12-05-2020 daily editoria.l


लगभग 50 दिनों से बाधित सामान्य रेल सेवा की फिर शुरुआत एक ऐसी खुशखबरी है, जिसका हर किसी को इंतजार था। पहले चरण में राजधानी एक्सपे्रस की तर्ज पर ऐसी वातानुकूलित ट्रेनें चलेंगी, जो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के प्रमुख 15 शहरों को परस्पर जोड़ देंगी। ध्यान रहे, देश भर में फंसे श्रमिकों, छात्रों, तीर्थयात्रियों के लिए बड़ी संख्या में श्रमिक स्पेशल ट्रेन रेल विभाग चला रहा है और इसी सप्ताह करीब 1,500 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के चलने की संभावना है। श्रमिकों के लिए चली विशेष रेल सेवा जितनी जरूरी है, लगभग उतनी ही जरूरी है यह विशेष एसी रेल सेवा, जो न सिर्फ आर्थिक, बल्कि सामाजिक रूप से भी आम जनजीवन को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होगी। देश में एक बड़ी उद्यमी, पेशेवर, सक्रिय आबादी है, जो लॉकडाउन के कारण ठहर गई है या कहीं फंसी हुई है, ऐसी आबादी के लिए ये विशेष ट्रेनें उपहार साबित होंगी। जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि देश इतने लंबे समय तक के लिए ठहर जाएगा। आने वाले दिनों में भी लॉकडाउन में बहुत छूट की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए, लेकिन यह जरूरी है कि लोगों को उनके जरूरी गंतव्य तक पहुंचने दिया जाए। यह हम सब जानते हैं कि भारत में रेल से बेहतर कोई परिवहन साधन नहीं है, रेल भारत में परिवहन तंत्र की रीढ़ है। भारत में कोरोना संकट से पहले प्रतिदिन 13,000 ट्र्रेनों में 2.3 करोड़ लोग सफर करते थे। ट्रेनों के बाधित होने से करोड़ों लोग जरूरी रेल यात्राओं से भी वंचित हो गए। अब सामान्य रेल सेवा की शुरुआत हो रही है, तो इसका अर्थ है, देश में फिर यात्रा की शुरुआत हो रही है। सरकार की योजनानुसार आने वाले दिनों में जरूरत के हिसाब से रेल सेवा धीरे-धीरे बहाल होती जाएगी और यह हर नजरिये से जरूरी भी है। 

अभी जो विशेष यात्री ट्र्रेनें चलेंगी, वे महंगी होंगी, जिनमें निम्न मध्यवर्ग के लिए सफर आसान नहीं होगा, लेकिन उम्मीद करनी चाहिए, जल्दी ही ऐसी ट्रेनें भी चलेंगी, जिनमें देश के सामान्य लोग भी पैसे देकर आसानी से सफर कर सकेंगे। रोज चलने वाली इन विशेष ट्रेनों को बीच में कुछ स्टेशनों पर रोकने का इंतजाम भी रेलवे को करना चाहिए। अभी जो ट्र्रेनें चली हैं, उनमें यात्रियों को खाने-पीने का इंतजाम स्वयं करना होगा, इसलिए इनमें उन्हीं लोगों को सफर करना चाहिए, जो सक्षम हैं। पूरा किराया अगर रेलवे वसूल रहा है, तो उसे इन ट्र्रेनों में खाने-पीने का इंतजाम भी जल्द ही कर देना चाहिए।
 
