Editorial 6 nov

Editorial dictation 
6 nov


Danik jagran 80wpm 400words
कानून के शासन के लिए यह अच्छा नहीं हुआ कि देश की राजधानी में
वकीलों और पुलिस के बीच हुई झड़प के बाद पहले क्कील अपना विरोध
जताने सड़क पर उतर आए और फिर दिल्ली पुलिस के कर्मी। ह्यालांकि
वकीलों के विभिन्न संगठन तो जब-तब अपनी मांगों को लेकर सड़क पर
उतरते ही रहते हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम देखने को मिला है जब पुलिस
अपनी शिकायत दर्ज कराने सड़कों पर उतरी हो। इससे बड़ी विडंबना और
कोई नहीं हो सकती कि सड़क पर उतरकर अपने आक्रोश को प्रकट करने
का काम उस दिल्ली पुलिस को करना पड़ा जो देश की राजधानी का पुलिस
बल होने के नाते अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सवाल केक्ल यह नहीं
है कि ऐसी नौबत क्यों आई, बल्कि यह भी है कि सड़क पर उतरे पुलिस
कर्मियों ने अपने अधिकारियों के आग्रह की अनसुनी क्यों की? यह समझ
आता है कि अपने साथ हुए व्यवहार से आहत पुलिस कर्मियों ने अपनी
व्यथा बयान करना आवश्यक समझा, लेकिन क्या यह बेहतर नहीं होता
कि पुलिस मुख्यालय धरना देने गए पुलिस कमी अपनी पीड़ा व्यक्त करने
के बाद काम पर लौट जाते? इसमें जो देरी हुई उससे न केवल अनुशासन
संबंधी सवाल उठे, बल्कि पुलिस कर्मियों के प्रति हमदर्दी भी कम हुई।
इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि आखिरकार दिल्ली पुलिस कर्मियों
ने अपना धरना खत्म कर दिया, क्योंकि उन कारणों की तह तक जाने और
उनका निवारण करने की सख्त जरूरत है जिनके चलते देश की राजधानी
में अप्रिय दृश्य दिखाई दिए। ऐसे दृश्य देश की छवि बिगाड़ते ही हैं।
दिल्ली में ककीलों और पुलिस के झगड़े में किसी एक के पक्ष खड़ा
नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि एक
अदालत परिसर में पार्किंग को लेकर हुए झगड़े में दोनों ने ही किसी न किसी
स्तर पर अति की। इस अति में कौन-कितना दोषी है, यह किसी जांच से
ही पता चल सकता है। निराशाजनक केवल यह नहीं रहा कि इस झगड़े के
बाद ऐसे कदम नहीं उठाए जा सके जिससे वकील भी संतुष्ट होते और
पुलिस भी, बल्कि यह भी रहा कि दोनों पक्ष अपने हिसाब से सही-गलात
का फैसला करने के लिए दबाव का सहारा लेने लगे। यह न्यायसंगत
तरीका नहीं। ऐसे आचरण से विधि के शासन की हेठी ही होती है। दुर्भाग्य
यह है कि किसी झगड़े को निपटाने में न्यायसंगत तरीके के अभाव का यह
पहला मामला नहीं। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित किया ही जाए 400words


Hindustan 90wpm
महाराष्ट्र में सत्ता की राजनीति न केवल एक अफसोसनाक मिसाल गढ़ रही है, बल्कि हमें समकालीन राजनीतिक शून्य या विचारहीनता का भी एहसास करा रही है। विधानसभा चुनाव के नतीजे आए करीब दो सप्ताह बीतने वाले हैं, पर महाराष्ट्र में नई सरकार का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। जो बात एक सप्ताह से हिचकिचाहट के साथ चर्चा में थी, वह अब खुल चुकी है। देश के आम लोग भी समझ चुके हैं कि शिव सेना को मुख्यमंत्री का पद चाहिए और भारतीय जनता पार्टी यह पद छोड़ने के पक्ष में नहीं है। भाजपा की मजबूरी यह है कि पहली बार पिछले चुनाव में उसे मुख्यमंत्री पद हासिल हुआ था, उसे वह कैसे छोड़ दे? पहले भी शिव सेना के दो मुख्यमंत्री रह चुके हैं, मनोहर जोशी और नारायण राणे। अब शिव सेना को यह आशंका सता रही है कि यदि लगातार दो शासनकाल में भाजपा का नेतृत्व स्वीकार कर लिया, तो राजनीतिक रूप से शिव सेना का जमीनी आधार कमजोर हो जाएगा। आंकड़ों की दौड़़ में शिव सेना भले ही भाजपा से काफी पीछे हो, लेकिन भारतीय राजनीति में छोटे गठबंधन सहयोगी का मुख्यमंत्री बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। निर्दलीय विधायक भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। शिव सेना के पास 56 विधायक हैं और उसने इस बार मुख्यमंत्री पद को अपने लिए करो या मरो का प्रश्न बना लिया है। एक ओर, भाजपा आंतरिक बैठकों में उलझी हुई है, तो दूसरी तरफ, शिव सेना नेता संजय राउत ने लगभग घोषणा ही कर दी है कि अगला मुख्यमंत्री तो शिव सेना का ही होगा। जिद पर अड़ी शिव सेना किस हद तक जा सकती है, यह प्रश्न प्रासंगिक है, लेकिन इसका उत्तर कठिन नहीं है। राजनीति में कुछ भी संभव है। शिव सेना किसी के साथ भी जा सकती है, उसने इसके संकेत भी दिए हैं। वह अपने अतीत में न केवल कांग्रेस का समर्थन कर चुकी है, बल्कि मुस्लिम लीग के साथ भी खड़ी हो चुकी है। भाजपा के साथ उसके गठबंधन को 30 साल ही हुए हैं और उसमें भी वे अलग-अलग चुनाव लड़कर गठबंधन के दामन पर पहले ही दाग लगा चुके हैं। शिव सेना के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, लेकिन भाजपा के पास है। 105 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा अगर मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ती है, तो यह उसके लिए बहुत जोखिम भरा कदम भी साबित हो सकता है।

