13-05-2020



कोरोना महामारी के मद्देनजर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जो समन्वय बनता दिख रहा है, वह न केवल उपयोगी, बल्कि स्वागतयोग्य भी है। इस महामारी के समय केंद्र व राज्यों के बीच और एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच जो समन्वय या समझ की दृष्टि स्थापित होगी, वह हमेशा देश के काम आएगी। इसमें कोई दो-राय नहीं कि कोरोना से जूझना किसी एक के वश की बात नहीं है। सब समझ और समन्वय से चलेंगे, तो कोई राह निकलेगी। हर कोई सरकार से उम्मीद लगाए बैठा है। गरीब भोजन व रोजगार की बहाली चाह रहे हैं, तो अमीरों को आर्थिक पैकेज और समर्थन की उम्मीद है, ताकि उनके कल-कारखानों-दफ्तरों के काम में तेजी आ सके। बेशक, यदि किसी एक बडे़ राज्य में भी भोजन व रोजगार की बहाली होगी, तो उसके फायदे और सबक अन्य राज्यों तक पहुंचेंगे। 
पांच राज्यों के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक में लॉकडाउन बढ़ाने की स्पष्ट मांग की है। वहीं गुजरात जैसे राज्य भी हैं, जो अब और लॉकडाउन झेलने के पक्ष में नहीं हैं। लॉकडाउन के कारण मजदूरों का लौटना भी एक दुखद समस्या बन गया है। लॉकडाउन के तीन चरणों में हमने देख लिया है, मजदूरों की वापसी धीरे-धीरे हो रही है। जैसे किसी बांध में जलस्तर बढ़ाया जाता है, तो हर बार कुछ गांव डूब में आ जाते हैं और विस्थापन होता है, ठीक वैसा ही लॉकडाउन के समय हम देख रहे हैं। शायद किसी सरकार के पास ऐसे आंकड़े नहीं हैं, जिनसे पता चले कि भारत में कितने कामगार बिना रोजगार-कमाई कितने दिनों तक अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। चूंकि सरकारों के पास कामगार वर्ग को समझने के मुकम्मल आंकडे़ नहीं हैं, इसलिए लॉकडाउन के हर दिन हम एक नई आबादी को सड़कों पर निकलते देख रहे हैं। सरकारों के बीच अगर प्रशंसनीय समन्वय होता, तो किसी भी मजदूर को अमानवीय ढंग से इतना पैदल न चलना पड़ता। बड़ी संख्या में मजदूरों के लिए चलाई जा रही ट्रेनों के बावजूद अगर वे सड़कों पर आ रहे हैं, तो इसका मतलब है, सरकारों और सरकार के विभागों में पर्याप्त समन्वय नहीं है। पुलिस कहीं लोगों को रोक रही है, तो कहीं जाने दे रही है, मतलब पुलिस के पास भी स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं हैं। जांच, अस्पताल, इलाज और क्वारंटीन सेंटर की सुविधाओं में भी एक सी गुणवत्ता नहीं है। सभी स्वास्थ्य केंद्रों और राज्यों में कोरोना से जंग में समान रूप से चिंता, तैयारी और क्रियान्वयन दिखना ही चाहिए। सावधान रहना होगा, अगर समन्वय के साथ समान गुणवत्ता नहीं बरती गई, तो एक राज्य दूसरे को कोरोना देता रहेगा। 
बीते 51 दिनों में पांचवीं बार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के बीच बैठक हुई है। क्या जरूरत को देखते हुए सभी परिवहन मंत्रियों, सचिवों, अधिकारियों की बैठक नहीं होनी चाहिए? क्या ऐसी ही बैठक चिकित्सा, वित्त, वाणिज्य और शिक्षा में समन्वय के लिए नहीं होनी चाहिए? प्रधानमंत्री लगातार जो संकेत दे रहे हैं, उससे स्पष्ट है, आने वाले दिनों में राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी। यह स्वाभाविक और आवश्यक भी है, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाने के लिए राज्य सरकारों को आगे बढ़कर परस्पर बेहतर समन्वय करना होगा। राज्यों के बीच बेहतर समन्वय होगा, तो वे केंद्र सरकार से अपना हक या सहयोग मांगने में ज्यादा समर्थ होंगे।
प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा करके देश को केवल चौंकाया ही नहीं, बल्कि यह संदेश भी दिया कि उन्होंने इस बड़े पैकेज के जरिये आपदा को अवसर में बदलने के लिए कमर कस ली है हैं। इसीलिए उन्होंने इस पैकेज को आत्मनिर्भर भारत अभियान नाम दिया। इसका सीधा अर्थ है कि वह आर्थिक पैकेज के जरिये केवल पस्त पड़े कारोबार जगत को संकट से उबारने ही नहीं जा रहे हैं, बल्कि देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था का कायापलट करने की तैयारी भी कर रहे हैं। यह पैकेज कारोबार जगत के साथ-साथ आम जनता का भी मनोबल बढ़ाने वाला साबित होना चाहिए।
नि:संदेह बीते कुछ दिनों से आर्थिक पैकेज की घोषणा की बेसब्री से प्रतीक्षा की जा रही थी, क्योंकि इसके पहले सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से जो राहत दी गई थी वह कोरोना वायरस के संक्रमण से उपजे भीषण संकट को देखते हुए अपर्याप्त थी। एक और आर्थिक पैकेज की उम्मीद के बावजूद इसकी अपेक्षा शायद ही किसी को रही हो कि वह जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर होगा और पिछले दोनों पैकेज को मिलाकर उसकी कुल राशि 20 लाख करोड़ रुपये हो जाएगी। जीडीपी के मुकाबले इतना भारी-भरकम पैकेज तो कई विकसित देशों ने भी नहीं दिया
प्रधानमंत्री की ओर से 20 लाख करोड़ रुपये की अप्रत्याशित राशि वाले आर्थिक पैकेज की घोषणा के बाद अब प्रतीक्षा है उसके विस्तृत विवरण की। इसके बावजूद प्रधानमंत्री के संबोधन से इसका आभास तो हो ही गया कि इस पैकेज में किसानों, रोज कमाने-खाने वालों के साथ-साथ छोटे-मझोले कारोबारियों का खास ध्यान रखा जाएगा। इसके अलावा उसके माध्यम से सप्लाई चेन को सुदृढ़ करने, उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर करने, स्थानीय उत्पादों की खपत बढ़ाने और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। स्पष्ट है कि यह एक चुनौती भरा काम है, लेकिन इस चुनौती को छोटे-बड़े कारोबारियों को न केवल स्वीकार करना होगा, बल्कि उसे एक अवसर के रूप में लेना होगा। 
।वास्तव में इससे ही देश को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है। चूंकि प्रधानमंत्री ने राहत पैकेज के साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि आवश्यक र्आिथक सुधारों का मार्ग भी प्रशस्त किया जाएगा इसलिए कारोबार जगत को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने और सरकार के साथ-साथ आम जनता की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरने की तैयारी कर लेनी चाहिए। हर आपदा में कुछ अवसर छिपे होते हैं। अब जब सरकार ने इन अवसरों का लाभ उठाने की रूपरेखा बना ली है तब फिर कारोबार जगत को भी पीछे नहीं रहना चाहिए।960words

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