17-05-2020
सेहत की चिंता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी
है आर्थिक सक्रियता। इसके लिए भारत ही नहीं, बल्कि अन्य
देशों की सरकारें भी मन बना रही हैं, तो यह पहल
स्वागतयोग्य है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की प्रदेश सरकार को ही लोगों ने पांच
लाख से ज्यादा सुझाव दिए हैं, तो अन्य राज्यों को
भी निश्चित ही बड़ी संख्या में सुझाव मिले होंगे। यह बहुत जरूरी है कि राज्य
सरकारें अपने सजग बहुमत के साथ आगे बढ़ें। जहां तक उद्योगों-कारखानों को खोलने का
सवाल है, तो इस पर सरकारें पहले ही सहमत हैं। अब आगे
सार्वजनिक परिवहन और बाजारों को खोलने की मांग सबसे बड़ी है। हमारे समाज की ये
दोनों जरूरतें बहुत महत्वपूर्ण हैं। सरकारों को अच्छे से पता है, बाजार खोलने का अर्थ है, भारत के
विशालकाय रिटेल सेक्टर को खोलना। भारत की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र से आता है और लगभग चार
करोड़ लोगों को इस क्षेत्र से सीधे रोजी-रोटी नसीब होती है। एक अनुमान के अनुसार, इन चार करोड़ लोगों में से बमुश्किल 10 प्रतिशत ही अभी अपने काम में सक्रिय हैं। हालांकि
राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में अनेक जरूरी रिटेल स्टोर्स को खोल दिया गया है।
आश्चर्य नहीं कि लोगों के सुझाव के बाद दिल्ली सरकार भी बाजार को खोलने के पक्ष
में दिखती है। बाजार में मांग बढ़ेगी, तो जाहिर है, तमाम तरह की वस्तुओं की मांग बढ़ेगी, कल-कारखाने आपूर्ति के लिए बाध्य होंगे और अर्थव्यवस्था पटरी पर
लौटने लगेगी।
हालांकि बाजार को खोलने से भी ज्यादा जरूरी है सार्वजनिक परिवहन को मंजूरी देना। इसके चालू होते ही न केवल बाजारों और कल-कारखानों में मजदूरों की उपस्थिति बढ़ेगी, बल्कि जो लोग आज पैदल चलने को मजबूर हैं, उन्हें भी राहत का एहसास होगा। यह समझना कठिन नहीं कि बाजार और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को अगर एक चौथाई भी खोल दिया जाए, तो मजदूरों को अपनी-अपनी जगह रुकने की वजह मिल जाएगी, वे फिर कामकाज में सक्रिय हो जाएंगे।
लेकिन सावधान, अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे खोलते जाने की दिशा में बढ़ने की बुनियादी शर्त है फिजिकल डिस्टेंसिंग सुनिश्चित करना। लोगों को साधन, स्थान और परिवेश ऐसा देना होगा कि वे शारीरिक दूरी रख पाएं। सार्वजनिक परिवहन की यथोचित व्यवस्था अगर होती, तो किसी को हजारों किलोमीटर दूर पैदल न चलना पड़ता, पचास-पचास लोगों को एक ही ट्रक में सवार होकर मुंबई से बनारस न आना पड़ता। दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार को व्यवस्थित ढंग से सुझाव दिए हैं, उनका स्वागत है, मगर इन सुझावों के क्रियान्वयन पर ही पूरा दारोमदार टिका है। यह छिपी हुई बात नहीं कि लॉकडाउन को कड़ाई से लागू करने वाली सरकारें मजदूरों की जिंदगी व उनके पलायन के बारे में सोचने में नाकाम रही हैं। अत: लॉकडाउन खोलने से पहले सरकारों को आश्वस्त होना होगा कि समाज और उसकी तकलीफें काबू में हैं। अब काम लायक खुशनुमा दिन अचानक सोलह आना नहीं लौटने वाले। पर हमारी सरकारें जितनी चौकसी और ईमानदारी बरतेंगी, देश की खुशियां भी उतनी ही लौटेंगी। जैसे थूकने के विरुद्ध नियम बनाए जा सकते हैं, ठीक उसी तरह कहीं भी भीड़ को रोकने के लिए भी नियम-कायदे कड़े किए जा सकते हैं। लॉकडाउन में भले ढील मिले, पर ऐसे अनुशासन हमारे विचार-व्यवहार में जितनी जल्दी घुल-मिल जाएं, उतना अच्छा।