जो लोग शिव सेना और भाजपा के परस्पर संबंधों को निकट से देखते रहे हैं, उनके लिए यह कतई आश्चर्यजनक नहीं है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन स्वाभाविक नहीं रह गया है। शिव सेना के नेता भाजपा की तीखी आलोचना करते रहे हैं।445words




  Jansatta 100wpm 500words

गंभीर चिंता का विषय हैं। ये हमले बता रहे हैं कि सेना, सुरक्षा बल,
स्थानीय पुलिस और प्रशासन सब आतंकियों के आगे बौने साबित हो रहे
हैं और आतंकियों का नेटवर्क घाटी में दहशत पैदा करने में कामयाब होता
जा रहा है। सोमवार को आतंकियों ने एक बार फिर श्रीनगर के व्यस्त
बाजार में हथगोले से हमला कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई
और अड़तीस लोग घायल हो गए। कश्मीर में पिछले एक महीने में यह
पांचवां आतंकी हमला है। इस दौरान आतंकियों ने हथगोलों से जितने हमले
किए हैं उनमें सरकारी दफ्तरों और सुरक्षा बलों को ही निशाना बनाया गया
है। इसके अलावा आतंकियों ने प्रवासी कामगारों को भी निशाना बनाना
शुरू कर दिया है। ये हमले बता रहे हैं कि आतंकी अपनी रणनीति
कामयाब हो रहे हैं और इसका असर नजर आने भी लगा है। लंबे समय
से घाटी में काम कर रहे कामगारों ने घाटी छोड़नी शुरू कर दी है । पश्चिम
बंगाल के एक सौ अड़तीस मजदूर तो अपने घरों को लौट गए हैं। भले
सेना आतंकियों के खिलाफ अभियान चलाने के दावे कर रही हो, लेकिन
हकीकत यह है पिछले एक दशक में आतंकियों ने गांव-गांव तक गहरी
पैठ बना ली है और उनका खुफिया तंत्र भी काफी मजबूत है। इसीलिए
आतंकियों की पहचान कर पाना आसान काम नहीं है।
पिछले तीन महीने में घाटी में जिस तरह से घटनाक्रम बदले हैं,
उसमें अभी तक जनजीवन सामान्य नहीं हो पाया है। उम्मीद की जा
रही थी कि अनुच्छेद 370 के खात्मे और राज्य को विभाजित कर दो
केंद्र शासित प्रदेश बना देने के बाद आतंकियों की कमर टूट जाएगी।
लेकिन पिछले एक महीने में घाटी में जिस तरह से ट्रक ड्राइवरों को
मारा गया और सुरक्षा बलों पर हमले हुए हैं, उनसे ये दावे हवा हो गए
हैं। जाहिर है, आतंकियों की रणनीति अब व्यापारियों और बाहर के
लोगों पर हमले की है। इस वक्त घाटी में ज्यादातर धंधे ठप पड़े हैं।
कश्मीर में पिछले तीन महीने के दौरान दस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा
का कारोबारी नुकसान हो चुका है। ले-देकर कुछ उम्मीदें सेव
व्यापारियों को बनी थीं और सरकार ने कारोबारियों को पूरी सुरक्षा
मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था लेकिन कारोबारी हों या
आमजन, सब असुरक्षित ही हैं। बागों में सेब सड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें
उठाने और मंडियों तक पहुंचाने का पुख्ता इंतजाम नहीं है। दहशतगर्दं
ने जिस तरह ट्रक ड्राइवरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है, उससे
तो व्यापारियों के लिए और ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
इस समय कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों के सामने सबसे बड़ी
चुनौती आतंकियों के खात्मे की है। जब तक गांव-गांव में फैला
आतंकियों का नेटवर्क तोड़ा नहीं जाएगा, आतंकियों का सफाया नहीं
होगा। हालांकि इन दिनों जो आतंकी हमले हो रहे हैं, वे एक तरह से
आतंकी संगठनों की हताशा का नतीजा भी हैं। पिछले दिनों सेना ने
जिन आतंकियों को पकड़ा है, उनकी निशानदेही पर कुछ आतंकी
ठिकानों को नष्ट भी किया है । आतंकियों ने भूमिगत ठिकाने बना रखे
हैं।500words

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