यह भी जरूरी है कि केवल स्वस्थ लोग ही इन ट्र्रेनों में सफर का साहस करें और इसके लिए रेलवे को पुख्ता इंतजाम रखने चाहिए। कोई भी यात्री बिना जांच के सफर न कर सके और स्टेशन पर सभी यात्री समय से कम से कम एक घंटा पहले पहुंचें और अपनी पूरी जांच करवाएं। ध्यान देने की बात है, इन ट्रेनों में फिजिकल डिस्टेंसिंग के लिए बीच-बीच में बर्थ खाली नहीं रहेंगे। इन ट्रेनों के यात्रियों के लिए भी ऐसी यात्रा दोहरी परीक्षा की घड़ी होगी। उन्हें अपने साथ-साथ अपने साथी यात्रियों को भी सुरक्षित रखना होगा। ध्यान रहे, रेल यात्री जितना अच्छा व्यवहार करेंगे, सामान्य रेल सेवा की उतनी ही जल्दी बहाली होगी। तय है, आने वाले दिनों में जो भी सेवाएं बहाल होंगी, उन्हें सुचारु रखने की जिम्मेदारी हम सजग नागरिकों पर होगी।
कोरोना संकट के इस कठिन दौर में प्रधानमंत्री की मुख्यमंत्रियों से जो ताजा बातचीत हुई उसके बाद यह माना जा रहा है कि या तो लॉकडाउन खत्म करने का फैसला लिया जाएगा या फिर उसमें बड़े पैमाने पर छूट दी जाएगी। ऐसा कुछ करना इसलिए आवश्यक हो गया है, क्योंकि एक तो लॉकडाउन समस्या का समाधान करने के बजाय उसे बढ़ा रहा है और दूसरे, कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भी बाधक बन रहा है। राज्य सरकारें इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि उद्योग-धंधे चालू करने में तमाम तरह की बाधाएं आ रही हैं। विडंबना यह है कि इनमें से कई बाधाएं उनकी विभिन्न एजेंसियों की ओर से ही खड़ी की जा रही हैं।
इससे इन्कार नहीं कि कोरोना वायरस के संक्रमण पर अभी रोक नहीं लगी है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि लॉकडाउन न केवल अनिश्चितता को बल दे रहा है, बल्कि ऐसे सवाल भी खड़े कर रहा है कि जब कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है तब फिर मजदूरों की वापसी का सिलसिला क्यों कायम है? यह सही है कि तमाम मजदूर अपने गांव-घर जाना चाहते हैं और उन्हेंं रोका नहीं जा सकता, लेकिन इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जाना चाहिए कि उनके बगैर कारोबार जगत का काम नहीं चलने वाला।
कुछ राज्य इस पक्ष में हैं कि लॉकडाउन में अधिक ढील न दी जाए, लेकिन कहीं इसके पीछे मकसद यह तो नहीं कि किसी तरह की समस्याएं सामने आने पर उन्हेंं आलोचना का सामना न करना पड़े? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसे राज्य लॉकडाउन को शिथिल करने से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का सामना करने से बचना चाह रहे हों? बड़ी बात नहीं कि ऐसे राज्य यह सोच रहे हों कि जब आर्थिक नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार को ही करनी है तो फिर वे अपनी ओर से लॉकडाउन को खत्म करने की मांग क्यों करें? राज्य सरकारों की जो भी सोच हो उन्हेंं यह ध्यान रखना चाहिए कि लॉकडाउन से बाहर निकलने का रास्ता आसान नहीं होने वाला। इस रास्ते के आसान होने की प्रतीक्षा करने से बेहतर है उसे सुगम बनाने के उपाय करना।
निश्चित रूप से ये उपाय तभी कारगर साबित होंगे जब लॉकडाउन से निकलने की दिशा में बढ़ा जाएगा। उचित यह होगा कि मध्य मार्ग अपनाया जाए और हर स्तर पर सावधानी बरतते हुए लॉकडाउन से धीरे-धीरे बाहर निकलने की तैयारी की जाए। इस तैयारी में केंद्र और राज्यों को अपने हिस्से की भागीदारी का निर्वाह करने के मामले में तत्परता का परिचय देना चाहिए। यह रवैया ठीक नहीं कि कुछ राज्य चुनिंदा ट्रेनों का परिचालन शुरू करने को भी समस्याजनक मान रहे हैं।976


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