08-05-2020 editorial dictation
आंध्र प्रदेश के आरआर वेंकटपुरम गांव में स्थित केमिकल प्लांट
से गैस का रिसना जितना चिंताजनक है, उससे कहीं
अधिक दुखद है, गैस रिसाव से लोगों की मौत। रात करीब तीन
बजे इस गांव में हुए रिसाव का असर आसपास के कम से कम 20 गांवों तक पहुंच गया। लोगों को जानकारी नहीं थी, वे गैस से बचने के लिए घरों में छिपने की बजाय बेचैन होकर सड़कों
पर दौड़ पडे़ और जहरीली गैस की चपेट में आ गए। दोपहर होने तक 10 से ज्यादा लोगों की मौत की सूचना आ गई और सैकड़ों
लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही थी। आंध्र प्रदेश सरकार ने राजकीय रिवाज के हिसाब
से एक लाख से एक करोड़ तक का मुआवजा घोषित कर दिया है। बचाव के तमाम इंतजाम किए जा
रहे हैं, आपदा प्रबंधन की टीमें तैनात कर दी गई हैं
और शाम होने से पहले ही गैस के खतरे को पूरी तरह काबू में कर लिया गया है। इस
हादसे पर प्रधानमंत्री सहित अनेक विदेशी नेताओं ने भी दुख जताया है। दक्षिण कोरिया
की उस कंपनी और दक्षिण कोरिया के राजदूत ने भी हादसे को दुखद बताते हुए अपनी
संवेदनाओं का इजहार किया है। कोरोना का कहर झेल रहे देश में हुआ यह हादसा हमें कई
प्रकार से सोचने को विवश करता है और जांच-समीक्षा की भी मांग करता है। अव्वल तो यह
हादसा दूसरे ऐसे रासायनिक और प्लास्टिक बनाने वाले कारखानों के लिए सबक है।
लॉकडाउन में बंद कारखानों में अब जब काम तेज होगा, तो उनमें पूरी
सावधानी बरतने की जरूरत है। बताया जा रहा है कि इस कारखाने में करीब 40 दिनों के बाद काम शुरू हुआ था। जाहिर है, इतने दिनों से बंद पड़ी गैस की टंकियां और रसायन भंडार खास
तवज्जो के साथ नई शुरुआत मांगेंगे। ऐसे तमाम कारखानों के लिए न केवल दिशा-निर्देश
जारी होने चाहिए, बल्कि इन कारखानों के प्रबंधकों को स्वयं
भी सतर्कता के साथ फिर काम चालू करना चाहिए।
इस गैस रिसाव से भोपाल गैस त्रासदी की याद आना स्वाभाविक है। लगभग 36 साल पहले हुआ वह हादसा लोगों की दिमाग से निकला नहीं है, लेकिन जिस तरह की समझ और सावधानी उस हादसे के बाद से हमारे औद्योगिक व रिहायशी व्यवहार में आनी चाहिए थी, वह नदारद है। क्या भोपाल त्रासदी के बाद तैयार किए गए तमाम बचाव या आपदा प्रबंधन के दिशा-निर्देश हम भूल गए? क्या ऐसे जहरीले कारखानों के पास बसे लोगों को जागरूक या प्रशिक्षित नहीं किया जा रहा है? क्या ऐसे कारखानों के आसपास जागरूकता प्रयास केवल दिखावा हैं? डॉक्टर और विशेषज्ञ यह फिर याद दिला रहे हैं कि किसी गैस की दुर्गंध होने पर गीले कपडे़ से नाक, मुंह ढककर, खिड़की-दरवाजे बंद करके अपने घर में छिप जाना भी एक बुनियादी बचाव उपाय हो सकता है।
अब नए सिरे से यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे कारखाने आबादी के बीच न रहें। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना भी पुराने शहर के बीचो-बीच स्थित था और त्रासदी की वजह बना था। यह हादसा भी हमें संकेत कर रहा है कि ऐसे कारखाने आबादी के बीच रहे, तो कभी भी जानलेवा साबित हो सकते हैं। ऐसे कारखाने कहीं भी खोलने की बजाय एक निश्चित क्षेत्र में सुरक्षित ढंग से बनाए जाएं। सरकारों, कंपनियों और स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे हादसे देश में फिर कहीं न हों।
इस गैस रिसाव से भोपाल गैस त्रासदी की याद आना स्वाभाविक है। लगभग 36 साल पहले हुआ वह हादसा लोगों की दिमाग से निकला नहीं है, लेकिन जिस तरह की समझ और सावधानी उस हादसे के बाद से हमारे औद्योगिक व रिहायशी व्यवहार में आनी चाहिए थी, वह नदारद है। क्या भोपाल त्रासदी के बाद तैयार किए गए तमाम बचाव या आपदा प्रबंधन के दिशा-निर्देश हम भूल गए? क्या ऐसे जहरीले कारखानों के पास बसे लोगों को जागरूक या प्रशिक्षित नहीं किया जा रहा है? क्या ऐसे कारखानों के आसपास जागरूकता प्रयास केवल दिखावा हैं? डॉक्टर और विशेषज्ञ यह फिर याद दिला रहे हैं कि किसी गैस की दुर्गंध होने पर गीले कपडे़ से नाक, मुंह ढककर, खिड़की-दरवाजे बंद करके अपने घर में छिप जाना भी एक बुनियादी बचाव उपाय हो सकता है।
