2 nov editorial dictation
Editorial dictation
2 nov 2019
Hindustan 80wpm 400words
छठ एक ऐसा महा-लोकपर्व है, जिसकी तुलना दुनिया के किसी भी अन्य पर्व के साथ नहीं हो सकती। यह उस सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसकी तुलना किसी से संभव नहीं है। यह उस गंगा के प्रदेशों का पर्व है, जिसकी तुलना दुनिया की किसी नदी से असंभव है। मानव जीवन में सूर्य की अवहेलना की कोई गुंजाइश नहीं है। संसार में शायद ही कोई ऐसा पदार्थ होगा, जिसके होने में सूर्य की कोई भूमिका न हो। ऐसे सूर्य का महत्व उन प्रदेशों में बहुत ज्यादा है, जहां जल-नदियों-जलाशयों की अधिकता है। नम मिट्टी और उसके नम हृदय लोगों को कदम-कदम पर ताप की आवश्यकता पड़ती है और ताप के देवता सूर्य हैं, शायद इसीलिए ऐसे प्रदेशों में सूर्य की आराधना अत्यंत श्रद्धा-आस्था के साथ सदियों से की जा रही है। इस मिट्टी के लोग जहां-जहां भी गए हैं, सूर्य उपासना का यह पर्व भी संस्कार बनकर साथ-साथ गया है। इस पर्व की तार्किकता के आगे संसार की अन्य सभ्यताओं के लोग भी सिर नवाते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं।
चार दिन का यह पर्व जलाशयों, नदियों की शोभा में चार चांद लगा देता है और पूरे समाज, प्रदेश, देश के लिए प्रेरक बन जाता है। सूर्य या छठ पर्व अपने हिसाब से समाज गढ़ने में सफल हो जाता है, क्योंकि सूर्य स्वयं कोई भेद नहीं करता। अमीर के घर भी उतनी ही रोशनी पहुंचती है, जितनी गरीब के घर। नदियों को भी उतना ही ताप मिलता है, जितना पेड़-पत्तों को। सूर्य मनुष्य समाज के उन तमाम कर्णधारों-निर्णायकों-सत्ताधीशों को पैगाम देता है कि तुम भी भेद या पक्षपात मत करो। जो सत्ता या शक्ति अर्जित हुई है, उसे जन-जन तक बिना भेद पहुंचाओ। ध्यान रहे, वही समाज समृद्ध और सुखी होंगे, जिनमें परस्पर भेद कम होंगे या नहीं होंगे। छठ गंगा के प्रदेशों की सुंदर मनमोहक झांकी है और इस बात का प्रमाण भी कि इस महापर्व के समृद्ध संदेश को अभी समाज पूरी तरह से भूला नहीं है। जो संदेश या जो भाव गंगा और उसकी सहोदर नदियों के समाजों में छठ के दिनों में जागृत रहता है, उसी का विस्तार अनिवार्य है। यह विचार का प्रशन है कि सूर्य यदि अगुवा हैं, तो उन्हें पूजने वाला समाज-राज्य पीछे कैसे रह गए? सौभाग्य से इस प्रश्न का उत्तर दुर्लभ नहीं है, इसका विस्तृत उत्तर छठ के पास है। उसी व्यापक छठ पर्व के पास, जिसे हमने दो या चार दिनों का मान लिया है। 400words
Jansatta 90wpm 449 words
जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय किए जाने के
बाद अब जम्मू, कश्मीर और लद्दाख को औपचारिक रूप से केंद्र
शासित प्रदेशों का दर्जा मिलते ही चीन और पाकिस्तान की बौखलाहट
सामने आ गई है । इसे लेकर कोई आश्चर्य इसलिए नहीं है कि ये दोनों
देश हमेशा से कश्मीर मुद्दे पर भारत को घेरने की रणनीति बनाते रहे
हैं और विवादास्पद बयानबाजी करते रहे हैं । इसलिए इन दोनों देशों से
इससे ज्यादा उम्मीद की भी नहीं जा सकती । अनुच्छेद 370 के मुद्दे
पर चीन और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में भी काफी हल्ला मचा चुके
हैं, लेकिन इनके हाथ कुछ लगा नहीं है । इसलिए अब खिसियाहट में
एक बार फिर दोनों देशों ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्र शासित
प्रदेश का दर्जा मिलने पर जो चिल्ल-पों मचाई है, उसका भारत ने
सख्त लहजे में जवाब दे दिया है। कश्मीर का विवाद भारत और
पाकिस्तान के बीच है, लेकिन चीन जिस तरह से इसमें कूदता है, वह
हैरानी पैदा करता है। भारत के साथ रिश्तों को लेकर चीन हमेशा से
दोमुंहेपन का व्यवहार करता रहा है। तीन हफ्ते पहले ही जब चीनी
राष्ट्रपति शी जिनपिंग अनौपचारिक दौरे पर चेन्नई आए थे, तब लगा
था कि कश्मीर के मुद्दे पर चीन तार्किक और संतुलित रवैया
अपनाएगा और संभवत यही वजह थी कि चीन के राष्ट्रपति की इस
यात्रा के दौरान किसी भी स्तर पर कश्मीर का प्रसंग नहीं उठा था।
लेकिन अब चीन ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित
प्रदेश के दर्जें को भारत का गैरकानूनी फैसला कह कर नए विवाद
