4-05-2020
आधुनिक दुनिया ने विज्ञान का महत्व बहुत पहले ही जान लिया था, लेकिन आज दुनिया एक ऐसे दौर में है, जब लगभग पूरी बागडोर ही विज्ञान के हाथों में दिखने लगी है।
क्या भविष्य की राह विज्ञान और केवल विज्ञान द्वारा ही तय होगी? क्या अर्थव्यवस्था और सामाजिकता जैसे विषय अब प्राथमिक नहीं रहे, केवल विज्ञान ही प्राथमिक है? अब विज्ञान ही
बोलेगा, तब हम घर से बाहर निकलेंगे? इन दिनों विज्ञान की प्राथमिकता सिद्ध होने का एक कारण यह भी है
कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने चिकित्सकीय चेतावनियों को हल्के में लिया था, इसकी कीमत उन्हें कोरोना पीड़ित होकर चुकानी पड़ी। पीड़ित होने के
बाद वह मजबूरन विज्ञान की शरण में गए, अर्थव्यवस्था
या सामाजिकता जैसे विषय उनके लिए गौण हो गए। इस अकेले उदाहरण ने दुनिया में असंख्य
लोगों को मजबूर कर दिया कि वे विज्ञान की शरण में जाएं। अमेरिका में भी विज्ञान की
अवहेलना हुई, पर जब वहां तबाही मची, तब अमेरिका भी विवश हो गया। आज अर्थव्यवस्था से शायद ही किसी को
उम्मीद है, आज सामाजिकता झूठी-सी लग रही है, केवल विज्ञान की ओर लोग टकटकी लगाए बैठे हैं कि वह जल्द से जल्द
कोई उपचार बताए। दुनिया के वैज्ञानिकों के बीच यह भी चर्चा है कि क्या
कोरोना के सामने विज्ञान नाकाम हो गया? कई डॉक्टरों
का मानना है, हमने चिकित्सा तंत्र पर तो पूरा ध्यान दिया, लेकिन समाज-तंत्र को भूल गए। टेस्ट किट, मास्क, वेंटिलेटर, कुछ दवाइयां
सुनिश्चित हो गईं, लेकिन डॉक्टरों या वैज्ञानिकों ने लोगों के
सामाजिक व्यवहार के बारे में ज्यादा नहीं सोचा। जैसा केन्याई अर्थशास्त्री व
बुद्धिजीवी डेविड नडी ने बताया, ‘हमारे
चिकित्सा/ महामारी विशेषज्ञ रोग के स्रोत और प्रसार को समझते हैं, लेकिन वे लोक/ समाज को समझने में सक्षम नहीं हैं, और यह एक समस्या है।’
विज्ञान का पूरा लाभ उठाने में कमी तो रही है, लेकिन ध्यान रहे, जितनी कमी विज्ञान में थी, उससे कहीं ज्यादा कमी समाज में थी और कोविड-19 जैसी घातक बीमारी को भयावह होने के मंच जगह-जगह मिल गए। अप्रैल के खत्म होते-होते दुनिया में तीस लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो गए और दो लाख से अधिक मारे गए। वैज्ञानिक भी यही मान रहे हैं कि हमें सारे फैसले विज्ञान पर नहीं छोड़ने चाहिए। विज्ञान वास्तव में यह नहीं बताता है कि हमें क्या करना है। इसकी बजाय वैज्ञानिक तमाम चीजों के बीच संबंधों को समझने-समझाने की कोशिश करते हैं, ताकि यह अनुमान लगाया जा सके कि हम क्या करेंगे, तो क्या हो सकता है। समाज या दौर कोर्ई भी हो, वास्तव में यह राजनीति तय करती है कि हमें क्या करना है। इसलिए कहा जाता है कि लोकतंत्र में जिस सरकार के पास जितनी ज्यादा सूचनाएं और पारदर्शिता होती है, वह उतने ही अच्छे फैसले लेती है।