अब नए सिरे से यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे कारखाने आबादी के बीच न रहें। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड का कारखाना भी पुराने शहर के बीचो-बीच स्थित था और त्रासदी की वजह बना था। यह हादसा भी हमें संकेत कर रहा है कि ऐसे कारखाने आबादी के बीच रहे, तो कभी भी जानलेवा साबित हो सकते हैं। ऐसे कारखाने कहीं भी खोलने की बजाय एक निश्चित क्षेत्र में सुरक्षित ढंग से बनाए जाएं। सरकारों, कंपनियों और स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे हादसे देश में फिर कहीं न हों।
रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को महामारी कोविड-19 के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए जिन
उपायों की घोषणा की उनका आम तौर पर स्वागत हुआ है, लेकिन बात तब बनेगी जब इन उपायों का
सकारात्मक असर जमीन पर भी दिखाई देगा। रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए कदमों से
पूंजी बाजार में नकदी की उपलब्धता तो आसान होगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि
कोरोना वायरस से उपजी महामारी के पांव पसारने के पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था
सुस्ती के दौर से गुजर रही थी।
रिजर्व बैंक ने बैंकों को कर्ज
वितरण के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से रिवर्स रेपो दर में कटौती करने के
साथ ही एनपीए से संबंधित प्रावधानों में भी ढील दी है। इससे बैंकों को कर्ज देने
में आसानी अवश्य होगी, लेकिन
देखना यह होगा कि कारोबारी कर्ज लेकर अपना उद्यम बढ़ाने के लिए आगे आते हैं या नहीं? वे तो तभी उत्साहित होंगे जब मांग बढ़ेगी।
मौजूदा माहौल में मांग बढ़ना आसान नहीं, क्योंकि कामकाज ठप है और लोग घर बैठे
हैं। बहुत से लोग अपने आर्थिक भविष्य को लेकर भी चिंतित हो उठे हैं। ऐसे माहौल में
मांग बढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं, लेकिन इस चुनौती का सामना करने के
अलावा और कोई उपाय भी नहीं।
ठीक है कि
रिजर्व बैंक की घोषणा के बाद शेयर बाजार में उत्साह का माहौल दिखा, लेकिन उसके आधार पर इस नतीजे पर नहीं
पहुंचा जा सकता कि कारोबारी माहौल ठीक होने जा रहा है। शायद यही कारण है कि रिजर्व
बैंक की ओर से अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह किए जाने के बाद सरकार की ओर
से घोषित होने वाले आर्थिक पैकेज का इंतजार किया जा रहा है। इस पैकेज में क्या कुछ
होगा, यह तो
उसके सामने आने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना
होगा कि उसके उपाय वास्तव में असरकारी साबित हों।
उसका
सबसे अधिक ध्यान छोटे एवं मझोले उद्योगों को सहारा देने पर होना चाहिए, क्योंकि महामारी की मार उन पर ही
ज्यादा पड़ी है। ऐसे कई उद्योगों के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे
का अभाव है। इस अभाव को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने वाले उपाय किए जाने चाहिए, अन्यथा एक ऐसे वक्त कामगारों की छंटनी
की नौबत आ सकती है जब सरकार यह अपेक्षा कर रही है कि न तो किसी का वेतन रुके और न
ही किसी की नौकरी जाए। सरकार को अपने पैकेज को अंतिम रूप देने के साथ ही कोरोना के
साये में सतर्कता के साथ अधिकाधिक कारोबारी गतिविधियों को संचालित करने के तौर-तरीके
तय करने की भी तैयारी करनी चाहिए।974words
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