Editorial dictation 5 nov
स्टेनो हेल्प pp
Editorial dictation
5 nov
danik bhaskar80wpm
394words
व्हाट्सअप जासूसी के मामले में सरकार जितना बचने का प्रयास कर रही है उतनी ही
घिरती जा रही है। राज का खुलासा होने के बाद केंद्रीय दूरसंचार मंत्री का जवाब था
'व्हाट्सअप से स्पष्टीकरण मांगा गया है। कंपनी का फौरन प्रत्युत्तर आया 'यह सब
कुछ सरकार को मई में ही बताया जा चुका है। सरकार ने इस पर कहा कि 'वह जवाब
बेहद टेक्निकल था, लिहाजा कुछ भी समझ में नहीं आया इस पर कंपनी ने कहा कि
'सितम्बर में दोबारा बताया गया था। जैसे ही सरकार ने इस बार इसे ख़ारिज करना
चाहा, व्हाट्सअप और मीडिया ने मंत्रालय की वेबसाइट को दिखाया जिस पर कंपनी
का सरकार को और प्लेटफार्म यूजर्स को आगाह करने वाला पत्र स्वयं सरकारी एजेंसी
ने अपलोड किया था। ध्यान रहे कि मई में ही आम -चुनाव हुए थे। उधर व्हाट्सअप
के एन्क्रिप्टेड विषय-वस्तु में सेंध लगाकर देश के कुल 127 लोगों की जासूसी करने
वाली इस्रायली कंपनी एनएसओ अपने बचाव में लगातार कह रही है कि वह अपने
जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस का लाइसेंस केवल सरकार और उसकी वैध संस्थाओं को
ही देती है। इस पूरे प्रकरण में प्रदर्शित हो रहा है कि बचाव के लिए भी सामान्य बुद्धि का
इस्तेमाल भी सरकारी अफसर नहीं कर रहे हैं। दुनिया के हर प्रजातंत्र में सरकारी खुफिया
एजेंसियां इस तरह कानूनेतर काम करती हैं, क्योंकि आतंकियों या देश के खिलाफ
साजिश करने वालों को पकड़ना है तो यह एक क्षम्य अपराध माना जाता है। लेकिन,
जब यह हथियार राजनीतिक विरोधियों पर और ज्यादा तादाद में इसे लागू किया जाने
लगता है तो सरकार जनता की नजरों में गिरने लगती है असली मामला कुछ और है।
दरअसल सरकार व्हाट्सअप पर लगातार दवाव डाल रही है कि वह उसे दुर्भावनापूर्ण
कंटेंट भेजने के सोस तक पहुंचने के लिए एन्क्रिप्टेड को डिक्रिप्ट (खोलने) करने
की सुविधा दे। व्हाट्सअप का कहना है कि उसने पूरी दुनिया में यह सुविधा किसी भी
सरकार को नहीं दी है। आज जिस तरह से भारत में आतंकी गतिविधियों के लिए और
नए आतंकी भर्ती करने में इस तरह के तमाम प्लेटफार्मों का इस्तेमाल हो रहा है, उससे
सरकारी खुफिया एजेंसियों के पास दो ही विकल्प हैं या तो वह सीधे कंपनी से यह
सुविधा हासिल करे या बगैर बताए पेगासस जैसे सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल करे। सरकार
गलत नहीं है, लेकिन अताकिक बचाव से आरोप पुख्ता हो रहे हैं।सच क्या है ,ये अब आने वाले दिनों में ही पता चलेगा।394
Hindustan 90wpm 445words
बढ़ते प्रदूषण से राहत की कम होती उम्मीदों के बीच राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की स्थितियां लगातार जिस तरह से विषम होती जा रही हैं, उसमें निजी गाड़ियों के सम-विषम नंबरों की पाबंदी से बहुत ज्यादा उम्मीद बांधी भी नहीं जा सकती। वह भी तब, जब यह कवायद पूरे भूगोल के एक छोटे से हिस्से में लागू हो रही हो और उसमें भी दोपहिया वाहनों, महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे वाहनों, बच्चों को स्कूल ले जा रहे निजी वाहनों को छूट जैसी कई चीजें, कई रियायतें शामिल हों। यह भी सच है कि हालात जिस तरह से और जिस तेजी से खराब हुए हैं, उनमें तत्काल बहुत ज्यादा विकल्प भी सामने नहीं दिखाई दे रहे। हो सकता है कि सम-विषम का यह तरीका अंतिम विश्लेषण में किसी दिखावे की तरह लगे, या यह लगे कि इतने मामूली नतीजे के लिए इतनी बड़ी कवायद की क्या जरूरत थी, लेकिन इसे एक अलग तरह से भी देखने की जरूरत है। हालात जिस तरह से खराब हो रहे हैं, उसमें कुछ नए तरीके आजमाने की जरूरत है। इस सिलसिले में सम-विषम का तरीका एक ऐसा प्रयोग है, जिसकी हम लंबे समय से चर्चा करते रहे हैं। कई देशों में आजमाया भी जा चुका है। दिल्ली में पहले भी इसे लागू किया जा चुका है, परस्पर विरोधी दावों के बीच नतीजे तब भी बहुत ज्यादा उत्साहवर्द्धक नहीं रहे। लेकिन जब प्रदूषण का स्तर सिर से गुजर रहा हो और सांस लेने तक में दिक्कत आ रही हो, तब ऐसे प्रयोग करने में कोई हर्ज भी नहीं है।
