EDITORIAL dication series 15 OCT

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Editorial dictation date 15 Oct 2019
Jansatta 80wpm
Danikjagran 90wpm
Hindustan 100wpm


Jansatta 400words 5 min 
बिगड़ती हवा
राषधानी दिल्ली की हवा फिर खराब हो रही है । हर साल की तरह
यह चेतावनी मिलनी शुरू हो गई है। वायु प्रदूषण लंबे समय से
दिल्ली की बड़ी समस्या बना हुआ है, लेकिन अक्तूबर-नवंबर के
महीने में यह समस्या उस वक्त ज्यादा गंभीर रूप धारण कर लेती है।
जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के खेतों में पराली जलाने से
होने वाला धुआं दिल्ली के आसमान पर परत बन कर छा जाता है।
यह हर साल की समस्या है । इससे दिल्ली की आबादी का बड़ा
हिस्सा सांस और फेफड़े की बीमारियों का शिकार होता है और लोग
अस्पतालों की ओर भागने को मजबूर होते हैं। लेकिन इतना सब कुछ
होने और झेलने के बाद भी अगर पराली जलाने पर रोक नही लग
पा रही है तो यह केंद्र और राज्य सरकारों की असफलता ही मानी
जाएगी। पराली जलाने के मसले पर पिछले तीन साल में सुप्रीम कोर्ट
तक ने कड़े निर्देश दिए, पर्यावरण मंत्रालय की निगरानी में टीमें बनाईं
जो पराली जलाने के विकल्प खोजे और राज्य सरकारों को पराली
जलाने वाले किसानों पर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए, पर इन
सबका कोई ठोस नतीजा अब तक सामने आया नहीं है।
चिंता की बात यह है कि इस बार पराली जलाने की घटनाएं कम
होने के बजाय और बढ़ी हैं। हालांकि केंद्र और पंजाब सरकार की
ओर से दावे किए जा रहे हैं कि पराली जलाने की घटनाओं में कमी
आ रही है। लेकिन पंजाब सरकार के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के
मुताबिक इस बार बारह अक्तूबर तक पंजाब में पराली जलाने की
छह सौ तीस घटनाएं दर्ज की गई हैं। जबकि पिछले साल इसी अवधि
में चार सौ पैतीस मामले दर्ज हुए थे। हरियाणा में कई जगह पराली
जलाई जा रही है। दरअसल, किसानों के सामने मजबूरी यह है कि
पराली जलाएं नहीं तो करें क्या! किसानों को पराली नष्ट करने का
विकल्प सुझाने में सरकारें नाकाम रही हैं। जबकि दावे तो ये किए
जा रहे हैं कि कई जगहों पर पराली कटवा कर बिकवाई जा रही है,
लेकिन अगर ऐसा है भी तो बहुत ही कम जगहों पर। ज्यादातर
किसानों के समक्ष आज भी पराली जलाने के अलावा कोई और
रास्ता नहीं है। पिछले साल पंजाब सरकार ने किसानों को पराली नष्ट
करने की मशीनें देने की योजना बनाई थी, लेकिन ज्यादातर किसान
गरीब हैं और वह योजना इनके लिए निरर्थक साबित हुई। ऐसे में
पराली का किया क्या जाए, किसी को समझ नहीं आ रहा। 

Danik jagran 434 words 90wpm 5 min 

कश्मीर की चुनौती
कश्मीर में पोस्ट पेड मोबाइल सेवाएं शुरू होना इस बात का संकेत है कि
केंद्र सरकार घाटी के हालात तेजी के साथ सामान्य बनाने में लगी हुई है।
पोस्ट पेड मोबाइल सेवाएं शुरू होने से कश्मीर के लोगों को तो सहूलियत
मिलेगी ही, दुनिया को यह संदेश भी जाएगा कि भारत सरकार अपने उस
बादे को पूरा करने के प्रति गंभीर है जिसके तहत यह कहा गया था कि
भेदभाव भरे अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद देश के इस हिस्से में
लगाई गई पाबंदियां अधिक समय तक नहीं रहेंगी। इसकी अनदेखी नहीं
की जानी चाहिए कि पोस्ट पेड मोबाइल सेवाएं शुरू करने के पहले भी
कई ऐसे कदम उठाए जा चुके हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि मोदी
सरकार कश्मीर के हालात सामान्य करने को लेकर हरसंभव उपाय कर
रही है। जम्मू-कश्मीर को 31 अक्टूबर को औपचारिक रूप से केंद्र
शासित प्रदेश बनना है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तब तक कश्मीर
के सभी 10 जिलों में लगाई गई हर तरह की पाबंदियों को हटा लेने की
नौबत आ जाएगी। वैसे भी अब प्री पेड़ मोबाइल सेवाओं और इंटरनेट
की बहाली के साथ कुछ प्रमुख नेताओं की नजरबंदी हटना ही शेष है।
यह भी ध्यान रहे कि खुद प्रधानमंत्री की ओर से यह कहा गया है कि चार
माह के अंदर कश्मीर के हालात सामान्य कर लिए जाएंगे।
जो लोग कश्मीर के मौजूदा हालात को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने में
लगे हुए हैं और इस क्रम में दुष्प्रचार का भी सहारा ले रहे हैं उन्हें इसकी
अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि कश्मीर घाटी बीते लगभग तीन दशकों
से अशांत है। इस अशांति का कारण कश्मीर में अलगाववादियों के
साथ ऐसे तत्वों का उभार है जो न केवल पाकिस्तानपरस्त हैं, बल्कि
आतंकियों के समर्थक भी हैं। ऐसे तत्वों पर लगाम लगाना अभी भी
एक चुनौती है। यह चुनौती इसलिए और अधिक बढ़ गई है, क्योंकि
पाकिस्तान इस ताक में है कि कश्मीर के हालात कैसे बिगाड़े जाएं?
स्पष्ट है कि भारत सरकार को कश्मीर में सक्रिय अलगाववादियों और
पाकिस्तानपरस्त तत्वों पर निर्णायक अंकुश लगाने के साथ ही पाकिस्तान
पर भी दबाव बढ़ाना होगा। हालांकि पाकिस्तान अपने अंदरूनी हालात
से बुरी तरह त्रस्त है, लेकिन उसका कश्मीर राग शांत होने का नाम नहीं
ले रहा है। भारत को वह देखना ही होगा कि पाकिस्तान कश्मीर पर आंसू
बहाना कैसे बंद करें? इसी के साथ उसे इसके लिए भी सक्रिय होना
होगा कि कश्मीर घाटी की अमन पसंद जनता अलगाववादियों और
आतंकवादियों के खिलाफ मुखर हो। इससे ही घाटी का माहौल बदलेगा।
बीते 70-72 दिनों का अनुभव यही बताता है कि माहौल बदलने का यह
कार्य कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।



