Ssc skill special 20

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Special skill test series 20

Grade D 90wpm 11 min 

माननीय सभापति महोदय,
पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती कहावत सामाजिक चिंतकों और राजनीतिज्ञों की जुबानी अक्सर उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों से होते पलायन पर चिंता जताते सुना जाना आम है। इस कहावत की सच्चाई पर कोई शक नहीं है वाकई पहाड़ी गाँवों में रहना बहुत कठिन है। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गड़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में
इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन। पलायन से हो रहे नफा नुकसान की
चिंताओं के बीच पहाड़ के गाँवों की हकीकत जानने निकलें तो पाएंगे की जिम्मेदार लोगों
की चिंता नकली है। 1 यदि चिंता असली होती तो खाली होते पहाड़ पर ऐसे लोग खुद घर
बनाकर रह रहे होते न तो सुविधासम्पन्न शहरों में रहकर मात्र सेमिनारी चिंतन मनन तक
सीमित रहते। राज्य बनने के 17 साल बाद किसी भी राजनेता ने उत्तराखण्ड की पीढ़ा को
समझने का प्रयास नहीं किया। राजनीति देश की रही हो या उत्तराखण्ड की सभी ने यही
माना कि उत्तराखण्ड का पानी और जवानी हमेशा से बहता ही आया है | इसे रोका भी
जा सकता है। इसका उपयोग राज्य या देशहित में भी किया जा सकता है । यह विचार किसी
के मन में आया नहीं 2 देश के प्रधानमंत्री ने पहली बार भगवान केदारनाथ को साक्षी मानकर
यह बात कही कि पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी अब पहाड़ के काम आएगा। 2022
तक उत्तराखण्ड की जनता के सहयोग से इस संकल्प को पूरा कर लेग । देश के प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने बाबा केदार के आंगन में उत्तराखंडवासियों को यह ख्वाब दिखाया है ।
मोदी ने केदारनाथ धाम के समक्ष यह बताने की कोशिश की कि वह सच्चे मन से उत्तराखण्ड
राज्य का विकास और यहां के लोगों का भला चाहने वाले हैं। वह चाहते हैं कि पहाड़ का
पानी और जबानी का 3 इसी पहाड़ के लिए इस्तेमाल किया जाए मोदी की बातों में कितनी
सच्चाई है या फिर वह उत्तराखंडियों को सब्जबाग दिखा रहे हैं यह तो भविष्य में ही तय
होगा, लेकिन प्रधानमंत्री बनने और उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश
के प्रधानमंत्री ने उत्तराखडियों के प्रति जो लगाव दिखाया है उससे तो यही लग रहा है कि
वह सचमुच इस राज्य का भला चाहते हैं वह चाहते हैं कि उत्तराखण्ड के चारों धाम भव्य
और दिव्य बन जाएं। यहां देश-विदेश के सैलानी आएं और विश्व में उत्तराखण्ड के चारों
धामों का महत्व बढ़ जाए। प्रधानमंत्री का 4कहना था कि अब वो वक्त आ गया है जब उस 
कहावत को खत्म कर दें जो कहती है कि पहाड़ का पानी और उसकी जवानी पहाड़ के काम
नहीं आती।

