06-05-2020 editorial

इन दिनों एक वाक्य खूब दोहराया जा रहा है कि असाधारण परिस्थितियों से निपटने के उपाय भी असामान्य होते हैं। इसीलिए दुनिया भर के साइंसदां कोविड-19 से निपटने के लिए जिस स्तर पर रिसर्च कर रहे हैं और इसके संक्रमण को रोकने के लिए वैक्सीन बनाने में जुटे हैं, वह अभूतपूर्व है। एक अच्छी खबर यह भी है कि तकरीबन छह टीकों का इंसानों पर परीक्षण शुरू हो गया है। ये परीक्षण तीन स्तरीय होते हैं। मगर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष प्रतिनिधि डॉक्टर डेविड नाबारो ने जो कहा है, वह दुनिया भर की सरकारों, स्वास्थ्य संगठनों और लोगों के लिए चिंता के साथ-साथ गहन विचार का विषय होना चाहिए। डॉ डेविड के मुताबिक, हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते कि कोविड-19 की वैक्सीन तैयार हो ही जाएगी और यदि हो भी गई, तो गुणवत्ता व सुरक्षा की कसौटी पर वह सौ फीसदी खरी उतरेगी। यानी प्रकारांतर से वह यही कह रहे हैं कि दुनिया इस वायरस से बचने के  उपायों को ही इसका ठोस उपचार समझे।
विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपनी सीमाओं को छिपाता नहीं है। प्रयोग-जन्य सत्य पर आधारित होने के नाते उसे यह स्वीकारने में भी कोई गुरेज नहीं कि दशकों के अध्ययन, रिसर्च के बाद भी वह कुछ वायरसों, बीमारियों का तोड़ नहीं ढूंढ़ सका है। एचआईवी का उदाहरण हमारे सामने है। पिछले चार दशकों से इस वायरस को पछाड़ने की कवायदें जारी हैं, मगर आज तक इसकी कोई वैक्सीन नहीं बन सकी। इस बीच तीन करोड़ से भी ज्यादा लोग दुनिया भर में इसकी भेंट चढ़ चुके हैं। एचआईवी के संक्रमण या डेंगू के मच्छरों से बचाव अपेक्षाकृत आसान है, पर क्या इन्होंने इंसानी जीवन शैली को प्रभावित नहीं किया? निस्संदेह, किया है। सच यही है कि जागरूक लोग अब इनकी जद में कम आते हैं। कोविड-19 से निपटने में भी जागरूकता ही फिलहाल सबसे बड़ी दवा है। न्यूजीलैंड, वियतनाम जैसे देशों ने दिखाया है कि  इस दवा से यह मुश्किल जंग जीती जा सकती है। न्यूजीलैंड में 1,486 संक्रमित लोगों में से 1,300 से अधिक ठीक होकर अपने घर लौट चुके हैं, जबकि नौ करोड़ से भी अधिक आबादी वाले वियतनाम में एक भी नागरिक की जान इससे नहीं गई। इस तथ्य के बावजूद कि चीन से उसकी सीमाएं लगती हैं। वहां 271 संक्रमित लोगों में 232 ठीक हो चुके हैं।                
कोरोना संक्रमण के रोज-रोज बढ़ते आंकड़ों से सहमी हुई दुनिया को यह कुबूल करना होगा कि उसे इस वायरस के साथ ही अभी जीना है। और इसके लिए उसे कचरा फैलाने वाली अपनी पुरानी जीवन शैली का मोह त्यागना होगा। सरकारें कितने कानून बनाएंगी? कोई भी प्रशासन एक छोटी अवधि तक ही सख्ती बरत सकता है, अंतत: इंसानी समाज को ही किसी कायदे-कानून की लाज रखनी होती है। जब प्रश्न जिंदगी और मौत का हो, तो तीसरा कोई विकल्प नहीं होता। फिजिकल डिस्टेंसिंग को बरतते हुए संक्रमित की शिनाख्त जब समाज के स्तर पर होगी, बगैर किसी नफरत और भेदभाव के, तभी इस महामारी पर जीत भी मिलेगी। कोविड-19 ने हमारे जीने के अंदाज पर हमेशा के लिए कुछ चीजें थोप दी हैं और हमारे पास उन्हें अपनाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। भीड़ का हिस्सा बनने और बनाने से परहेज के साथ यह दौर हमें कई आडंबरों से भी दूर रहने की सीख दे रहा है।
यह विचित्र है कि लॉकडाउन में एक और विस्तार के साथ ही तमाम छूट देकर जब कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है तब यह भी देखने में आ रहा है कि विभिन्न राज्य सरकारें आवाजाही के मामले में आपसी सहयोग का परिचय देने से इन्कार कर रही हैं। आखिर ऐसे में आर्थिक-व्यापारिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लक्ष्य की प्राप्ति कैसे की जा सकती है? यदि राज्य सरकारें एक से दूसरे राज्य में आवाजाही पर सख्त रवैया अपनाएंगी तो फिर 33 प्रतिशत कर्मचारियों के साथ काम करने की छूट तो धरी की धरी ही रह जाएगी। देश की राजधानी से सटे एनसीआर के इलाके में हजारों ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें काम-धंधे के सिलसिले में दिल्ली जाना पड़ता है।
इसी तरह दिल्ली में तमाम ऐसे लोग रहते हैं जिन्हें उत्तर प्रदेश और हरियाणा के शहरों में जाना होता है। हालांकि आवाजाही में सीमित छूट दी गई है, लेकिन राज्य सरकारें कोरोना संक्रमण का फैलाव रोकने के नाम पर लगातार सख्त रवैया अपनाती जा रही हैं। यह केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के खिलाफ तो है ही, कारोबारी गतिविधियों को फिर से शुरू करने में अड़ंगा भी है। नि:संदेह बात केवल दिल्ली-एनसीआर में आवाजाही को लेकर दिखाई जाने वाली अड़ंगेबाजी की ही नहीं है।
दिल्ली-एनसीआर की तरह चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला में भी लोगों को आवाजाही में अड़ंगेबाजी से दो-चार होना पड़ रहा है। कुछ ऐसी ही स्थिति देश के अन्य अनेक हिस्सों में है। इस सबसे तो देश को ही नुकसान हो रहा है। इससे दयनीय और कुछ नहीं कि जब राज्यों को आपसी सहयोग को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए तब वे पाले खींचने में लगे हुए हैं। कहीं-कहीं तो सचमुच सड़कों पर खाई खोद दी गई ताकि एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में प्रवेश न करने पाएं। इसी तरह कहीं-कहीं एक राज्य की ओर से जारी किए गए पास दूसरे राज्यों ने अमान्य कर दिए। क्या क्षेत्रीयता के ऐसे संकीर्ण प्रदर्शन से कोरोना के संक्रमण पर लगाम लग जाएगी?
नि:संदेह कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए सतर्कता बरतने की आवश्यकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि काम-धंधे के लिए निकले लोगों अथवा माल ढोने वाले ट्रकों की आवाजाही पर जरूरत से ज्यादा सख्ती का परिचय दिया जाए। माना कि कोरोना के साये में रहना होगा, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि राज्य खुद को टापू में तब्दील कर लें। बेहतर हो कि केंद्र सरकार अंतरराज्यीय आवाजाही में अनावश्यक अड़ंगेबाजी का संज्ञान ले और दूसरी ओर राज्य सरकारें यह समझें कि संघीय ढांचा आपसी सहयोग पर टिका है। उन्हें अपने हित के साथ ही देश के हित की भी चिंता करनी होगी।

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