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Showing posts from 2019

Editorial 7 nov

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Steno help pp Editorial dictation Jansatta 80wpm 400 words टिल्ली और आसपास के इलाकों में हवा की हालत जानलेवा होने की ओर बढ़ने के बावजूद इसके फिलहाल पहचाने गए कारणों से निपटने को लेकर संबंधित सरकारें जिस स्तर की अनदेखी बरत रही हैं, उससे यही लगता है कि उन्हें इस बेहद गंभीर संकट की कोई फिक्र नहीं है ! खबरों के मुताबिक पंजाब में मंगलवार को खेतों में पराली जलाने की इस मौसम की सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज की गईं। वहां के किसानों ने पराली जलाने पर प्रतिबंध के बावजूद साढ़े छह हजार से ज्यादा जगहों पर अपने खेतों में पड़े फसल के अवशेषों के निपटान के लिए उनमें आग लगाई। नतीजतन, पिछले एक-दो दिनों में वायु की पर पराली जलाने के बाद फिर उसके बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। यह स्थिति तब है जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पराली जलाने और उसकी वजह से प्रदूषण पैदा करने वालों से किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं हो सकती। बुधवार को एक बार फिर शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा कि आप पूरी तरह नाकाम रहे हैं; अब समय आ गया है जब उन अधिक...

Editorial 6 nov

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Editorial dictation  6 nov Danik jagran 80wpm 400words कानून के शासन के लिए यह अच्छा नहीं हुआ कि देश की राजधानी में वकीलों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद पहले क्कील अपना विरोध जताने सड़क पर उतर आए और फिर दिल्ली पुलिस के कर्मी। ह्यालांकि वकीलों के विभिन्न संगठन तो जब-तब अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते ही रहते हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम देखने को मिला है जब पुलिस अपनी शिकायत दर्ज कराने सड़कों पर उतरी हो। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि सड़क पर उतरकर अपने आक्रोश को प्रकट करने का काम उस दिल्ली पुलिस को करना पड़ा जो देश की राजधानी का पुलिस बल होने के नाते अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सवाल केक्ल यह नहीं है कि ऐसी नौबत क्यों आई, बल्कि यह भी है कि सड़क पर उतरे पुलिस कर्मियों ने अपने अधिकारियों के आग्रह की अनसुनी क्यों की? यह समझ आता है कि अपने साथ हुए व्यवहार से आहत पुलिस कर्मियों ने अपनी व्यथा बयान करना आवश्यक समझा, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होता कि पुलिस मुख्यालय धरना देने गए पुलिस कमी अपनी पीड़ा व्यक्त करने के बाद काम पर लौट जाते? इसमें जो देर...

Editorial dictation 5 nov

स्टेनो हेल्प pp Editorial dictation 5 nov danik bhaskar80wpm  394words व्हाट्सअप जासूसी के मामले में सरकार जितना बचने का प्रयास कर रही है उतनी ही घिरती जा रही है। राज का खुलासा होने के बाद केंद्रीय दूरसंचार मंत्री का जवाब था 'व्हाट्सअप से स्पष्टीकरण मांगा गया है। कंपनी का फौरन प्रत्युत्तर आया 'यह सब कुछ सरकार को मई में ही बताया जा चुका है। सरकार ने इस पर कहा कि 'वह जवाब बेहद टेक्निकल था, लिहाजा कुछ भी समझ में नहीं आया इस पर कंपनी ने कहा कि 'सितम्बर में दोबारा बताया गया था। जैसे ही सरकार ने इस बार इसे ख़ारिज करना चाहा, व्हाट्सअप और मीडिया ने मंत्रालय की वेबसाइट को दिखाया जिस पर कंपनी का सरकार को और प्लेटफार्म यूजर्स को आगाह करने वाला पत्र स्वयं सरकारी एजेंसी ने अपलोड किया था। ध्यान रहे कि मई में ही आम -चुनाव हुए थे। उधर व्हाट्सअप के एन्क्रिप्टेड विषय-वस्तु में सेंध लगाकर देश के कुल 127 लोगों की जासूसी करने वाली इस्रायली कंपनी एनएसओ अपने बचाव में लगातार कह रही है कि वह अपने जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस का लाइसेंस केवल सरकार और उसकी वैध संस्थ...

Ssc skill special 20

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      STeno help pp Special skill test series 20 Grade D 90wpm 11 min  माननीय सभापति महोदय, पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती कहावत सामाजिक चिंतकों और राजनीतिज्ञों की जुबानी अक्सर उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों से होते पलायन पर चिंता जताते सुना जाना आम है। इस कहावत की सच्चाई पर कोई शक नहीं है वाकई पहाड़ी गाँवों में रहना बहुत कठिन है। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गड़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन। पलायन से हो रहे नफा नुकसान की चिंताओं के बीच पहाड़ के गाँवों की हकीकत जानने निकलें तो पाएंगे की जिम्मेदार लोगों की चिंता नकली है। 1 यदि चिंता असली होती तो खाली होते पहाड़ पर ऐसे लोग खुद घर बनाकर रह रहे होते न तो सुविधासम्पन्न शहरों में रहकर मात्र सेमिनारी चिंतन मनन तक सीमित रहते। राज्य बनने के 17 साल बाद किसी भी राजनेता ने उत्तराखण्ड की पीढ़ा को समझने का प्रयास नहीं किया। राजनीति देश की रही हो या उत्तराखण्ड की सभी ने यही माना कि उत्तराखण्ड का पानी और जवानी हमेशा से बहता ही आया है | इसे ...