15-05-2020
प्रधानमंत्री की
ओर से घोषित 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज के पहले
चरण का जो विवरण वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेश किया उसके हिसाब से करीब छह
लाख करोड़ रुपये की राहत का रास्ता साफ हुआ। यह अलग-अलग सेक्टरों के लिए है, लेकिन इससे सबसे अधिक राहत सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों यानी एमएसएमई को मिलेगी। चूंकि
एमएसएमई रोजगार उपलब्ध कराने में सबसे आगे हैं इसलिए इसका सीधा लाभ आम आदमी को
मिलते हुए दिखना चाहिए। यह अच्छा है कि आर्थिक पैकेज के जरिये
सरकार ने एमएसएमई की वे तमाम मांगे मान लीं जिन्हेंं एक अर्से से उठाया जा रहा था।
एक बड़ी मांग यह
थी कि एमएसएमई को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। आखिरकार ऐसा कर दिया गया। अब
एमएसएमई की परिभाषा कहीं अधिक तार्किक दिख रही है।
उल्लेखनीय यह भी है कि एमएसएमई को बिना गारंटी तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज देने की
व्यवस्था की जाएगी। इस कर्ज की अवधि तो चार साल होगी ही, एक साल तक मूल धन चुकाने की भी जरूरत नहीं रहेगी। यह हर
लिहाज से एक बड़ी राहत है।
यह तय है कि
वित्त मंत्री की इस घोषणा से भी एमएसएमई को अच्छी-खासी राहत मिलेगी कि सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्योगों का सरकारी कंपनियों में बकाये का भुगतान
45 दिन में करने की कोशिश होगी। उचित यह होगा कि इस कोशिश को
अंजाम तक पहुंचाया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि 45 दिनों में बकाये का भुगतान हर हाल में हो। यदि सरकार यह
सुनिश्चित कर सके तो एमएसएमई वित्तीय रूप से कहीं अधिक मजबूती हासिल करने में
समर्थ होंगी। नि:संदेह इस कदम का भी सीधा लाभ एमएसएमई को मिलने वाला है कि 200 करोड़ रुपये तक की सरकारी खरीद में ग्लोबल टेंडर की अनुमति
नहीं होगी और सरकार को घरेलू कंपनियों से टेंडर मंगवाने की बाध्यता होगी। इससे
केवल छोटे उद्योगों को लाभ मिलने के साथ ही लोकल उत्पाद खरीदने की मुहिम को बल
मिलेगा।
इस मुहिम को बल
मिले और देश आत्मनिर्भर बने, इसके लिए एमएसएमई को भी अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष
ध्यान देना होगा। इसके साथ ही वित्त मंत्रालय को भी उन कारणों की तह तक जाना होगा
जिनके चलते उद्यमी कर्ज लेने में उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। चूंकि वित्त मंत्री ने
इसकी भरपूर चिंता की है कि एमएसएमई को अधिकाधिक वित्तीय राहत मिले इसलिए उद्योगों
को भी इसके एवज में रोजगार के अवसरों में वृद्धि करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
इसलिए और अधिक, क्योंकि आर्थिक पैकेज का मूल
उद्देश्य उद्योग-धंधों को बल देकर आम आदमी को राहत देना एवं उसकी रोजी-रोटी की
आशंकाओं को दूर करना है
घर लौटते
मजदूरों के साथ हो रहे सड़क हादसे सिर्फ शर्मनाक ही नहीं, बल्कि अमानवीय भी हैं। ऐसे हादसे लोगों के दुख को पहले से
ज्यादा गंभीर और गाढ़ा कर जाते हैं। बुधवार-गुरुवार को 24 घंटे से भी कम समय में अनेक दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें से तीन दुर्घटनाओं में 100 से ज्यादा लोग
घायल हुए हैं और 16 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। सबसे दुखद
हादसा उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर-सहारनपुर रोड पर हुआ, जब रात के अंधेरे में चल रहे छह मजदूरों को एक बस ने कुचल दिया।
पंजाब से बिहार के अपने गांव जा रहे इन मजदूरों का दोष क्या था? गरमी के इन दिनों में तपती दोपहरी में सड़क पर पैदल यात्रा से
बचते हुए वे रात में ही ज्यादा से ज्यादा दूरी तय कर रहे हैं, तो यह सही और स्वाभाविक है, लेकिन ऐसे
बेबस लोगों को कुचलने वाले कौन लोग हैं? कौन है, जिसे देश की हकीकत नहीं पता? कौन है, जिसे ऐसे बुरे वक्त में भी सड़क पर चल रहे लाचार मजदूरों की
चिंता नहीं है? राजमार्गों पर चल रहे छोटे और भारी वाहनों
को इस वक्त अतिरिक्त सतर्कता के साथ यात्रा करनी चाहिए। जो प्रशासन मजदूरों के
पलायन को नहीं रोक सकता, वह कम से कम इन मार्गों पर वाहन चला रहे
ड्राइवरों को सजग रहने के लिए पाबंद तो कर ही सकता है।
उधर, मध्य प्रदेश के गुना में 60 से अधिक मजदूरों को लेकर जा रहे एक ट्रक से विपरीत दिशा से आ रही बस टकरा गई। इनमें सवार आठ मजदूर कभी घर नहीं लौट सकेंगे, इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ये दुर्घटनाएं प्रमाण हैं कि ऐसे समय में भी परिवहन नियमों की पालना नहीं हो रही है। राजमार्गों पर गाड़ियां अंधाधुंध दौड़ने लगी हैं। ठीक इसी प्रकार बिहार में मुजफ्फरपुर से कटिहार जा रही बस से ट्रक भिड़ गया। करीब 30 मजदूर घायल हुए और दो की मौके पर ही मौत हो गई। तीन राज्यों में हुए ये तीन हादसे एक ही तरह की लापरवाही के दुष्परिणाम हैं। जाहिर है, इन मजदूरों के आश्रितों को पूरा मुआवजा मिलना चाहिए। ध्यान रहे, ये मजदूर अपनी वापसी के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं हैं। उनकी वापसी व्यवस्था का एक विफल पहलू है, व्यवस्था को इन दुर्घटनाओं की भरपाई करने के साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे हादसे दोहराए न जाएं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक मदद देकर सराहनीय कार्य किया है। इसके साथ ही उसने दुर्घटना के कारणों की जांच तथा दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के निर्देश भी दिए हैं। यह जरूरी है कि इस आपदा की आड़ में नियम-कायदों से कोई खिलवाड़ न हो। अंधाधुंध दौड़ रहे वाहनों की जांच और पैदल चलते मजदूरों के मद्देनजर गति सीमा निर्धारित और लागू करने की जरूरत है। रात में चल रहे मजदूरों और उनके परिवारों को हाथ में कुछ रोशनी या संकेतक लेकर चलना चाहिए, इसमें समाजसेवी संस्थाएं व सरकारें उनकी मदद कर सकती हैं। हमें सावधानी को अपने स्वभाव में ढाल लेना चाहिए। ध्यान रहे, लॉकडाउन से पहले देश में रोज 1,200 से ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं होती थीं, जिनमें 1,200 से भी ज्यादा लोग घायल होते थे और 400 से ज्यादा जान गंवाते थे। इसलिए संकल्प लेना चाहिए, हमें दुर्घटनाओं के उस दौर में नहीं लौटना है। इसके लिए लोगों और सरकारों को कमर कस लेनी चाहिए।987
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