Editorial 7 nov
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Editorial dictation
Jansatta 80wpm 400 words
टिल्ली और आसपास के इलाकों में हवा की हालत जानलेवा होने
की ओर बढ़ने के बावजूद इसके फिलहाल पहचाने गए कारणों
से निपटने को लेकर संबंधित सरकारें जिस स्तर की अनदेखी बरत
रही हैं, उससे यही लगता है कि उन्हें इस बेहद गंभीर संकट की कोई
फिक्र नहीं है ! खबरों के मुताबिक पंजाब में मंगलवार को खेतों में
पराली जलाने की इस मौसम की सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज की गईं।
वहां के किसानों ने पराली जलाने पर प्रतिबंध के बावजूद साढ़े छह
हजार से ज्यादा जगहों पर अपने खेतों में पड़े फसल के अवशेषों के
निपटान के लिए उनमें आग लगाई। नतीजतन, पिछले एक-दो दिनों
में वायु
की
पर पराली जलाने के बाद फिर उसके बिगड़ने की आशंका जताई जा
रही है। यह स्थिति तब है जब एक दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा
था कि पराली जलाने और उसकी वजह से प्रदूषण पैदा करने वालों
से किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं हो सकती। बुधवार को एक
बार फिर शीर्ष अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाते
हुए कहा कि आप पूरी तरह नाकाम रहे हैं; अब समय आ गया है
जब उन अधिकारियों को दंडित किया जाए, जिन्हें किसानों को पराली
जलाने से रोकने की जिम्मेदारी दी गई थी।
दरअसल, पिछले कुछ सालों में धान की फसल तैयार होने और
उसके अवशेष के रूप में पराली से निजात पाने की अवधि जिस तरह
बदली है, उससे उपजी समस्या पर गौर करने के बजाय सरकारों ने
इसकी व्यापक अनदेखी की। अगर फसल तैयार होने और कटने का
समय सिमटा है और हवा के बहाव की वजह से पराली जलाना अब
एक बड़ी समस्या बन गया है तो इसकी पहचान और विश्लेषण कर
इसके हल का रास्ता निकालना किसकी जवाबदेही है? किसानों के
सामने विकल्पों का अभाव पराली जलाने को उनकी मजबूरी बनाता है
तो क्या सरकार को किसी ठोस योजना पर काम नहीं करना चाहिए.
ताकि इस मुश्किल का सामना आसानी से किया जा सके ? सवाल है
कि अगर कई सालों से समस्या की शक्ल कमोबेश एक ही तरह की
बनी हुई है तो संबंधित राज्यों की सरकारों ने इसके हल के लिए उचित
कदम क्यों नहीं उठाए? आज अगर सुप्रीम कोर्ट के सामने इन सरकारों
को फटकार लगाने की नौबत आ गई है तो इसमें क्या अस्वाभाविक है ?
सही है कि आमतौर पर हल साल इस मौसम में हवा में प्रदूषण की
समस्या गहराती है और इसके कई कारक होते हैं। 400words
Hindustan 90wpm 448words
प्याज एक बार फिर सुर्खियों में है। प्याज के सुर्खियों में आने के दो ही कारण होते हैं। एक तो तब, जब कम उपज के कारण प्याज की कीमतें आसमान पर चढ़ जाती हैं; दूसरे तब, जब प्याज का उत्पादन इतना ज्यादा हो जाता है कि जितना खर्च प्याज को खेत से मंडी में ले जाने में आता है, किसानों को उससे भी कम कीमत मिल रही होती है और बहुत से निराश किसान खेत में खड़ी फसल को जला देने को मजबूर हो जाते हैं। ये दोनों ही स्थितियां हर कुछ समय बाद आती हैं और जब भी यह संकट आता है, उस समस्या का कोई तात्कालिक हल खोजा जाने लगता है, जो हमारे कृषि बाजार की स्थाई परेशानी बन चुकी है। इस बार भी वही हो रहा है, जो पहले भी ऐसे मौकों पर होता आया है। पिछले तकरीबन एक महीने से प्याज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। जब भी ऐसा मौका आता है, पहला काम यही होता है कि प्याज के निर्यात को तुरंत रोक दिया जाता है, और प्याज कारोबार से जुडे़ व्यापारियों व आढ़तियों के यहां छापेमारी शुरू हो जाती है। ये दोनों कदम पिछले महीने ही उठा लिए गए थे। इनमें से खासकर निर्यात पर पाबंदी का असर भी दिखा। बाजार में प्याज पहले के मुकाबले ज्यादा उपलब्ध हुआ, तो कीमतें नीचे आती दिखाई दीं। तुरंत यह मान लिया गया कि संकट समाप्त हो चुका है। लेकिन उपज कम है, इसलिए बाजार की आपूर्ति सिर्फ निर्यात पाबंदी से स्थाई तौर पर बढ़ने वाली नहीं थी, इसलिए यह संकट फिर लौट आया। अब कृषि व्यापार से जुड़ी संस्थाएं दुनिया भर के बाजारों में प्याज खरीदने की संभावनाएं तलाशती फिर रही हैं।
