20-05-2020
कुछ तो चीन के अपारदर्शी रवैये और कुछ अमेरिका की घरेलू राजनीति
ने दोनों देशों के रिश्ते को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां से यह एक अप्रिय रुख भी ले सकता है। और यकीनन, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गहरा असर पडे़गा। अमेरिकी
कांग्रेस में प्रभावशाली रिपब्लिकन सदस्य मार्क ग्रीन ने एक ऐसा विधेयक पेश किया
है, जिसने यदि कानून का रूप लिया, तो फिर चीन से अमेरिकी कंपनियों का पलायन तेज हो जाएगा।
प्रस्तावित ‘ब्रिंग अमेरिकन कंपनीज होम ऐक्ट’में सरकार से यह अपेक्षा की गई है कि चीन छोड़कर स्वदेश आने वाली
कंपनियों का वह सौ फीसदी स्थानांतरण भार वहन करे और उनके चीनी आयात पर आरोपित लेवी
को भी माफ किया जाए। ग्रीन द्वारा पेश एक अन्य विधेयक अमेरिकी सुरक्षा के लिहाज से
संवेदनशील कंपनियों में चीन की रणनीतिक बढ़त को रोकने की मांग करता है। उधर पेंटागन
ने भी मिसाइलों, युद्ध-सामग्रियों व हाइपरसोनिक हथियारों के
निर्माण में इस्तेमाल होने वाले दुर्लभ खनिज पदार्थों के लिए चीन पर निर्भरता खत्म
करने वाला एक विधेयक तैयार किया है। ये सारी कवायदें बता रही हैं कि वाशिंगटन
बीजिंग पर सिर्फ शाब्दिक प्रहार में नहीं जुटा, बल्कि वह उसके
विरुद्ध ज्यादा ठोस रणनीति बना रहा है।
अमेरिका में चंद महीने बाद ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, और कोरोना महामारी में वहां 90 हजार से अधिक लोगों की मौत ने डोनाल्ड ट्रंप की सारी चुनावी रणनीति बिगाड़ दी है। यही वजह है कि वह कभी पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर निशाना साध रहे हैं, तो कभी डब्ल्यूएचओ को धमका रहे हैं, और चीन के विरुद्ध अपने देश में राष्ट्रवादी ज्वार पैदा करने की कोशिश तो खैर कर ही रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि कोविड-19 मामले में चीनी रुख से दुनिया के काफी सारे देश नाराज हैं, और शायद विश्व जनमत को भांपते हुए ही वह वायरस-संकट की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच में सहयोग के लिए राजी भी हुआ है। दुनिया के 60 से अधिक देश जानना चाहते हैं कि इस महामारी की रोकथाम में क्या डब्ल्यूएचओ ने वाकई कोई लापरवाही बरती और वह बीजिंग के आगे झुका, जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति दावा करते हैं? इसकी जांच और नतीजे आने में तो वक्त लगेगा, पर कोरोना के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा है, उससे उबरने के रास्ते तलाशने में तमाम देश जुट गए हैं।
कई अमेरिकी कंपनियां अपनी सरकार का रुख देखते हुए पहले ही चीन से निकल चुकी हैं। अब आम अमेरिकियों में चीन के प्रति जो भावना इस वक्त है, उसका चुनावी लाभ ट्रंप को मिले न मिले, मगर इतना तो तय है कि नए राष्ट्रपति के लिए उसको नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। ऐसी सूरत में पैदा होने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए ही भारत सरकार ने अपने राज्यों से कहा है कि वे अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित करने का प्रयास करें। बताया जा रहा है कि लगभग 1,000 अमेरिकी कंपनियों से भारत संपर्क भी साध चुका है। हालांकि यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो लगातार चलती ही रहती है, लेकिन कोरोना से उपजे हालात ने इसे गति दे दी है। भारतीय राजनय के लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण घड़ी है। देश की अर्थव्यवस्था में जोश भरने के लिए उसे जहां ऐसी अमेरिकी कंपनियों को आमंत्रित करना है, वहीं बीजिंग से अपने रिश्ते को पटरी पर भी बनाए रखना है।
अमेरिका में चंद महीने बाद ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, और कोरोना महामारी में वहां 90 हजार से अधिक लोगों की मौत ने डोनाल्ड ट्रंप की सारी चुनावी रणनीति बिगाड़ दी है। यही वजह है कि वह कभी पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर निशाना साध रहे हैं, तो कभी डब्ल्यूएचओ को धमका रहे हैं, और चीन के विरुद्ध अपने देश में राष्ट्रवादी ज्वार पैदा करने की कोशिश तो खैर कर ही रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि कोविड-19 मामले में चीनी रुख से दुनिया के काफी सारे देश नाराज हैं, और शायद विश्व जनमत को भांपते हुए ही वह वायरस-संकट की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच में सहयोग के लिए राजी भी हुआ है। दुनिया के 60 से अधिक देश जानना चाहते हैं कि इस महामारी की रोकथाम में क्या डब्ल्यूएचओ ने वाकई कोई लापरवाही बरती और वह बीजिंग के आगे झुका, जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति दावा करते हैं? इसकी जांच और नतीजे आने में तो वक्त लगेगा, पर कोरोना के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा है, उससे उबरने के रास्ते तलाशने में तमाम देश जुट गए हैं।