 महोदय,मुझे आज देश के सभी भागों से आए बड़े बड़े उद्योगपतियों व्यापक क्षेत्र में
कारोबार करने वाले प्रमुख व्यापारियों से मिलकर अपार हर्ष हो रहा है | भारतीय उद्योग
महासंघ के इस राष्ट्रीय सम्मेलन का एक सदस्य होना मेरे लिए अत्यंत गर्व की बात है। इस
संगठन के प्रति मेरी सदभावनाएं औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरणीय संरक्षण विषय में
मार्गदर्शन करने में इस संगठन से हमारी अपेक्षाएं क्या है। 5इससे भारतीय उद्योग महासंघ
भली-भांति परिचित है। यही एक कारण है कि मैंने पर्यावरण और वन मंत्रालय के स्कोप
परिसर में मेरी मेजबानी में चल रहे राज्य वन मंत्रियों के राष्ट्रीय परामर्श में से कुछ समय
निकाला है। ताकि अपने प्रश्नों के उत्तर दे सकूं और आपसे कुछ जानकारी प्राप्त कर सकूं ।
निर्वाह करने योग्य जीवन स्तर पुरातन भारतीय संस्कृति की स्वाभाविक विशेषताओं का एक
अभिन्न अंग रहा है। यहां के लोगों की जीवनशैलियाँ प्रकृति के अनुरूप हैं और उनका विकास
स्वाभाविक रूप से अस्थाई है। तथापि अन्य सामान्योक्तियों की भांति शांति पूर्ण एवं दार्शनिक
विचारधारा वाले पूर्व की6 यह तस्वीर भत्त्सना को पूर्ण रूप से उद्घाटित नहीं करती है । भारत
एक ऐसा देश भी है। जहां उद्यम भी पूरे उत्साह के साथ चलते हैं। यहां पर बड़े व्यवसाय
छोटे व्यवसाय और मामूली व्यवसाय भी ऐसे उत्साह एवं कौशल के साथ फलते- फूलते हैं जो
विश्व के अन्य भागों में यदा-कदा ही देखने को मिलता है। प्राचीन भारत में जहां आध्यात्मिक
दार्शनिक विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाले और संस्कृति के उच्च स्तर को प्राप्त करने
वाले ऋषि-मुनि हुए वहीं भारतवासी पिछले दो हजार वर्षों से भी अधिक समय से भारत में
और अन्य देशों के साथ पूरे उत्साह7 से व्यापार कर रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भारत विश्व के दो सौ विलक्षण देशों में से एक है। लेकिन
भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से यह अपने आप में एक उपमहाद्वीप है। भारत में विपुल एवं
विविध प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है इसकी नदियाँ और मरूस्थल इसके समुद्र तट और
पर्वत इसके वन और झीलें केवल तस्वीर का मात्र एक पार्श्व है । भारत की 120 करोड़ की
जनसंख्या इसकी सबसे बड़ी पूंजी है। विश्व में सबसे अधिक तकनीकी अहर्ता प्राप्त और
प्रशिक्षित व्यक्तियों की दृष्टि से भारत का स्थान तीसरा है । भारत में प्रौद्योगिकी में कुछ
सर्वोत्तम 8 संस्थाएं है। आज का युग जेट युग है। यदि हम अपने कार्यों में थोड़ा भी शिथिल
पड़ जाएं तो हमें यह अनुभव होगा कि हम पिछड़ गए हैं इसी के समानांतर एक दूसरी स्थिति
यह है कि आज आदमी के पास समय बहुत कम है।

स्पीकर महोदय, चिकित्सा कालेजों का वर्तमान
पाठ्यक्रम ब्रिटिश प्रणाली की देन है और इसमें व्यावहारिक
शिक्षा पूरी तरह से नहीं मिल  पाती । पाठ्यक्रमों का
विस्तार किया जाता है और कई बार उसमें विषयों को ठूँस ठूँस
कर भर दिया जाता है क्योंकि चिकित्सा विज्ञान का हमारा
ज्ञान दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है ।9 अधिकतर विषयों पर
पाठ्य-पुस्तकें  दुगुनी हो गई हैं और कुछ तो आकार में
तिगुनी भी हो गई है। इस प्रकार अस्पताल में वार्ड के
काम, रोगियों की देखभाल तथा सेवा पर ध्यान न देकर
पाठ्य-पुस्तकों की ओर ध्यान जाता है ताकि डिग्री
प्राप्त करने और परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उस विषय का
अध्ययन कर सकें। परंपरागत रूप से चिकित्सा शिक्षा के
प्रारंभिक डेढ़ वर्षों में बुनियादी विज्ञानों की शिक्षा दी जाती है।
इस अवधि में छात्र को  रोगियों से संपर्क करने का अवसर
नहीं दिया जाता है जबकि बाद में उसे उन्हीं रोगियों को ?
समझना और  उनका उपचार 10 करना होता है । 

