती थी। सड़क पर अमरूद और आम हरे पत्ते के साथ
बिकते
दिखाई देते थे। लोगों ने चार करोड़ कहा है., बिलकुल गलत बात है। अपने देश में हम
हुए
गरीबों की संख्या नहीं पता कर पाए, इसलिए खुदरा व्यापार के लोगों की संख्या का भी हम ठीक से
पता नहीं लगा पाते। ये पांच करोड़ लोग हैं। ये रोज कमाते हैं, रोज उठते हैं और पेट की भूख का जो
पहिया है, उससे बंधे रहते हैं। ये जो बाजार है इसे आंका जरूर है, लेकिन सारे देश को मजबूत और
ताकतवर बनाने के लिए क्या किया? जब से बाजार आया है, तब से दो लाख 75 हजार किसानों ने
आत्महत्या कर ली।//583//
महोदया, मुझे याद है कि वर्ष 1989 या वर्ष 1990 की बात होगी, जब मैं पार्टी का
अध्यक्ष था, एक कैनेडियन टेलीविजन टीम नई दिल्ली आई थी। वह मुझसे भेंटवार्ता करने के
लिए मेरे अशोक रोड़ के कार्यालय में आई और आकर उन्होंने कहा कि आपका भारत के
लोकतंत्र का इतना अनुभव है, स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक का, हम आपसे जानना
चाहते हैं कि जहां दुनिया भर में जो भी विकासशील देश थे और उन्होंने साम्राज्यवाद से
मुक्ति पाने के बाद लोकतंत्र अपनाया, लेकिन अधिकांश देशों में लोकतंत्र किसी न किसी
प्रकार से विसर्जित हो गया। कहीं पर सैनिक शासन आ गया, कहीं पर और प्रकार का कोई
अधिनायकवादी शासन आ गया। अकेला आपका देश है कि जहां पर यह आज भी सजीव है,
आज भी सफल है और आज भी भविष्य अपना उसके आधार पर भी करने का निश्चय रखता
है, संकल्प करता है। इसका क्या कारण है? मैंने कहा मैं सोचता हूं तो मुझे एक ही बात
सूझती है और वह यह सूझती है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए सबसे बड़ा कोई गुण
चाहिए तो वह यह चाहिए कि एक विपरीत विचारधारा के बारे में भी सहिष्णुता का भाव
हो। मैं इस बात पर गर्व करता हूं कि हमारे यहां पर विपरीत विचारधारा के लिए या विचार
के लिए केबल सहिष्णुता का भाव नहीं होता है, आदर का भाव होता है और यह आदर का
उदाहरण के रूप में कहता हूं कि असहिष्णुता सबसे अधिक किसी क्षेत्र में होती है तो
वह धर्म 800 के क्षेत्र में होती है,
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अध्यक्ष जी, आप जानती हैं कि हिन्दुस्तान के हर बड़े महानगर और छोटे नगर में इसी
सिद्धांत पर बाजार बनाए गए हैं। मैं अपने गृहनगर की बात करती हूं। मैं अम्बाला छावनी से आती
हूं। वहां जाकर देखिए कि हमारे बाजारों के नाम क्या हैं - बज़ाजा बाजार, सर्राफा बाजार, कसेरा
बाजार, हलबाई बाजार, कवाड़ी बाजार, सौदागर बाजार। यह उनके नाम से पता चलता है। अगर
आपको कपड़ा खरीदना है तो बज़ाजा बाजार में जाइए, एक साथ आपको बीस दुकानें मिलेंगी।
बर्तन खरीदने हैं तो कसेरा बाजार जाइए, एक साथ पचास दुकानें मिलेंगी। सोने-चाँदी की चीजें
आपको सर्राफा बाजार में मिलेंगी। सारे प्रसाधन की सामग्री सौदागर बाजार में मिलेगी । एक जगह
जाकर अगर बीस दुकानें हैं तो किसी दुकानदार में यह हिम्मत नहीं है कि वह ग्राहक को लूट ले। वह
चीज अच्छी भी देगा और सस्ती भी देगा क्योंकि अगर आपको उसने सस्ती नहीं दी तो आप तुंरत
पांच मिनट में दूसरे दुकान में चले जाएंगे। अगर दूसरे दुकान में चीज अच्छी नहीं मिली, महंगी
मिली तो आप तीसरे दुकान में चले जाएंगे। इसलिए उसकी विवशता है कि वह चीज महंगी न बेचे।
वह चीज अच्छी बेचे, खराब न बेचे क्योंकि ग्राहक के पास चयन की गुंजाइश है, विकल्प है। मैं तो
इससे आगे कहना चाहती हूं कि जब हर जगह एक-सी चीज़, एक-सी सस्ती, एक-सी बढ़िया मिलती
है तो दुकानदार का अपना व्यवहार, इस पर आश्रित करता है कि दुकान चलती है कि नहीं चलती
है। हम और आप तो शॉरपिंग करने जाते रहे हैं। हम महिलाएं तो शॉपिंग करती ही हैं। इस बात का
बहुत ज्यादा असर पड़ता है कि अगर हर दुकान पर एक-सी चीज मिल रही है तो मीठा कौन
बोलता है, अच्छे से कौन बात करता है, अच्छा व्यवहार कौन रखता है, उसकी दुकान पर जाएं।
लेकिन जब आप इस तरह का एकाधिकारी बाजार खड़ा कर देते हैं जहां किसी तरह की कोई
गुंजाइश नहीं होती तो वह कभी भी उपभोक्ता के हित में नहीं हो पाता।