कोरोना के दौर में कई देशों की राजनीति व उनकी सरकार की पोल खुली है। जिन देशों ने अच्छे विज्ञान और बुरे विज्ञान में भेद करना छोड़ दिया था, जिनकी सर्वोच्च प्राथमिकता मानव जीवन नहीं रह गया था, वे कोरोना में ज्यादा फंसे। कोरोना एक बड़ा सबक है, इसके बाद हमें अच्छे विज्ञान की मांग और आपूर्ति को पर्याप्त निवेश करते हुए बढ़ाना है। फैसला हमें और हमारी सरकारों को करना है कि पोषण उसी विज्ञान का हो, जो दुनिया के ‘कोरोनाओं’ को धूल चटाता हमारे साथ चले।
कश्मीर के
हंदवाड़ा में आतंकियों से लोहा लेते समय मेजर, कर्नल और राज्य
पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर समेत पांच जवानों का बलिदान देश के लिए एक बड़ा आघात
है। इस आघात को सहन करना ही होगा, लेकिन इसके साथ
ही पाकिस्तान पोषित एवं प्रेरित आतंकवाद को समूल नष्ट करने का नए सिरे से दृढ़
संकल्प भी लेना होगा। यह संकल्प ऐसा होना चाहिए कि पाकिस्तान के होश ठिकाने आएं और
वह अपने पाले-पोसे आतंकियों को भारत में घुसपैठ कराने से घबराए। उन कारणों की तह
तक जाने की जरूरत है जिनके चलते सर्जिकल स्ट्राइक और एयर
स्ट्राइक के बाद भी वह अपनी आतंकी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। उससे आतंकी
राष्ट्र की तरह ही व्यवहार किया जाना चाहिए और यह उम्मीद लगाने से हर हाल में बचा
जाना चाहिए कि एक न एक दिन वह सुधर जाएगा।
पाकिस्तानी का
सत्ता प्रतिष्ठान कितना निर्लज्ज और निकृष्ट है, यह इससे समझा जा
सकता है कि वह सबसे बड़ी वैश्विक आपदा के इस दौर में भी आतंकियों की घुसपैठ कराने
और संघर्ष विराम का उल्लंघन करने में लगा हुआ है। हमें केवल यही नहीं सुनिश्चित
करना कि राष्ट्र रक्षा में अप्रतिम शौर्य का परिचय देते हुए अपने प्राणों की आहुति
देने वाले वीरों का बलिदान व्यर्थ न जाए, बल्कि यह भी
देखना होगा कि आखिर हंदवाड़ा में इतनी बड़ी क्षति क्यों उठानी पड़ी?
हंदवाड़ा में दो
आतंकियों को मार गिराने में पांच योद्धाओं का बलिदान आतंक रोधी रणनीति में किसी
खामी की ओर संकेत करता है। नि:संदेह आतंकियों को चुन-चुनकर मार गिराने में कोई कसर
नहीं उठा रखी जानी चाहिए, लेकिन इसी के साथ इसके समुचित प्रबंध भी किए जाने चाहिए कि
आतंकियों की घेराबंदी के समय सेना, अर्द्धसैनिक
बलों और पुलिस को कम से कम क्षति उठानी पड़े। चूंकि घरों में जा छिपे आतंकियों की
घेराबंदी के समय कभी पत्थरबाजी शुरू हो जाती है और कभी आतंकवाद के अन्य हमदर्द
आतंक रोधी अभियान में खलल डाल देते हैं इसलिए जोखिम और बढ़ जाता है। इस जोखिम को
तभी कम किया जा सकता है जब सतर्कता के स्तर को बढ़ाया जाए और जवानों की जीवन रक्षा
को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
कश्मीर में आतंक
रोधी अभियानों में खुफिया एजेंसियों की भूमिका की नए सिरे से समीक्षा करने के साथ
ही यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या हमारे सुरक्षा बल आवश्यक आधुनिक तकनीक से लैस
हैं और क्या वे खतरे को सही तरह भांपने के बाद ही अपनी कार्रवाई को अंजाम देते हैं? यह ठीक नहीं कि मरने पर आमादा आतंकियों को मार गिराने में
मेजर और कर्नल स्तर के सैन्य अधिकारियों को अपना बलिदान देना पड़े।963words
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