Grade C 
110wpm 11min1222 words

माननीय सभापति महोदय,
पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम नहीं आती कहावत सामाजिक चिंतकों और राजनीतिज्ञों की जुबानी अक्सर उत्तराखंड के पर्वतीय हिस्सों से होते पलायन पर चिंता जताते सुना जाना आम है। इस कहावत की सच्चाई पर कोई शक नहीं है वाकई पहाड़ी गाँवों में रहना बहुत कठिन है। पलायन को लेकर जो भी परिभाषाएं गड़ी जाती हों, लेकिन हकीकत में
इसी कठिन जीवन से मुक्ति का नाम है पलायन। पलायन से हो रहे नफा नुकसान की
चिंताओं के बीच पहाड़ के गाँवों की हकीकत जानने निकलें तो पाएंगे की जिम्मेदार लोगों
की चिंता नकली है। 1 यदि चिंता असली होती तो खाली होते पहाड़ पर ऐसे लोग खुद घर
बनाकर रह रहे होते न तो सुविधासम्पन्न शहरों में रहकर मात्र सेमिनारी चिंतन मनन तक
सीमित रहते। राज्य बनने के 17 साल बाद किसी भी राजनेता ने उत्तराखण्ड की पीढ़ा को
समझने का प्रयास नहीं किया। राजनीति देश की रही हो या उत्तराखण्ड की सभी ने यही
माना कि उत्तराखण्ड का पानी और जवानी हमेशा से बहता ही आया है | इसे रोका भी
जा सकता है। इसका उपयोग राज्य या देशहित में भी किया जा सकता है । यह विचार किसी
के मन में आया नहीं 2 देश के प्रधानमंत्री ने पहली बार भगवान केदारनाथ को साक्षी मानकर
यह बात कही कि पहाड़ की जवानी और पहाड़ का पानी अब पहाड़ के काम आएगा। 2022
तक उत्तराखण्ड की जनता के सहयोग से इस संकल्प को पूरा कर लेग । देश के प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने बाबा केदार के आंगन में उत्तराखंडवासियों को यह ख्वाब दिखाया है ।
मोदी ने केदारनाथ धाम के समक्ष यह बताने की कोशिश की कि वह सच्चे मन से उत्तराखण्ड
राज्य का विकास और यहां के लोगों का भला चाहने वाले हैं। वह चाहते हैं कि पहाड़ का
पानी और जबानी का 3 इसी पहाड़ के लिए इस्तेमाल किया जाए मोदी की बातों में कितनी
सच्चाई है या फिर वह उत्तराखंडियों को सब्जबाग दिखा रहे हैं यह तो भविष्य में ही तय
होगा, लेकिन प्रधानमंत्री बनने और उत्तराखण्ड में भाजपा की सरकार बनने के बाद देश
के प्रधानमंत्री ने उत्तराखडियों के प्रति जो लगाव दिखाया है उससे तो यही लग रहा है कि
वह सचमुच इस राज्य का भला चाहते हैं वह चाहते हैं कि उत्तराखण्ड के चारों धाम भव्य
और दिव्य बन जाएं। यहां देश-विदेश के सैलानी आएं और विश्व में उत्तराखण्ड के चारों
धामों का महत्व बढ़ जाए। प्रधानमंत्री का 4कहना था कि अब वो वक्त आ गया है जब उस 
कहावत को खत्म कर दें जो कहती है कि पहाड़ का पानी और उसकी जवानी पहाड़ के काम
नहीं आती।

 महोदय,मुझे आज देश के सभी भागों से आए बड़े बड़े उद्योगपतियों व्यापक क्षेत्र में
कारोबार करने वाले प्रमुख व्यापारियों से मिलकर अपार हर्ष हो रहा है | भारतीय उद्योग
महासंघ के इस राष्ट्रीय सम्मेलन का एक सदस्य होना मेरे लिए अत्यंत गर्व की बात है। इस
संगठन के प्रति मेरी सदभावनाएं औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरणीय संरक्षण विषय में
मार्गदर्शन करने में इस संगठन से हमारी अपेक्षाएं क्या है। 5इससे भारतीय उद्योग महासंघ
भली-भांति परिचित है। यही एक कारण है कि मैंने पर्यावरण और वन मंत्रालय के स्कोप
परिसर में मेरी मेजबानी में चल रहे राज्य वन मंत्रियों के राष्ट्रीय परामर्श में से कुछ समय
निकाला है। ताकि अपने प्रश्नों के उत्तर दे सकूं और आपसे कुछ जानकारी प्राप्त कर सकूं ।
निर्वाह करने योग्य जीवन स्तर पुरातन भारतीय संस्कृति की स्वाभाविक विशेषताओं का एक
अभिन्न अंग रहा है। यहां के लोगों की जीवनशैलियाँ प्रकृति के अनुरूप हैं और उनका विकास
स्वाभाविक रूप से अस्थाई है। तथापि अन्य सामान्योक्तियों की भांति शांति पूर्ण एवं दार्शनिक
विचारधारा वाले पूर्व की6 यह तस्वीर भत्त्सना को पूर्ण रूप से उद्घाटित नहीं करती है । भारत
एक ऐसा देश भी है। जहां उद्यम भी पूरे उत्साह के साथ चलते हैं। यहां पर बड़े व्यवसाय
छोटे व्यवसाय और मामूली व्यवसाय भी ऐसे उत्साह एवं कौशल के साथ फलते- फूलते हैं जो
विश्व के अन्य भागों में यदा-कदा ही देखने को मिलता है। प्राचीन भारत में जहां आध्यात्मिक
दार्शनिक विचारधाराओं का प्रतिपादन करने वाले और संस्कृति के उच्च स्तर को प्राप्त करने
वाले ऋषि-मुनि हुए वहीं भारतवासी पिछले दो हजार वर्षों से भी अधिक समय से भारत में
और अन्य देशों के साथ पूरे उत्साह7 से व्यापार कर रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भारत विश्व के दो सौ विलक्षण देशों में से एक है। लेकिन
भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से यह अपने आप में एक उपमहाद्वीप है। भारत में विपुल एवं
विविध प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है इसकी नदियाँ और मरूस्थल इसके समुद्र तट और
पर्वत इसके वन और झीलें केवल तस्वीर का मात्र एक पार्श्व है । भारत की 120 करोड़ की
जनसंख्या इसकी सबसे बड़ी पूंजी है। विश्व में सबसे अधिक तकनीकी अहर्ता प्राप्त और
प्रशिक्षित व्यक्तियों की दृष्टि से भारत का स्थान तीसरा है । भारत में प्रौद्योगिकी में कुछ
सर्वोत्तम 8 संस्थाएं है। आज का युग जेट युग है। यदि हम अपने कार्यों में थोड़ा भी शिथिल
पड़ जाएं तो हमें यह अनुभव होगा कि हम पिछड़ गए हैं इसी के समानांतर एक दूसरी स्थिति
यह है कि आज आदमी के पास समय बहुत कम है।