कई अमेरिकी कंपनियां अपनी सरकार का रुख देखते हुए पहले ही चीन से निकल चुकी हैं। अब आम अमेरिकियों में चीन के प्रति जो भावना इस वक्त है, उसका चुनावी लाभ ट्रंप को मिले न मिले, मगर इतना तो तय है कि नए राष्ट्रपति के लिए उसको नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। ऐसी सूरत में पैदा होने वाले अवसरों का लाभ उठाने के लिए ही भारत सरकार ने अपने राज्यों से कहा है कि वे अमेरिकी कंपनियों को आकर्षित करने का प्रयास करें। बताया जा रहा है कि लगभग 1,000 अमेरिकी कंपनियों से भारत संपर्क भी साध चुका है। हालांकि यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो लगातार चलती ही रहती है, लेकिन कोरोना से उपजे हालात ने इसे गति दे दी है। भारतीय राजनय के लिए यह काफी चुनौतीपूर्ण घड़ी है। देश की अर्थव्यवस्था में जोश भरने के लिए उसे जहां ऐसी अमेरिकी कंपनियों को आमंत्रित करना है, वहीं बीजिंग से अपने रिश्ते को पटरी पर भी बनाए रखना है।
कोरोना संकट के
चलते गांव-घर लौटने को बेताब कामगारों के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चला रही
केंद्र सरकार को यदि यह फैसला लेना पड़ा कि अब इन ट्रेनों के संचालन के लिए राज्यों
की अनुमति आवश्यक नहीं तो इसका सीधा मतलब यही है कि वह राज्य सरकारों की अड़ंगेबाजी
से आजिज आ गई है। कई राज्य सरकारें कामगारों की चिंता में दुबली होती तो दिख रही
हैं, लेकिन वे इसके लिए इच्छुक नहीं कि पर्याप्त संख्या में
श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलें। इस अनिच्छा का कारण बड़ी संख्या में घर लौटते कामगारों
की सेहत की जांच और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी से बचना है।
यदि राज्य
सरकारें वांछित संख्या में श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के संचालन में रेल मंत्रालय का
सहयोग कर रही होतीं तो तमाम कामगार पैदल, साइकिल अथवा
ट्रकों के जरिये असुरक्षित तरीके से घर लौटने को विवश नहीं होते। अच्छा होगा कि राज्य सरकारें यह समझें कि गांव लौटने का मन
बना चुके कामगारों को रोका नहीं जा सकता। जब कामगार लौटने की ठान ही चुके हैं तब
फिर उचित यही है कि राज्य सरकारें उनकी सुरक्षित वापसी में केंद्र सरकार का सहयोग
करें। देखना है कि रेल मंत्रालय की ओर से तय की गई नई व्यवस्था में सभी राज्य
सरकारें सहयोग करने के लिए आगे आती हैं या नहीं?
अब जब केंद्र
सरकार ने यह तय कर लिया है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के मामले में राज्यों की
सहमति आवश्यक नहीं तब फिर उसे आम यात्रियों के लिए भी सामान्य ट्रेनों के संचालन
की तैयारी करनी चाहिए। आखिर 15 जोड़ी राजधानी
ट्रेनें पहले से ही चल रही हैं। अभी इन ट्रेनों की सुविधा चुनिंदा शहरों के लोग ही
उठा पा रहे हैं। इस सुविधा की आवश्यकता अन्य शहरों के लोगों को भी है। सामान्य
ट्रेनों का संचालन बढ़ने से केवल आम लोगों को राहत ही नहीं मिलेगी, बल्कि कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में आसानी भी होगी।
समझना कठिन है कि
जब श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जा रही है तब फिर अन्य ट्रेनों की संख्या
बढ़ाने में संकोच क्यों किया जा रहा है? आखिर ऐसा तो है
नहीं कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के मुकाबले सामान्य ट्रेनों में शारीरिक दूरी के
नियम का पालन करना कठिन है। सच तो यह है कि स्थिति इसके उलट है। यह देखने में आ
रहा है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में शारीरिक दूरी के नियम का पालन कराना कहीं
मुश्किल हो रहा है। चूंकि कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा आसानी से टलने वाला
नहीं और उसके साये में जीवन-यापन करने के अलावा और कोई उपाय नहीं इसलिए सामान्य ट्रेनों
के संचालन में और देरी नहीं की जानी चाहिए।965
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