हालांकि ऐसे प्रयोग से बहुत ज्यादा उम्मीद बांधने का भी कोई अर्थ नहीं है। कुछ बडे़ नतीजे हासिल करने के लिए एक उपाय यह हो सकता है कि दिल्ली से बाहर पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में इसे विस्तार दिया जाए और इसमें दी गई रियायतों को भी कम या खत्म कर दिया जाए। हालांकि यह भी शायद बहुत ज्यादा संभव नहीं है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र अपनी सक्रियता और उत्पादकता के लिए बहुत कुछ निजी वाहनों पर ही निर्भर है। इसका एक कारण राजधानी क्षेत्र की विशाल आबादी के अनुपात में सार्वजनिक यातायात के इन्फ्रास्ट्रक्चर का कम होना भी है। यह क्षेत्र सार्वजनिक यातायात की सुविधाएं तो बहुत ज्यादा विकसित नहीं कर सका, लेकिन इसने अपनी तेज तरक्की के साथ आबादी के एक हिस्से को यह हैसियत जरूर दे दी है कि वह अपने आवागमन के लिए खुद अपनी गाड़ी खरीद सके। दिल्ली की गिनती देश के ऐसे महानगरों में होती है, जहां लोगों के पास या तो अपनी गाड़ी है या फिर उनके पास अपनी गाड़ी खरीदने का सपना है। इसलिए यहां गाड़ियां लगातार बढ़ती जा रही हैं और समस्याएं भी। सम-विषम को हम भले ही सफलता से लागू कर लें, 445words
Danik jagran 100wpm 430 words
देश की राजधानी दिल्ली में तीस हजारी अदालत परिसर में वकीलों और
पुलिस के बीच भिड़ंत के बाद देश के अन्य हिस्सों में वकीलों के हड़ताल
पर जाने का औचित्य समझना कठिन है। इसकी कहीं कोई जरूरत नहीं
थी, लेकिन देश भर में वकीलों के विभिन्न समूहों ने न्यायिक कार्य से
विरत रहना जरूरी समझा। इसके चलते देश के कई उच्च न्यायालयों में
भी बादकारियों को निराश होना पड़ा। क्या कोई इस पर विचार करेगा कि
बकीलों की हड़ताल से देश भर में जो लाखों परेशान हुए उनका क्या
दोष था? आखिर उन्हें किस बात की सजा मिली? कानून की रक्षक
पुलिस और कानून के सहायक वकीलों के बीच रिश्ते किस तरह बिगड़
रहे हैं, इसका एक नमूना गत दिवस कानपुर में भी देखने को मिला। यहां
वकीलों और पुलिस कर्मियों के बीच मामूली विवाद के बाद ककीलों
ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय का घेराव करने का फैसला
किया। इस घेराव के दौरान पत्थरबाजी के साथ तोड़फोड़ भी की गई।
क्या इसकी जरूरत थी? दुर्भाग्य यह है कि अब ऐसा ही अधिक होता है।
आखिर विरोध दर्ज कराने के लिए हिंसा का सहारा लेने का क्या मतलब?
चिंता की बात यह है कि वकीलों और पुलिस के बीरीच हिंसक टकराव अब
बहुत आम हो गया है।
देश के किसी न किसी हिस्से में वकीलों और पुलिस के बीच रह-रहकर
वैसा टकराव देखने को मिलता ही रहता है जैसा पहले दिल्ली और फिर
कानपुर में देखने को मिला। इन दोनों घटनाओं के कुछ दिनों पहले ही
उत्तर प्रदेश के बिजनौर में वकील और पुलिस आमने-सामने आ गए थे ।
यह ठीक नहीं कि तीसहजारी अदालत परिसर की घटना का हिंसक विरोध
थमने का नाम नहीं ले रहा है। गत दिवस भी दिल्ली में कुछ अन्य अदालत
परिसरों में वकीलों ने उग्रता तो दिखाई ही, वे पुलिस को निशाना बनाते भी
दिखे। निःसंदेह वकीलों और पुलिस के बीच हिंसक टकराव की घटनाओं
पर किसी एक पक्ष को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की
घटनाओं में कभी पुलिस का मनमाना व्यवहार जिम्मेदार होता है तो कभी
बकीलों का। कई बार दोनों पक्ष समान रूप से जिम्मेदार होते हैं। कहना
कठिन है कि तीस हजारी की घटना के लिए कौन कितना जिम्मेदार है,
लेकिन इसमें संदेह नहीं कि दोनों पक्षों की ओर से संयम का परिचय नहीं
दिया गया। जब जिसे मौका मिला उसने अराजकता का परिचय दिया। जैसे
पुलिस का मनमाना व्यवहार नया नहीं उसी तरह यह भी सही है कि बकीलों
के समूह भी जब-तब हिंसा का सहारा लेना पसंद करते हैं। यह एक तरह
की भीड़ की हिंसा का ही रूप है। इस पर रोक लगनी जरूरी है।430
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