Hindustan 100wpm 554 words 5.5min
पंजाब और हरियाणा के खेतों से निकला धुआं उत्तर भारत के आसमान पर छाने लगा है। इसने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, यानी एनसीआर की पहले से ही काफी प्रदूषित हवा में कुछ और तीखापन घोल दिया है। वैसे यह हर साल ही होता है। अक्तूबर के महीने में जब खरीफ की फसल कट जाती है, तो खेतों में बच गए फसल के बाकी हिस्से को किसान जला डालते हैं। कुछ ही दिनों के भीतर उन्हें रबी की फसल के लिए खेत तैयार करना होता है, इसलिए मैदान साफ करने का सबसे आसान तरीका होता है खेतों में बची पराली को जला देना। इसके कुछ छोटे-मोटे फायदे और भी होते हैं, और कुल मिलाकर इन्हीं सब के लिए हवा में जहर घोलने का काम बरसों-बरस से चल रहा है। पिछले कुछ साल से इस पर सख्ती बरती जानी शुरू हुई है। राष्ट्रीय हरित अधिकरणने इस पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है। पंजाब और हरियाणा की सरकारों ने पराली जलाने पर जुर्माने का प्रावधान भी किया है। इस सबसे उम्मीद बनी थी कि इस साल पराली जलाने की घटनाएं कम होंगी। लेकिन इसका उल्टा हो रहा है। पंजाब में इस साल पराली जलाने की घटनाएं 45 फीसदी तक बढ़ गई हैं। पंजाब प्रदूषण बोर्ड के रिमोट सेंसिंग केंद्र के आंकडे़ बता रहे हैं कि पिछले साल 11 अक्तूबर तक पराली जलाने की 435 घटनाएं हुई थीं, इस साल इस समय तक ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़कर 630 हो गई है। हरियाणा से ऐसे आंकड़े नहीं मिले हैं, लेकिन आशंका यही है कि वहां भी ऐसी घटनाएं बढ़ी ही होंगी। हरियाणा में इस समय विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है और प्रशासन के लिए वह सबसे बड़ी प्राथमिकता है, शायद इसलिए भी पराली जलाने की घटनाओं को रोकने की बड़े पैमाने पर कोशिश शुरू नहीं हुई है।

हर साल जब पराली का धुआं राजधानी और इसके आस-पास के इलाके पर छाता है, तो हम किसानों को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर देते हैं। साथ ही, उन्हें यह सबक भी दिया जाता है कि पराली को जलाने की बजाय उसके इस्तेमाल के और कई अच्छे विकल्प हैं। बेशक ऐसे विकल्प हैं, पर सच यही है कि उन्हें अभी न तो किसानों तक पहंुचाया जा सका है और न ही किसानों को आश्वस्त किया जा सका है कि ऐसे विकल्प उनके लिए आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद हो सकते हैं। इस मामले में पाबंदी और जुर्माने के साथ ही रचनात्मक सक्रियता की जरूरत है, जो कहीं नहीं दिखती।

वैसे पराली जलाने की समस्या भारत की ही नहीं, दुनिया के कई देशों की है। चीन में तो यह समस्या है ही, अमेरिका और फ्रांस तक इससे परेशान रहे हैं। दुनिया भर का जिक्र इसलिए जरूरी है कि समस्या का एक कारण फसल कटाई की आधुनिक तकनीक भी है, जिससे पौधों का एक बड़ा हिस्सा खेतों में लगा रह जाता है। कई देशों के किसानों ने वैकल्पिक तरीकों को भी अपनाया है। जाहिर है, ऐसे तरीके किसान तभी अपनाते हैं, जब उसमें उन्हें कोई फायदा दिखे। ऐसे देशों की सीख भी काम की हो सकती है। हमारे देश में खेती जिस तरह से घाटे का सौदा बनी है, उसमें यह उम्मीद व्यर्थ है कि किसान खेतों को पराली मुक्त करने के लिए अतिरिक्त श्रम या संसाधन खर्च करेंगे। वैकल्पिक तरीकों को सीखने की उनकी क्षमता भी सीमित है। यह काम सरकारों और स्वयंसेवी संगठनों को ही करना होगा।554 words
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