Editorial dictation24 oct
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Daily Editorial dictation
Danik jagran 80wpm 5 min
दिल्ली में अनाधिकृत बस्तियों को नियमित करने का केंद्रीय कैब्िनेट
का फैसला एक बड़ी संख्या में लोगों को राहत देने वाला तो है, लेकिन
इससे शहरी ढांचे को नियोजित करने के लक्ष्य को हासिल करने में
कठिनाई भी आने वाली है। अपने देश में अवैध बस्तियों को नियमित
करने के फैसले नए नहीं। आम तौर पर चुनाव के पहले ऐसे फैसले लिए
जाते हैं। केंद्र सरकार की तरह राज्य सरकारें भी रह-रहकर इस तरह के
फैसले लेती रहती हैं। ऐसा करके वे अपने राजनीतिक हित का संधान ही
करती है। इस पर हैरत नहीं कि केंद्र सरकार ने जैसे ही दिल्ली में 1797
अनियमित कॉलोनियों को नियमित करने का फैसला किया, वैसे ही
दिल्ली सरकार ने इस फैसले का समर्थन कर दिया। उसने यह भी बताया
कि इन कालोनियों में क्या-क्या काम किए गए हैं? अनियमित कॉलोनियों
को नियमित करने का मतलब है समस्या को समाधान के तौर पर स्वीकार
करना। दिल्ली के साथ देश के अन्य शहरों में अनियमित कॉलोनियों
को नियमित करने के फैसले यह भी बताते हैं कि सरकारें शहरों को
व्यवस्थित करने और खासकर उनमें बढ़ती आबादी को आवास सुविधा
उपलब्ध कराने में नाकाम हैं। इस नाकामी के चलते ही हमारे शहर
समस्याओं से विरते जा रहे हैं। वे बेतरतीब विकास का पर्याय बनते जा
रहे हैं और उनकी खूबसूरती भी नष्ट होती जा रही है।
अगर अनियमित कॉलोनियों को नियमित करने का सिलसिला थमा
नहीं तो हमारे शहर बेतरतीब विकास का पर्याय बनकर रह जाएंगे। इस
तरह के फैसले किसी न किसी स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी जमीनों
पर कब्जा करने की प्रवृत्ति को बल ही प्रदान करते हैं। यह सही है कि
जब अनियमित कॉलोनियों को नियमित किया जाता है तो वहां रह रहे
लाखों लोगों को राहत मिलती है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि
ये लाखों लोग बेहतर माहौल और पर्यावरण भी हासिल कर पाते हैं।
यह खेद की बात है कि अवैध कॉलोनियों को वैध करने की मजबूरी
के बाद भी उन कारणों पर गौर करने से इन्कार किया जा रहा है जिनके
चलते ऐसी कॉलोनियां आकार लेती हैं और फिर समस्या बन जाती है।
ऐसी कॉलोनियां नेताओं और नौकरशाहों के संरक्षण से फलती-फूलती
हैं। समय के साथ उनमें बिजली, पानी आदि की सुविधा पहुंच जाती
है। इसके बाद जब उनमें आबादी बढ़ जाती हैं तो फिर वे बोट बैंक की
राजनीति का जसिया बन जाती हैं। इसी के साथ शहरों को संवारने की
योजनाएं हाशिये पर चली जाती हैं। 401 words
Jansatta 90wpm 446 words
लबे इंतजार के बाद राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)
ने दो साल पहले यानी 2017 के जो अपराध संबंधी आंकड़े जारी
किए हैं, वे चौंकाने वाले हैं, खासतौर से देश की राजधानी दिल्ली के
संदर्भ में इन आंकड़ों से पता चलता है कि संगीन अपराधों में दिल्ली
सबसे आगे है, जहां रोजाना हत्या, लूटपाट, बलात्कार, महिलाओं से
छेड़छाड़ और गैंगवार जैसी घटनाएं होती हैं । हालांकि आंकड़े देशभर
के हैं, इसलिए अपराध के मामले में और राज्यों की हकीकत भी सामने
है। रिपोर्ट बता रही है कि अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे
है। साल 2017 में पचास लाख से ज्यादा मामले दर्ज हुए थे, जिनमें
से तीन लाख से ज्यादा मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए। इसके
बाद दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र रहा जहां करीब दो लाख नब्बे हजार
आपराधिक मामले दर्ज हुए। तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश, चौथे पर
केरल, और पांचवें पर दिल्ली रहा। दिल्ली में दो लाख बत्तीस हजार
आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। इन आंकड़ों से जो तस्वीर बनती है,
वह यह कि शीर्ष चार राज्यों और दिल्ली में अपराधी बेखौफ हैं।
दिल्ली में बढ़ते अपराध चिंता का ज्यादा और गंभीर विषय इसलिए
भी हैं, क्योंकि यह देश की राजधानी है। इसलिए माना जाता है कि यहां
सुरक्षा सबसे ज्यादा होनी चाहिए। लेकिन हकीकत में स्थिति ऐसी है नहीं ।
राजधानी होने की वजह से दिल्ली में रोजगार के लिए देश के दूसरे हिस्सों
से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। जाहिर है, दिल्ली पर आबादी का बोझ
है और इसलिए अपराध भी बढ़ रहे हैं। आबादी की तुलना में पुलिस की
भारी कमी है। दिल्ली पुलिस का बड़ा हिस्सा वीआइपी सुरक्षा में लगा
रहता है और ऐसे में पुलिस आम आदमी की सुरक्षा से समझौता करती
है। फिर दिल्ली में ज्यादातर आपराधिक घटनाएं दर्ज होती हैं, जबकि दूसरे
