Editorial 4 nov
Editorial dictation
4 Nov
Jansatta 80wpm 5 min
जब कानून के रखवाले ही कानून की फिक्र न करें, तो समाज
में अराजकता को बल मिलता है। मगर हैरानी की बात है कि
समाज में बड़े-बड़े अपराधों की गुत्थी सुलझाने और अपराध रोकने
का दावा करने वाले खुद मामूली बातों को अपने अहं से जोड़ लेते
हैं और फिर आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं । दिल्ली
की तीसहजारी अदालत में पुलिस और वकीलों के बीच हिंसक
भिड़ंत इसका ताजा उदाहरण है। कार पारकिंग को लेकर दोनों पक्ष
खूनी हिंसा पर उतारू हो गए। अदालत परिसर में जहां विचाराधीन
कैदियों को लेकर गए पुलिस वाहन खड़े थे, वहीं एक वकील ने
अपनी गाड़ी खड़ी करनी चाही। इस पर पुलिसकर्मी ने उसे रोका तो
विवाद बढ़ गया और फिर मामला हाथापाई तक पहुंच गया। इस पर
पुलिस उस वकील को थाने ले गई और वहां उसकी पिटाई कर दी।
इससे नाराज वकीलों ने अदालत परिसर में तैनात पुलिसकर्मियों पर
हमला कर दिया। दोनों के बीच जम कर मारपीट हुई। वकीलों ने
कई पुलिस वाहनों और अन्य गाड़ियों को आग लगा दी। इस घटना
में पुलिसकर्मी और वकील पक्ष के कई लोग घायल हो गए । इस
मामले को गंभीरता से लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने विशेष जांच टीम
का गठन किया है।
यह पहली घटना नहीं है, जब किसी अदालत में वकीलों ने इस
तरह एकजुट होकर हिंसक गतिविधि को अंजाम दिया। तीस साल
पहले भी इसी अदालत परिसर में पुलिस और वकीलों के बीच
हिंसक झड़पें हुई थीं। तब पुलिस ने तीसहजारी परिसर की सभी
अदालतों में ताले जड़ दिए थे। हालांकि इस बार ऐसा नहीं हुआ,
पर इस घटना से पुलिस और वकील दोनों की कानून के प्रति
जवाबदेही पर अंगुलियां उठनी शुरू हो गई हैं। अदालत परिसर में
ले जाए जाने वाले विचाराधीन कैदियों के लिए प्रवेश की जगह तय
होती है। वहीं उनके वाहन ठहराए जाते हैं । दिल्ली की अदालतों में
अक्सर संगीन अपराधियों के मामलों की सुनवाई होती है, इसलिए
कैदियों की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती जाती है।
मगर हैरानी की बात है कि जिस वकील ने उस क्षेत्र में अपना वाहन
खड़ा करने का प्रयास किया, उसने इस तकाजे को समझना जरूरी
नहीं समझा । इसमें पुलिसकर्मियों से भी अपेक्षा की जाती थी कि वह
अपनी ताकत के गुरूर में आने के बजाय नरमी से पेश आती और
संबंधित प्राधिकार से अपनी शिकायत दर्ज कराती। मगर उसने
वकील को थाने ले जाकर पिटाई कर दी।
दरअसल, ऐसी हिंसक घटनाएं अक्सर अपनी ताकत और
हैसियत दिखाने की अविवेकपूर्ण जिद की वजह से हो जाती हैं ।416 words
Hindustan 100wpm 500words
जीवन की भागदौड़ में यह सबसे बड़ी राहत की तरह आती है, सब इसे जरूरी भी मानते हैं और इसके बिना किसी का भी काम नहीं चलता, फिर भी नींद को जिंदगी का नायक नहीं माना जाता। हालांकि चैन की नींद वाला जीवन सबसे सुखी माना जाता है, हर रात सोने वाले के लिए मीठे सपनों वाली नींद की दुआ भी की जाती है, फिर नींद के बारे में नजरिया अक्सर ‘जो सोवत है, सो खोवत है' वाला ही होता है। दिन की सक्रियता को हम उत्पादकता और कर्म से जोड़कर देखते हैं, इसके बरक्स देखने पर अक्सर रात निठल्लेपन की तरह लगती है। जहां दिन का प्रकाश नायक हो और रात के अंधेरे को खलनायक की तरह ही पेश किया जाता हो, वहां जागने और सोने का नजरिया भी अगर इसी सोच से निकलता है, तो कोई आश्चर्य नहीं है। एक धारणा यह भी है कि पुराने दौर में जब रात को रोशन करने के तरीके उपलब्ध नहीं थे, तो सक्रियता और आराम के लिए दिन व रात के इसी धारणा के इस्तेमाल की परंपरा शुरू की गई होगी। यह भी माना जाता है कि इंसान उन प्राणियों में आता है, जिनका मुख्य सक्रियताकाल सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच होता है। दिन भर की थकान के बाद हमारी मांशपेशियों को आराम देने के लिए नींद जरूरी है, यह तो हमेशा से ही माना जाता रहा है। लेकिन यह सोच भी अब बदल रही है। वैज्ञानिक अब इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि नींद सिर्फ आराम का मामला नहीं है, यह हमारे शरीर क्रिया विज्ञान का भी एक जरूरी हिस्सा है। यानी नींद का नदारद होना आराम में खलल ही नहीं डालता, बल्कि यह हमारे शरीर में भी केमिकल लोचा पैदा करता है। यह भी पाया गया है कि आज की बहुत सारी बीमारियां तभी शरीर पर काबिज होती हैं, जब चैन की नींद अनुपस्थित होने लगती है।
इस दिशा में लंबे समय से काम हो रहा है और अब बोस्टन विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में नींद पर दिन-रात काम कर रहीं लौरा लुइस और उनकी टीम ने उस पूरे रसायनशास्त्र को पकड़ने में सफलता हासिल की है, जो हमारे शरीर में उस समय अपनी भूमिका निभाता है, जब हम सो रहे होते हैं। इसके लिए उन्होंने बारी-बारी से कई लोगों को एक रात ठीक से सोने नहीं दिया, ताकि अगली रात उन्हें अच्छी नींद आए। और अगली रात उन्हें एमआरआई मशीन के भीतर सुलाया गया, ताकि उनके मस्तिष्क में होने वाली हर हरकत को कंप्यूटर में दर्ज किया जा सके। इसके अलावा, उनके सिर पर मस्तिष्क की तरंगों को पकड़ने के उपकरण भी लगाए गए। यह तो पहले से ही पता था कि जब हम गहरी नींद में होते हैं, तो हमारे म्ष्किक में कुछ द्रव तेजी से प्रवाहित होते हैं। लेकिन इस प्रयोग में यह पता लगा कि द्रव का यह प्रवाह मस्तिष्क से बीटा एमोलाइड जैसे कई बाईप्रोडक्ट्स को साफ कर देता है। बीटा एमोलाइड को अल्जाइमर जैसे रोगों का मुख्य कारण माना जाता है। यह प्रवाह मस्तिष्क में आने वाली रिक्तता को भी भरता है।500words
यह प्रयोग बताता है कि नींद सिर्फ दिन भर की थकान से मुक्ति, यानी आराम और नई स्फूर्ति पा लेने भर का मामला नहीं है, यह हमारे शरीर को कई रोगों से बचाने का रास्ता भी है। नींद में भले ही किसी को सक्रियता और उत्पादकता न दिखे, लेकिन यह नींद ही है, जो हमें लंबे समय तक सक्रिय और उत्पादक बनाए रखती है। क्या इसके बाद भी आप नींद को जिंदगी का नायक नहीं मानेंगे?
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