ये हमसे नाराज हुए, इन्होंने हमारे साथ बात करनी बंद कर दी। कल्याण जी हमारा
नमस्कार स्वीकार नहीं कर रहे। ये अपना ही कल्याण करना चाहते हैं, हम सब का नहीं करना
चाहते हैं। ये आपको जरूर किनारा लगाना चाहता था। हम भी किनारा लगाना चाहते हैं। हम
जितनी जल्दी चाहें, उनको हटाना चाहते हैं, लेकिन हटा नहीं पा रहे हैं । देश बचाने के लिए हमने
कहा कि जो बहुसंख्यक लोग हैं, जिनका रोजगार खेती है और एक यह खुदरा व्यापार है । मंत्री जी,
मैं शहर में रहा और गांव में भी रहा। मैं जब गांव में छुट्टियों में जाता था तो मुझे वह टोकरी वाली
फल लेकर आती हुई, सब्जी वाली दिखाई देती थी। सड़क पर अमरूद और आम हरे पत्ते के साथ
बिकते
दिखाई देते थे। लोगों ने चार करोड़ कहा है., बिलकुल गलत बात है। अपने देश में हम
हुए
गरीबों की संख्या नहीं पता कर पाए, इसलिए खुदरा व्यापार के लोगों की संख्या का भी हम ठीक से
पता नहीं लगा पाते। ये पांच करोड़ लोग हैं। ये रोज कमाते हैं, रोज उठते हैं और पेट की भूख का जो
पहिया है, उससे बंधे रहते हैं। ये जो बाजार है इसे आंका जरूर है, लेकिन सारे देश को मजबूत और
ताकतवर बनाने के लिए क्या किया? जब से बाजार आया है, तब से दो लाख 75 हजार किसानों ने
आत्महत्या कर ली।//583//
महोदया, मुझे याद है कि वर्ष 1989 या वर्ष 1990 की बात होगी, जब मैं पार्टी का
अध्यक्ष था, एक कैनेडियन टेलीविजन टीम नई दिल्ली आई थी। वह मुझसे भेंटवार्ता करने के
लिए मेरे अशोक रोड़ के कार्यालय में आई और आकर उन्होंने कहा कि आपका भारत के
लोकतंत्र का इतना अनुभव है, स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक का, हम आपसे जानना
चाहते हैं कि जहां दुनिया भर में जो भी विकासशील देश थे और उन्होंने साम्राज्यवाद से
मुक्ति पाने के बाद लोकतंत्र अपनाया, लेकिन अधिकांश देशों में लोकतंत्र किसी न किसी
प्रकार से विसर्जित हो गया। कहीं पर सैनिक शासन आ गया, कहीं पर और प्रकार का कोई
अधिनायकवादी शासन आ गया। अकेला आपका देश है कि जहां पर यह आज भी सजीव है,
आज भी सफल है और आज भी भविष्य अपना उसके आधार पर भी करने का निश्चय रखता
है, संकल्प करता है। इसका क्या कारण है? मैंने कहा मैं सोचता हूं तो मुझे एक ही बात
सूझती है और वह यह सूझती है कि लोकतंत्र की सफलता के लिए सबसे बड़ा कोई गुण
चाहिए तो वह यह चाहिए कि एक विपरीत विचारधारा के बारे में भी सहिष्णुता का भाव
हो। मैं इस बात पर गर्व करता हूं कि हमारे यहां पर विपरीत विचारधारा के लिए या विचार
के लिए केबल सहिष्णुता का भाव नहीं होता है, आदर का भाव होता है और यह आदर का
उदाहरण के रूप में कहता हूं कि असहिष्णुता सबसे अधिक किसी क्षेत्र में होती है तो
वह धर्म 800 के क्षेत्र में होती है, पंथ के, मजहब के, इन क्षेत्रों में होती है। उस क्षेत्र में दुनिया भर
में तो बैज्ञानिक को भी न्यायिक जांच के सामने लाया गया कि तुम जो बात कह रहे हो, वह
मैं
भाव,
धर्म ग्रन्थ में नहीं लिखी है, इसीलिए तुम्हारा परीक्षण होगा। हिन्दुस्तान में परीक्षण तो
छोड़िये, एक ऐसा बिचारक था, जिस विचारक ने कहा कि ये जो आपको कहते हैं कि अच्छा
आचरण करो तो अगले जन्म में उसका तुमको पुण्य मिलेगा । ये पंडित बेकार बात करते हैं,
आप उनकी फिक्र मत करो और आप खूब खाओ, पियो और मौज करो।
आज यहां इस अवसर पर हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू,
सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया और मौलाना आज़ाद से लेकर
अनेक और बड़े-बड़े नेता हैं जिन्होंने संघर्ष किया, कुर्बानियां की और संघर्ष करके ही आज
हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के 60 साल मना रहे हैं | इन 60 बरसो मे हमने न केवल लोकतंत्र को सार्थक किया है साथ ही सम्पूर्ण विश्व को भी लोकतंत्र की एक नई परिभाषा दी है। भारत जब आज अपनी सभय्ता संस्कृति के साथ नए युग में भी अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर रहा है जो इसके पूर्वजों की किरपा का ही फल होगा।1007words

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