स्पीकर महोदय, चिकित्सा कालेजों का वर्तमान
पाठ्यक्रम ब्रिटिश प्रणाली की देन है और इसमें व्यावहारिक
शिक्षा पूरी तरह से नहीं मिल  पाती । पाठ्यक्रमों का
विस्तार किया जाता है और कई बार उसमें विषयों को ठूँस ठूँस
कर भर दिया जाता है क्योंकि चिकित्सा विज्ञान का हमारा
ज्ञान दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा है ।9 अधिकतर विषयों पर
पाठ्य-पुस्तकें  दुगुनी हो गई हैं और कुछ तो आकार में
तिगुनी भी हो गई है। इस प्रकार अस्पताल में वार्ड के
काम, रोगियों की देखभाल तथा सेवा पर ध्यान न देकर
पाठ्य-पुस्तकों की ओर ध्यान जाता है ताकि डिग्री
प्राप्त करने और परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए उस विषय का
अध्ययन कर सकें। परंपरागत रूप से चिकित्सा शिक्षा के
प्रारंभिक डेढ़ वर्षों में बुनियादी विज्ञानों की शिक्षा दी जाती है।
इस अवधि में छात्र को  रोगियों से संपर्क करने का अवसर
नहीं दिया जाता है जबकि बाद में उसे उन्हीं रोगियों को ?
समझना और  उनका उपचार 10 करना होता है । आयुविज्ञ्ञान.
कालेज में प्रवेश करने वाले नए छात्रों द्वारा शरीर रचना
विज्ञान और शरीर  क्रिया विज्ञान विभाग में शवों, कटे-फटे
अंगों, मेढ़कों तथा कुत्तों के अंगो से भरे वातावरण में पढ़ाई 
की शुरूआत की जाती है। अभी तक चिकित्सा की पढ़ाई ।
के जो परंपरागत तरीके अपनाए गए हैं और हमारे देश में 
जिनकी नकल की गई है वे निरर्थक सिद्ध हुए हैं।
चिकित्सा कालेज में प्रत्येक विषय के विभाग में
इस बात  की कोशिश की जाती है कि पाठ्यक्रम से कुछ ही
घंटों में ज्यादा से ज्यादा क्या पढ़ाया जा सकता है और
प्रत्येक विषय के 11 केवल कुछ पहलुओं को जो चिकित्सा के
लिए लागू किए जा सकते हैं,
के बिना और असंबद्ध रूप से समग्र रूप में पढ़ाने का
प्रयास किया  जाता है। इसलिए हमारी वर्तमान चिकित्सा
शि:क्षा प्रणाली में पाठ्यक्रम से पुराने तथा अनावश्यक विषयों
के काफी भागों को काटने-छाँटने की आवश्यकता है ।
समस्या यह है कि पाठ्यक्रमों के स्तर में गिरावट लाए बिना
वैज्ञानिक  विषयों की सभी बातों की शिक्षा देकर और
अधिक संख्या में चिकित्सक तैयार करने की माँग को पूरा
किया जा सके । इस उद्देश्य को प्राप्त करने
पाठ्यक्रमों की न केवल गुणवत्ता और विषय की
आलोचनात्मक रूप से जाँच 12करने की आवश्यकता है।
बल्कि सैद्धांतिक चिकित्सीय और प्रयोगशाला के शिक्षण
के तरीकों में परिवर्तन की आवश्यकता है। 1222 words


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