21-05-2020


एक दुख हो या एक सुख, दोनों में से कोई अकेले नहीं आता। एक दुख के साथ कुछ अन्य दुख और एक सुख के साथ कुछ अन्य सुख अनायास आते हैं। बंगाल की खाड़ी से उठा तूफान अम्फान भी एक ऐसा दुख है, जो कोरोना के सतत होते दुख में शामिल होने आ गया है। इस तूफान पर सबकी नजर है। अम्फान को लेकर सकारात्मक बात यह है कि दुनिया भर के मौसम विज्ञानियों ने 14 मई के आसपास ही इससे बढ़ते खतरे का अंदाजा लगा लिया था। पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटीय इलाकों से जो खबरें आई हैं, उनसे पता चलता है, छह लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित होने वाले इलाकों से पहले ही निकाल लिया गया। लोगों को सचेत रहने के लिए कहा गया। ऐसा समुद्री तूफान 1999 के बाद से भारत में नहीं उठा था और यह भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी तबाही की वजह बन सकता है। तूफान की गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेलगाड़ियों के डिब्बों को लोहे की चेन से बांधना पड़ा। तूफान की रफ्तार 200 किलोमीटर प्रति घंटा तक जाने की आशंका है। बहरहाल, पूर्व सूचना और सचेत होने का फायदा यह होगा कि जान का नुकसान कम से कम होगा, लेकिन माली नुकसान का आकलन आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
आखिर क्यों उठते हैं ऐसे खतरनाक तूफान? वैज्ञानिक अध्ययनों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जैसे-जैसे समुद्री जल गरम होता जाएगा, समुद्र से उठने वाले तूफानों की भयावहता बढ़ती जाएगी। 1979 से लेकर 2017 के बीच उठे तूफानों के सैटेलाइट आंकड़ों से पता चलता है, 185 किलोमीटर प्रति घंटा से ज्यादा की रफ्तार वाले घातक तूफानों की संख्या बढ़ती जा रही है। भौतिक विज्ञान पहले ही इस तथ्य को उजागर कर चुका है कि समुद्र अगर एक डिग्री सेल्सियस गरम होता है, तो उस पर चलने वाली हवाओं की रफ्तार में पांच से दस प्रतिशत की वृद्धि होती है। अब सवाल है, समुद्र का तापमान क्यों बढ़ रहा है, तो इसके जवाब पर भी फिर गौर कर लेना चाहिए, पर्यावरण में ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी गरम हो रही है। कोरोना के दिनों में लॉकडाउन की वजह से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हुआ है, जिसके कुछ फायदे साफ दिख रहे हैं। हमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थाई रूप से कम करते जाने की पुख्ता व्यवस्था करनी पडे़गी, यह काम हम इंसानों के वश में है।
आज तूफान और कोरोना के बीच जो लोग संबंध देख रहे हैं, तो वे गलत नहीं हैं। देश के अन्य हिस्सों की तरह पश्चिम बंगाल व ओडिशा में कोरोना की वजह से लोग पहले ही परेशान हैं और अब तूफान की आपदा से बचने की कोशिश में फिजिकल डिस्र्टेंंसग का कितना पालन हो सकेगा, कहना मुश्किल है। इन दोनों राज्यों की सरकारों और देश के लिए दोहरी चुनौती पैदा हो गई है। लोगों को आपदा से भी बचाना है और कोरोना से भी। यदि छह लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं, तो यकीन मानिए, सबको संभालने के लिए राहत शिविरों में सावधानी और इंतजाम के पहले के तमाम कीर्तिमान तोड़ने पड़ेंगे। यह समय कदम-कदम पर चुनौती खड़ी कर रहा है और हमें प्रेरित कर रहा है कि हम अपनी और पृथ्वी की सुरक्षा के लिए सोलह आना ईमानदारी से काम करें। आपदाएं आएंगी-जाएंगी, इंसान जीतता रहा है, जीतता रहेगा।
·         विमान सेवाओं के चलने से आवाजाही में मदद, बल्कि कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी
·         घरेलू विमान सेवाएं शुरू करने का फैसला एक सही कदम है। ऐसे किसी फैसले की प्रतीक्षा ही की जा रही थी। अच्छी बात यह है कि हवाईअड्डे और एयरलाइंस 25 मई से विमान यात्रा शुरू करने के लिए तैयार हैं। चूंकि हवाई यात्रा से जुड़ी जरूरी शर्तें सार्वजनिक कर दी गई हैं इसलिए यात्रियों को भी उनके हिसाब से तैयारी करने में आसानी होगी। कोशिश यह होनी चाहिए कि कोरोना संक्रमण से बचाव को ध्यान में रखते हुए विमान यात्रियों के लिए जो जरूरी शर्तें तय की गई हैं उन्हेंं लेकर किसी तरह का कोई भ्रम न फैलने पाए।
·         विमान सेवाओं की शुरुआत केवल आवाजाही में ही मददगार साबित नहीं होगी, बल्कि उसके चलते कारोबारी गतिविधियां आगे बढ़ाने में भी सहायता मिलेगी। आज के युग में कारोबारी गतिविधियों का सीधा संबंध आवाजाही की आसान सुविधा से है। यही कारण है कि किसी इलाके में कारोबारी गतिविधियों को बल देने के लिए वहां हवाई यात्रा की सुविधा को आवश्यक माना जाता है। विमान यात्राओं को हरी झंडी दिखाने से आर्थिक संकट से दो-चार एयरलाइंस को तो राहत मिलेगी ही, उनके कर्मचारियों की नौकरियों पर मंडराता संकट भी टलेगा।
·         यह सर्वथा उचित है कि विमान सेवाएं शुरू करने का फैसला लेने के पहले रेल यात्रा शुरू करने का भी निर्णय ले लिया गया, लेकिन यह समझ नहीं आया कि विमान यात्रा की सुविधा तो 25 मई से मिलने लगेगी, लेकिन रेल यात्रा की सुविधा के लिए एक जून तक प्रतीक्षा करनी होगी। फिलहाल केवल 200 बिना एसी वाली ट्रेनों को ही चलाने का फैसला किया गया है। स्पष्ट है कि इसके चलते लोगों को एक सीमा तक ही राहत मिलेगी। हालांकि 15 जोड़ी राजधानी ट्रेनें पहले से चल रही हैं, लेकिन उनका लाभ चुनिंदा शहरों के लोगों को ही मिल पा रहा है। रेलवे ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की भी संख्या बढ़ाई है।
·         घर लौटने को तत्पर मजदूरों की बड़ी संख्या को देखते हुए ऐसा करना आवश्यक था, लेकिन आखिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि मजदूरों को उनके गंतव्य तक ले जा रहीं श्रमिक स्पेशल ट्रेनें वापसी में आम लोगों को यात्रा की सुविधा प्रदान करें? एक सवाल यह भी है कि राज्य सरकारें बसों के संचालन में तत्परता क्यों नहीं दिखा रही हैं? यह ठीक नहीं कि एक से दूसरे राज्य के बीच तो बसों को चलाने से बचा ही जा रहा है, कई राज्यों में एक से दूसरे जिलों में भी बसों का संचालन गति नहीं पकड़ रहा है। बेहतर हो राज्य सरकारें आवाजाही की महत्ता को समझें। जब कोरोना के साये में जीवन को गति देने की मजबूरी है तब फिर आवाजाही से बचने की कोशिश वक्त की बर्बादी है।1000


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