इटावा-लखनऊ हाईवे
पर हुए एक भयावह हादसे में करीब 25 मजदूरों की मौत
ने जैसे-तैसे घर लौट रहे कामगारों की दयनीय दशा की ओर फिर से देश का ध्यान
केंद्रित किया है। यदि कामगारों की घर वापसी के लिए उचित प्रबंध किए गए होते तो
शायद इस भीषण हादसे में उनकी जान जाने से बच सकती थी। कायदे से केंद्र और राज्य
सरकारों को तभी चेत जाना चाहिए था जब महाराष्ट्र में ट्रेन पटरियों पर सो रहे
कामगार मालगाड़ी से कट मरे थे, लेकिन ऐसा नहीं
हुआ। कोरी संवेदना जताकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई। नतीजा यह हुआ कि कामगारों
के पैदल या साइकिल से घर जाने का सिलसिला और तेज हो गया। यह सिलसिला इसलिए भी तेज
हुआ, क्योंकि जो श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं वे पर्याप्त
नहीं साबित हो रही हैं।
यह साफ है कि घर
लौटना चाह रहे सभी कामगार इन ट्रेनों की सुविधा हासिल नहीं कर पा रहे हैं। यह
विचित्र है कि न तो पैदल घर जाने को मजबूर मजदूरों को रोकने की कोशिश की गई और न
ही उन्हेंं उचित तरीके से उनके घर भेजने की। इस घातक उदासीनता का परिचय यह जानते
हुए भी दिया गया कि चंद दिनों बाद जब कारोबारी गतिविधियां शुरू होंगी तो मजदूरों
की जरूरत पड़ेगी।
चूंकि घर लौट रहे
मजदूरों के सड़क हादसों में हताहत होने के समाचार आए दिन आ रहे हैं इसलिए राज्य
सरकारों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपनी सीमा में उन्हेंं पैदल गुजरने से
रोकें। इसी के साथ उन्हेंं इसकी भी चिंता करनी होगी कि कहीं मजदूर माल ढुलाई में
लगे ट्रकों में असुरक्षित तरीके से यात्रा करने के लिए विवश तो नहीं हैं? चूंकि इन दिनों खाली सड़क देखकर वाहनों को तेज गति से चलाया
जा रहा है इसलिए इसके खिलाफ भी सख्ती बरतनी होगी। यह ठीक है कि केंद्र सरकार ने
राज्यों को यह निर्देश दिया है कि वे मजदूरों को पैदल जाने से रोकें, लेकिन उचित यह होगा कि राज्य सरकारों से यह भी कहा जाए कि
वे कुछ दिन श्रमिक स्पेशल बसें चलाएं।
समझना कठिन है कि
राज्य सरकारें श्रमिक स्पेशल बसों का संचालन क्यों नहीं कर सकतीं? ये बसें इस तरह चलाई जानी चाहिए जिससे मजदूरों को राज्य
विशेष की सीमा पार करने में आसानी हो। लॉकडाउन के चौथे चरण की रूपरेखा बनाने से
पहले यह सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए कि हताश-निराश मजदूर सुरक्षित और सम्मानजनक
तरीके से अपने घर लौटें। यह तभी संभव होगा जब राज्य सरकारें एक-दूसरे के साथ
तालमेल करेंगी। सरकारों को इसका आभास होना चाहिए कि मजदूरों की उपेक्षा-अनदेखी
राष्ट्रीय शर्म का विषय बन रहा है।952
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