को जन्म दे डाला है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है, यह
तो चीन भी जानता-समझता है और पूरी दुनिया भी इसे मानती है।
ऐसे में उसके इस विरोध का कोई मतलब नहीं रह जाता है । चीन
के इस विरोध का कड़े शब्दों में जवाब देते हुए भारत से स्पष्ट कर
दिया है कि इन दोनों केंद्र शासित प्रदेशों के बारे में कोई भी फैसला
करना भारत का अंदरूनी मामला है और यह भारत की स्थायी नीति
के अनुरूप ही है। इसलिए उसे इस मामले में बोलने का कोई नैतिक
या कानूनी अधिकार नहीं है दरअसल, चीन कई बार लद्दाख से
लगी भारत-चीन सीमा पर घुसपैठ करता रहा है और लद्दाख के एक
हिस्से को अपना बताता रहा है। जबकि हकीकत यह है कि लद्दाख
के किसी भी इलाके पर चीन का कोई अधिकार नहीं है । इस बहाने
वह एक और सीमा विवाद को खड़ा करने की कोशिशें करता रहा
है। पाक अधिकृत कश्मीर के जिस बड़े हिस्से पर चीन ने कब्जा
कर रखा है और जिस पर वह अपनी सबसे महत्त्वाकांक्षी
परियोजना चीन - पाक आर्थिक गलियारे का निर्माण कर रहा है,
वह हिस्सा 1947 से पाकिस्तान के गैरकानूनी कब्जे में है ।449words
Danik jagran 430 words 100wpm
मह्ाराष्ट्र और हरियाणा में नई सरकारों का समुचित तरीके से गठन होने के
पहले ही झारखंड में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोषित होने से चुनावों
के सिलसिले से छुटकारे की जरूरत एक बार फिर महसूस हो रही है।
आखिर महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ ही झास्खंड विधानसभा के चुनाव
कराने की पहल क्यों नहीं हुई? इस सवाल का चाहे जी जवाब हो, इसकी
अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि झारखंड विधानसभा चुनाव खत्म होते
ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव करीब आ जाएंगे। दिल्ली विधानसभा
चुनाव के बाद बिहार विधानसभा चुनाव निकट आ जाएंगे। इस तरह यह
सिलसिला कभी खत्म नहीं होने वाला। बार-बार होने वाले चुनाव केवल
सरकारी खजाने पर बोझ ही नहीं बनते, वे शासन-प्रशासन के आवेग को
भी बाधित करते हैं। इसी के साथ वे राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं
को भी प्रभावित करते हैं। हालांकि कुछ समय पहले लोकसभा और
विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर बहस हुई थी, लेकिन वह
किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। इसका कारण यही रह्ा कि राजनीतिक
दलों ने एक साथ चुनाव पर अपेक्षित गंभीरता का परिचय नहीं दिया।
इसमें दोराय नहीं कि लोकसभा के साथ विधानसभाओं के चुनाव
कराने में कुछ समस्वाएं हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि उनका समाधान नहीं
हो सकता। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो ऐसा आसानी से किया जा
सकता है। एक साथ चुनाव के विरोध में जो तर्क दिए जाते हैं उनका महत्व
एक सीमा तक ही है, क्योंकि आजादी के बाद एक अर्से तक लोकसभा
और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे। आखिर जो काम
पहले होता रहा वह फिर क्यों नहीं हो सकता? एक साथ चुनाव को लेकर
एक बड़ी दलील यह है कि ऐसा होने से क्षेत्रीय दलों को घाटा हो सकता है।
इस दलील में कुछ वजन तो है, लेकिन इस कथित घाटे से बचने के लिए
लोकसभा चुनाव के दो या तीन साल बाद सभी बविधानसभाओं के चुनाव
एक साथ कराए जा सकते हैं। इस तरह पांच साल की अवधि में देश को
केवल दो बार ही चुनावों का सामना करना होगा-पहले लोकसभा चुनाव
का और फिर विधानसभाओं के चुनाव का। बेहतर हो कि राजनीतिक दल
इस फार्मूले पर सहमत हों। चूंकि झारखंड नक्सली हिंसा से ग्रस्त है इसलिए
यहां की 81 विधानसभा सीटों के लिए पांच चरणों में मतदान होेगा। क्या
छत्तीसगढ़ के मुकाबले झारखंड में नक्सलियों की चुनौती अधिक गंभीर
है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि करीब एक साल पहले छत्तीसगढ़ में
72 सीटों के लिए दो चरणों में ही मतदान हुआ था। स्पष्ट है कि इस पर
भी गंभीरता से विचार होना चाहिए कि आखिर नक्सली संगठन कब तक
चुनाव प्रक्रिया के लिए सिरदर्द बने रहेंगे?430 words
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