07-05-2020 editorial


भारत में अब तक लगभग 135 ट्रेनों में एक लाख से ज्यादा लोग अपने घर या गृह राज्य लौट चुके हैं, लेकिन यह लौटने की शुरुआत भर है। उत्तर प्रदेश और बिहार में ही करीब 40 लाख लोगों के लौटने का अनुमान है, मगर कुछ हजार लोगों के लौटते ही उन राज्यों की सरकारों पर जोर आने लगा है, जिन्हें मजदूरों का राज्य कहा जाता है। पश्चिम बंगाल सरकार ने तो मुंबई से आने के लिए तैयार अपने लोगों को निराश कर दिया। महाराष्ट्र में मंजूरी मिलने के बाद जब करीब 2,400 लोग बंगाल लौटने को तैयार थे, तब अचानक कदम पीछे खींचने की सराहना नहीं की जा सकती। उचित यही होगा कि लोगों के दबाव और लोकलाज के आगे पश्चिम बंगाल सरकार झुक जाए। बिहार सरकार की नीति भी कुछ बदलती दिख रही है, वह अब केवल बहुत जरूरतमंद लोगों की ही वापसी के पक्ष में है और इसे पूरी तरह से गलत भी नहीं कहा जा सकता। मजदूरों और अपने फंसे हुए लोगों की वापसी का दबाव उत्तर प्रदेश शुरू से ही आगे बढ़कर झेल रहा है और इसके लिए उसकी सराहना होनी ही चाहिए। फिर भी एक हलचल है कि कब तक और कितने लोग लौटेंगे? घर वापसी शब्द सुनने में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन कोरोना के समय में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में अगर आधे ही लोग लौटे, तब भी 20 लाख लोगों को करीब 14 या 21 दिन तक क्वारंटीन में रखना किस हद तक संभव होगा? श्रमिकों के राज्यों के अधिकारियों और नेताओं के मन में जो शंका है, वह बता रही है कि ये राज्य लाखों लोगों की तिमारदारी के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। फंसे हुए लोगों की वापसी के मोर्चे पर ये राज्य जितनी दृढ़ता के साथ चलेंगे, उतना अच्छा होगा। जिन सक्षम राज्यों से लोग लौट रहे हैं, उनसे श्रमिकों के राज्यों को तार्किक अपेक्षा है कि कोरोना जांच के बाद ही किसी को लौटाया जाए। 

इस मोर्चे पर कर्नाटक के फैसले काबिल-ए-तारीफ हैं, जिनसे दूसरे सक्षम राज्यों को सीखना चाहिए। पांच दिन तक कर्नाटक से बिहार के लिए दो-दो रेलगाड़ियां रोज चलने वाली थीं, लेकिन आखिरी मौके पर कर्नाटक सरकार पीछे हट गई। कर्नाटक के उद्यमियों की आशंका बिल्कुल सही है कि मजदूर लौट गए, तो वे जल्दी नहीं लौटेंगे। उद्यमियों ने सरकार से यह मांग की है कि वह निर्माण-कार्य शुरू करने की मंजूरी दे, ताकि मजदूरों को रुकने का मजबूत बहाना मिले। बेशक, बड़ी संख्या ऐसे मजदूरों की है, जो काम मिलने पर रुक जाएंगे। मजदूरों की वापसी रोकने के फैसले के साथ ही कर्नाटक सरकार ने कमजोर वर्गों, मजदूरों, छोटे कारोबारियों के लिए 1,610 करोड़ रुपये के पैकेज की भी घोषणा की है।
 
आज अपेक्षाकृत सक्षम राज्यों की भूमिका बहुत बढ़ गई है। अभी तो करीब चार लाख लोग विदेश से लौटने वाले हैं। जहां-जहां वे लौटेंगे, उनकी भी सेवा और जांच में सरकारों को जुट जाना है। यह अपने लोगों की देखभाल का समय है। अच्छे दिनों में काम या फायदे लेकर बुरे दिनों में मजदूरों को गाड़ी पकड़ा देना नैतिक रूप से भी सही नहीं है। जहां तक संभव हो, मजदूरों को स्पष्ट पुनर्वास-पुनरोद्धार नीतियों से रोकना चाहिए और उनमें भय या रोष बढ़ाने से बचना चाहिए। तमाम राज्यों और उनकी सरकारों को ध्यान रखना चाहिए, उनके व्यवहार व कार्य-कुशलता पर पूरे देश की नजर है।
कोरोना वायरस के संक्रमण से उपजी समस्याओं ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि किसी के लिए भी यह कहना कठिन है कि कल को कैसी परिस्थितियां निर्मित होंगी? ऐसे में बेहतर यही है कि परिस्थितियों के हिसाब से फैसले लिए जाएं। दुनिया भर में सरकारें ऐसा ही कर रही हैं। भारत सरकार भी ऐसा ही कर रही है। उसके साथ-साथ राज्य सरकारें भी बदलते हालात के हिसाब से कदम उठा रही हैं। कांग्रेस नाजुक परिस्थितियों से अपरिचित नहीं हो सकती, लेकिन शायद उसने तय कर लिया है कि उसे हर दिन इस या उस बहाने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़े करना है और इस क्रम में कुछ टेढ़े-मेढ़े सवाल भी पूछने हैं।
गत दिवस उसने यह सवाल पूछा कि सरकार बताए कि 17 मई के बाद लॉकडाउन जारी रहेगा या खत्म होगा? नि:संदेह केंद्र सरकार के नीति-नियंता इस पर माथापच्ची कर ही रहे होंगे, लेकिन आखिर वे आज के दिन यह कैसे कह सकते हैं कि दस दिन बाद क्या हालात बनेंगे? चूंकि संकट बड़ा है इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों के अथक प्रयासों के बाद भी समस्याओं का अंबार कम होता नहीं दिखता, लेकिन कांग्रेस ऐसे व्यवहार कर रही है जैसे सब कुछ सामान्य हो।
यह सही है कि कांग्रेस केंद्र सरकार को कोसने के साथ तमाम सुझाव भी दे रही है, लेकिन ऐसा करते समय वह इस पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझ रही कि आखिर उसके हिसाब से सबको राहत, रियायत और पैकेज देने के लिए धन का प्रबंध कैसे होगा? क्या पैसे पेड़ पर उगने लगे हैं? कांग्रेस को केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते पर रोक भी स्वीकार नहीं और वह यह भी चाह रही है कि सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए किसी तरह के टैक्स का भी सहारा न ले। क्या यह उचित नहीं होगा कि कांग्रेसी नेता और कम से कम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह बताएं कि सरकार आवश्यक धन का प्रबंध कैसे करे? कांग्रेस के ऐसे ही रवैये से यह लगता है कि वह संकट के समय कायम राजनीतिक एकजुटता के माहौल को भंग करना चाह रही है।
उसकी ओर से मजदूरों के रेल किराये का मसला जिस तरह उठाया गया उससे यही रेखांकित हुआ कि उसका मूल मकसद अपनी राजनीति चमकाना अधिक था, न कि मजदूरों को राहत दिलाना। कांग्रेस की तमाम छींटाकशी के बाद भी केंद्र सरकार को न केवल यह देखना होगा कि कोरोना के संक्रमण पर जल्द लगाम लगे, बल्कि यह भी कि कारोबारी गतिविधियां तेजी के साथ आगे कैसे बढ़ें? वह इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि कारोबारी गतिविधियों को बल देने के उसके निर्देशों पर सही ढंग से अमल नहीं हो पा रहा है।950words

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