राज्यों में ऐसा नहीं होता। अपराधों का बढ़ता ग्राफ सिर्फ दिल्ली तक ही
सीमत नहीं है। देश के ज्यादातर महानगरों की हालत यही है। लोग काम
की तलाश में इन शहरों की ओर जा रहे हैं और काम नहीं मिलने पर
अपराध की दुनिया की चपेट में आ जाते हैं । लूटपाट और हत्या की
ज्यादातर घटनाओं के पीछे पैसा ही प्रमुख कारण है और इनमें शामिल
युवक कई बार बेरोजगारी की वजह से भी ऐसा करते हैं। जबकि आपसी
रॉजिश में हत्याओं की घटनाएं कम हुई हैं।
लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में अपराधों का
बढ़ता ग्राफ सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था से जुड़ा है। अपराधों के मामले
में उत्तर प्रदेश हमेशा से आगे रहा है। कहना न होगा कि भीड़ हत्या,
बच्चा चोरी के शक में पीट-पीट कर मार डालने की वारदातें, गोरक्षकों
के तांडव जैसी घटनाएं तो उत्तर भारत के राज्यों में ही ज्यादा हुई हैं।446words
Hindustan 100wpm 5 min
शुक्रवार को अजरबैजान में शुरू हो रहे गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में इस बार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं जा रहे हैं। इस सम्मेलन में जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल जा रहा है, उसकी अगुवाई उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू करेंगे। यही पिछली बार 2016 के वेनेजुएला सम्मेलन में भी हुआ था। उस समय भी प्रधानमंत्री नहीं गए थे और उनकी जगह प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने किया था। यह खबर महत्वपूर्ण इसलिए है कि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक रहा है और नई दिल्ली में चाहे किसी भी दल की सरकार हो, प्रधानमंत्री के वहां जाने की रवायत हमेशा बनी रही। इसके पहले तक एक ही अपवाद था, जब चौधरी चरण सिंह गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में नहीं गए थे, क्योंकि उनकी सरकार गिर चुकी थी और वह तब कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर पद का दायित्व निभा रहे थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लगातार दो बार गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में न जाना इसी लिहाज से बड़ी खबर है और अगले कुछ समय तक इसकी तरह-तरह से व्याख्या चलती रहेगी।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन का जन्म तब हुआ था, जब दुनिया पूरी तरह से अमेरिकी और सोवियत खेमे में बंटी थी। पर बहुत से ऐसे देश थे, जो इनमें से किसी भी गुट में शामिल होने को तैयार नहीं थे। ऐसे में, भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल नासिर और यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिब ब्रोज टीटो ने ऐसे देशों का संगठन खड़ा किया, जो अपने को किसी भी गुट से जोड़कर नहीं देखते थे और इसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नाम दिया गया। कुछ ही साल में यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संगठन बन गया, जब तीसरी दुनिया के ज्यादातर देश इसमें शामिल हो गए थे। लेकिन बाद में जब सोवियत संघ खत्म हुआ और इसके चलते अमेरिकी गुट बेमतलब हो गया, तो गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बने रहने पर भी सवाल उठने लगे। इस सम्मेलन ने तीसरी दुनिया का पैरोकार बनने की लगातार कोशिश की, जिसमें वह काफी हद तक कामयाब भी रहा। लेकिन फिर भी ध्रुवीकरण के खात्मे ने उसके सामने पहचान का एक संकट तो खड़ा कर ही दिया था। हालांकि इस तरह के संकट दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने भी आते रहे हैं। मसलन, जी-7 संगठन का गठन जिस उद्देश्य से हुआ था, वह कुछ ही समय में खत्म हो गया था, लेकिन विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने अपने इस संगठन के लिए एक नई भूमिका तलाश ली थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन को इस भूमिका की अभी भी तलाश है। एक उम्मीद थी कि जैसे इस संगठन ने रंगभेद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था, वैसे ही अब यह आतंकवाद के खिलाफ खड़ा हो सकता है, पर ऐसा नहीं हुआ।
यह भी कहा जा सकता है कि भारत की गुटनिरपेक्ष प्रतिबद्धता उस नेहरू युग की नीति है, जिससे भारतीय विदेश नीति अब दूर जा रही है। लेकिन सच यही है कि भारत ने इससे किनारा नहीं किया है। भारतीय प्रतिनिधिमंडल अभी भी वहां जा रहा है और तीसरी दुनिया के उस बड़े मंच से दूरी बनाने की बात सोची भी नहीं जा सकती, जिसमें भारत की हमेशा बड़ी भूमिका रही हो। 500 words
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