18-05-2020



महाराष्ट्र, तमिलनाडु व पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों ने जब अपने यहां लॉकडाउन को 31 मई तक के लिए बढ़ा दिया, तब केंद्र सरकार के लिए लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा लगभग औपचारिकत रह गई थी। कुल मिलाकर, इन दिनों कोरोना संक्रमण ने जो रफ्तार पकड़ रखी है, उससे सरकारों की चिंता का बढ़ना स्वाभाविक ही नहीं, अपरिहार्य भी है। जब देश में तीन-चार हजार लोग रोज संक्रमित पाए जा रहे हैं और संक्रमण को थामने की कोशिशें नाकाम हो रही हैं, तब लॉकडाउन को खोलकर जगह-जगह भीड़ बढ़ाकर संक्रमण बढ़ाने का जोखिम कतई नहीं उठाया जा सकता। सरकार ने जान है, तो जहान हैके सिद्धांत को तवज्जो दी है, तो कोई आश्चर्य नहीं। सरकार का मानना है कि अभी स्थिति कुछ काबू में है, पर अगर लॉकडाउन खोल दिया गया, तो स्थिति विकट हो सकती है। वैसे यह अनुमान पहले से था कि लॉकडाउन-4 की घोषणा हो सकती है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक में लॉकडाउन खोलने की वकालत की थी और केवल कंटेनमेंट जोन में ही लॉकडाउन रखने की सलाह दी थी। खासकर दिल्ली सरकार की जनमत आधारित सलाह पर खूब चर्चा चल रही थी, पर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों की चिंता गहरी है, जहां मजदूरों का लौटना थमा नहीं है और मरीजों की संख्या बढ़ रही है। देश की एक चौथाई से भी ज्यादा आबादी रखने वाले ये प्रांत लॉकडाउन के पक्ष में थे और केंद्र ने इन राज्यों की परवाह की है। पूर्वोत्तर के प्रदेशों में असम ने लॉकडाउन बढ़ाने का पक्ष लिया था। 
आज पूरी दुनिया में लॉकडाउन और ग्रेट री-ओपनिंग की चर्चा चल रही है। दुनिया के सामने दो तरह के मॉडल हैं- एक लॉकडाउन का, जिसे कड़ाई से सफल बनाकर चीन ने कोविड-19 को काबू में किया है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण कोरिया का मॉडल है, जहां केवल कंटेनमेंट जोन में लॉकडाउन रखकर आर्थिक गतिविधियों को नहीं रोका गया है। कड़े लॉकडाउन से जहां चीन की जीडीपी में इस साल की पहली तिमाही में 30 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट हुई है, वहीं इसी अवधि में दक्षिण कोरिया में यह गिरावट छह प्रतिशत भी नहीं है। जहां तक भारत का प्रश्न है, तो हम न तो चीन जैसे सख्त मिजाज हैं और न हमारे यहां कोरिया जितनी कम आबादी है। हम चेकोस्लोवाकिया जैसे छोटे और संतुलित भी नहीं हैं, जहां कभी रोज 300 से ज्यादा नए संक्रमित सामने आ रहे थे और अब बमुश्किल 50 आ रहे हैं। चेकोस्लोवाकिया हो या फिर दक्षिण कोरिया, इन देशों से भारत की तुलना नहीं हो सकती। 
भारत में लॉकडाउन को खोलने के पक्षधर लोग भी जानते हैं कि इसके खुलते ही संक्रमण बढ़ने का जोखिम है। बेशक, लॉकडाउन खुला व संक्रमण बढ़ा, तो अपयश केवल सरकार के खाते में आएगा। सरकारों को अच्छे से पता है कि प्रदेश-देश की हकीकत क्या है? भारत की विशाल आबादी को पूरी तरह से नियंत्रित करना बेहद कठिन है। ऐसे में, हमें अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सौ फीसदी जुटने के समय का इंतजार करना होगा। संक्रमण को काबू में करने के साथ ही लापरवाह लोगों को भी सजग करना होगा। इसके साथ ही, जो उद्योग अभी सक्रिय हैं, उन्हें अपनी सक्रियता प्रदेश-देश के हित में बढ़ानी पडे़गी। देश की सबसे कड़ी परीक्षा जारी है, एक-एक कदम संभलकर बढ़ना चाहिए।
वकीलों के देशव्यापी संगठन ऑल इंडिया बार एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नागरिक प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 86 में संशोधन करने के लिए पत्र लिखा। यह धारा एक नागरिक को किसी विदेशी सरकार पर मुकदमा करने से प्रतिबंधित करती है। बार एसोसिएशन का कहना है कि कानून में संशोधन करके वैश्विक महामारी कोविड-19 से हुए नुकसान को लेकर चीन से भरपाई लेने की अनुमति दी जाए।

महामारी को चीन का कृत्य करार देते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष आदिश सी. अग्रवाल ने कहा कि सरकार को सीआरपीसी के अनुच्छेद में संशोधन के लिए अध्यादेश लाना चाहिए। इससे भारतीय चीन से उस बीमारी की वजह से पहुंचे नुकसान की भरपाई करने में सक्षम हो जाएंगे जिसकी वजह से अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है और 2,752 लोगों की जान चली गई है।
अग्रवाल ने पत्र में आरोप लगाते हुए कहा, 'महामारी द पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का कृत्य है। वायरस सरकार के आदेशों के तहत प्रयोगशालाओं में बनाया गया था। जिसे कि अब छुपाने की कोशिश की जा रही है। वायरस को म्युटेट, फैलने और मृत्यु दर की अभूतपूर्व दर वाली उल्लेखनीय क्षमता के साथ विकसित किया गया है। चीन की सरकार ने जानबूझकर और सचेत रूप से दुनिया को इससे प्रभावित किया है।'
प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ ज्यूरिस्ट के अध्यक्ष अग्रवाल ने कहा, 'भारत के सीआरपीसी की धारा 86 के अनुसार किसी भी राज्य में किसी भी विदेशी देश पर केंद्र सरकार की सहमति के बिना मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है। इसमें यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि उपरोक्त प्रावधान मामले को व्यापार गतिविधि के संबंध में संविदात्मक दायित्वों को लागू करने की अनुमति देता है।'
उन्होंने कहा कि जैसा कि आज कानून है, उसमें चीन के खिलाफ किसी व्यक्ति के पास कोई अन्य उपाय उपलब्ध नहीं है। कोई व्यक्ति क्षतिपूर्ति मांगने के लिए सीधे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में नहीं जा सकता है। ऐसे में यदि सीआरपीसी में संशोधन किया जाए तो कोई भी नागरिक भारत में मुकदमा चलाने का हकदार हो जाएगा।
यह पूछे जाने पर कि भारतीय अदालतों को मुकदमे का अख्तियार मिलने पर चीन किस तरह बाध्य होगा, उन्होंने बताया कि भारतीय अदालतों को डिक्री मिलने के बाद चीन पर जुर्माना अदा करने की बाध्यता होगी। अगर डिक्री के तहत चीन भुगतान नहीं करता है तो भारत में चीन की संपत्ति को जब्त कर लिया जाएगा। और उसके अनुपालन के लिए डिक्री को चीनी अदालतों को भेज दिया जाएगा।  945

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