लेकिन यह आसान नहीं है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है, खपत के मामले में तो यह शायद पहले ही नंबर पर होगा। बांग्लादेश, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों को भारतीय प्याज का निर्यात होता था। भारत से आपूर्ति बंद हो जाने के बाद ऐसे सारे देश अब दुनिया भर में प्याज खरीदते घूम रहे हैं। अब जब भारत भी इस बाजार में पहुंच रहा है, तो मांग अचानक बढ़ जाने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज की कीमतें तेजी से उछल रही हैं, यानी प्याज की उपज में कमी की जो हमारी एक घरेलू समस्या थी, वह देखते ही देखते एक अंतरराष्ट्रीय संकट के रूप में सामने आ खड़ी हुई है। अगर यही हाल रहा, तो प्याज की आपूर्ति तो सुधर सकती है, लेकिन इसकी कीमत बहुत ज्यादा नीचे आने की संभावना नहीं बनेगी। बेशक यह संकट बहुत लंबा चलने वाला नहीं है, उम्मीद है कि दिसंबर के अंत तक महाराष्ट्र्र से प्याज की नई फसल आने लगेगी, तो बाजार वापस सामान्य स्थिति की ओर लौट जाएगा। 448
Danik jagran
100wpm. 427 words
दिल्ली और उसके आसपास वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर को देखते
हुए सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली
सरकार के मुख्य सचिवों को फटकार लगाते हुए यह सही कहा कि करोड़ों
लोगों को यूं ही मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। उसने इन राज्यों को
यह आदेश भी दिया कि वे उन किसानों को सौ रुपवे प्रति क्विंटल के
हिसाब से प्रोत्साहन राशि दें जिन्होंने पराली नहीं जलाई। हालांकि सुप्रीम
कोर्ट ने यह कहा कि वह इस संदर्भ में धन की कमी की बात स्वीकार
नहीं करेगा, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राज्य सरकारें
पैसे की तंगी का रोना रो सकती हैं। वैसे वदि वे सुप्रीम कोर्ट के सख्त
रवैये के बाद पराली के बचे-खुचे अवशेष को जलाए जाने से रोकने में
सफल रहती हैं तो भी कहना कठिन है कि वायु प्रदूषण पर लगाम लग
जाएगी। चूंकि किसान पणाली इसलिए जलाते हैं कि उन्हें अपने खेत खाली
कर नई फसल की तैयारी करनी होती है इसलिए उसके निस्तारण की
कोई ठोस व्यवस्था तो करनी ही होगी। इसमें संदेह है कि राज्यों ने पराली
निस्तारण के कोई ठोस उपाय कर रखे हैं। चूंकि उनके पास कोई उपाय
नहीं इसीलिए तमाम चिंता के बाद भी पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर
प्रदेश में पराली जली।
केंद्र सरकार के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट को इससे परिचित होना चाहिए
था कि राज्य सरकारों ने पराली दहन रोकने के कोई उपाव नहीं कर रखे हैं।
उन्हें इससे भी अवगत होना चाहिए कि असल समस्या दिल्ली के पड़ोसी
राज्यों और खासकर हरियाणा और पंजाब में जरूरत से ज्यादा धान की
खेती होना है। धान की जरूरत से ज्यादा खेती तब हो रही है जब उसमें
पानी का कहीं अधिक इस्तेमाल होता है। क्या यह उचित नहीं होगा कि
किसानों को पराली न जलाने के एवज में प्रोत्साहन राशि देने के बजाय उन
फसलों को उगाने
की जरूरत नहीं रहती? निःसंदेह यह भी समझा जाना चाहिए कि पराली
दहन प्रदूषण का एकमात्र कारण नहीं। पराली दहन रोकने के साथ-साथ
दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य शहरों में बेहिसाब बढ़ते वाहनों की संख्या
को भी थामने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त इस पर भी गौर करने की
जरूरत है कि यातायात जाम वाहनों के उत्सर्जन को और जहरीला बनाता
है। वायु प्रदूषण की एक अन्य बड़ी वजह सड़कों एवं निर्माण स्थलों से
उड़ने वाली धूल भी है। आखिर प्रदूषण के इन कारणों का निवारण कब
होगा? यदि सुप्रीम कोर्ट वायुमंडल को दूषित करने वाले सभी कारणों के
निवारण पर ध्यान नहीं देता तो उसका सख्त रखैया कारगर नहीं होने वाला।
लिए प्रोत्साहित किवा जाए जिनके अवशेष जलाने
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