Editorial 1nov

Editorial dictation 1 nov 2019


Hindustan 80wpm 400words
इस बार उन पर जो संकट आया है, वह राजनीतिक है। यूं भी कह सकते हैं कि सत्ता संभालने के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पहली बार किसी बडे़ राजनीतिक संकट से मुकाबिल हैं। वह भी उस समय, जब आर्थिक संकट तो उनकी जान के पीछे पड़ा ही है, विदेश नीति के मोर्चे पर भी वे लगातार मुंह की खा रहे हैं। मुल्क की राजनीति उनके लिए बड़ा सिरदर्द खड़ा कर सकती है, यह आशंका इमरान खान को शुरू से ही थी, इसलिए उन्होंने नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग को ध्वस्त करने के तमाम हथकंडे अपनाए। भ्रष्टाचार के आरोप में नवाज शरीफ और उनकी बेटी को जेल में भी डाल दिया। इस काम में सेना ने भी उनका पूरा साथ दिया। लेकिन अब लगता है कि वह अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी को कमजोर करके भी राजनीतिक संकट से खुद को बचा न पाए। संकट खड़ा किया है जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर रहमान ने। वह लाखों प्रदर्शनकारियों का कारवां लेकर पाकिस्तान के कई बडे़ शहरों का चक्कर काटते हुए अब राजधानी इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं। उन्होंने अपने इस अभियान को आजादी मार्च का नाम दिया है और वह इमरान खान सरकार को उखाड़ फेंकने तक जमे रहने की बात कर रहे हैं। उम्मीद थी कि महीने की आखिरी तारीख को वह अपने आगे के कार्यक्रम की घोषणा करेंगे, मगर पाकिस्तान की एक ट्रेन में हुए भीषण अग्निकांड के बाद उन्होंने इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया, अब नजर शुक्रवार के उनके भाषण पर रहेगी। संकट इसलिए बड़ा है कि देश के दो प्रमुख विपक्षी दल नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग और आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी मौलाना के साथ आ खडे़ हुए हैं। यह भी खबर है कि शुक्रवार के कार्यक्रम में मुख्य वक्ता नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ होंगे।

वैसे मौलाना फजलुर रहमान और इमरान खान में शुरू से ही छत्तीस का नाता रहा है। इमरान जहां उन्हें मौलाना डीजल कहते हैं, तो अपनी सभाओं में फजलुर रहमान इमरान खान को यहूदी बताते हैं। मौलाना फजलुर रहमान अपने धरना-प्रदर्शनों से सरकारों के लिए सिरदर्द खड़ा करने के मामले में मशहूर रहे हैं। उनका राजनीतिक दल भले ही बड़ा न रहा हो, लेकिन नारंगी रंग की छींटदार पगड़ी बांधने वाले फजलुर रहमान का प्रभाव क्षेत्र काफी मजबूत है। पाकिस्तान में यह भी कहा जाता है कि उनका संगठन वहां बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा देने वाले मदरसे चलाता है। 400words.

Danik jagran 90wpm 429words
दिल्ली और उसके आसपास के इलाके के साथ उत्तर भारत के एक बड़े
हिस्से में बायु प्रदूषण का विकराल रूप यही बता रहा है कि उस पर नियंत्रण
पाने के दाबे थोथे साबित हुए। ये दाबे इसलिए थोथे साबित हुए, क्योंकि
जिन पर भी बायुमंडल को दूषित होने से बचाने की जिम्मेदारी है उन्होंने
कुछ न करना ही बेहतर समझा। यह देखना दयनीय है कि केंद्र सरकार से
लेकर राज्य सरकारें और उनकी तमाम एजेंसियों के साथ एनजीटी और
सुप्रीम कोर्ट तक प्रदूषण पर लगाम लगाने के जतन करते रहे, लेकिन सब
को नाकामी ही मिली। ऐसा लगता है कि प्रदूषण नियंत्रण के मामले में
ज्यादा जोगी मठ उजाड़ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। बायु प्रदूषण के
खतरनाक स्तर तक पहुंच जाने की एक बड़ी वजह यह है कि उसके मूल
कारणों को समझने और उनका निवारण करने की जरूरत नहीं समझी जा
रही है। ऐसा तब है जब बीते करीब एक दशक से बायु प्रदूषण एक खतरे
के रूप में चित्रित हो रहा है। यह शासन व्यवस्था की नाकामी का नमूना
ही है कि वायु प्रदूषण की चिंता केवल सर्दियों में ही की जाती है। क्या शेष
समय उत्तर भारत का बायुमंडल साफ-सुथरा रहता है? जो भी हो, तमाम
कबायद के बाद भी बायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर एक तरह से जीने के
अधिकार पर आघात ही है।
जब हरियाणा और पंजाब के साथ देश के कुछ अन्य हिस्सों में फसलों
के अवशेष जलाए जाने लगते हैं तब इसकी चिंता की जाती है कि ऐसा
क्यों हो रहा है? जब तक इस सवाल की तह तक जाने की दिखाबटी
कोशिश होती है तब तक फसलों के बचे-खुचे अवशेष भी जलाए जाने
लगते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। यह लज्जा की बात है कि हस्याणा
और पंजाब की सरकारें एक बार फिर ऐसे प्रबंध नहीं कर सकीं कि किसान
पराली न जलाने पाएं। इन दोनों राज्य सरकारों के नाकारापन के सामने
केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कुल मिलाकर असहाय
ही साबित हुआ। ऐसा नहीं है कि केवल फसलों के अवशेष जलाने से ही
प्रदूषण की समस्या सिर उठाती हो, लेकिन जब उनका धुआं सड़कों और
निर्माण स्थलों से उड़ने बाली धूल और वाहनों के त्सर्जन से मिलता
तो बह सेहत के लिए जानलेबा स्मॉग में तब्दील हो जाता है । निःसंदेह
दीपावली के दौरान पटाखे दागे जाने के कारण भी वायुमंडल खराब
होता है, लेकिन केबल उन्हें ही जिम्मेदार ठहराना समस्या का सरलीकरण
करना ही है। इस बार कहीं कम पटाखे दगे, लेकिन प्रदूषण का स्तर कहीं
अधिक गंभीर हो गया। स्पष्ट है कि समस्या की जड़ में शासन-प्रशासन का
निठल्लापन ही है।429w0rds


Jansatta 100wpm 500words
दुनिया भर में पर्यावरण के संरक्षण को लेकर बढ़ती चिंता के बीच
जंगल और पेड़ों को बचाने पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है।
खासतौर पर विकास के नाम पर पेड़ों को व्यापक पैमाने पर काटने
पर न केवल तीखे सवाल उठे हैं, बल्कि इस मसले पर आंदोलन भी
खड़े हो रहे हैं। लेकिन पेड़ों को बचाने की चिंता के बीच शायद ही
इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि इन्हें काटे जाने का एक बड़ा
कारण कागजों का बेजा इस्तेमाल भी है । गौरतलब है कि कागज
तैयार करने के काम में आने वाले पेड़ों की कटाई आज एक बड़ी
समस्या हो चुकी है और तेजी से कटते पेड़ पर्यावरण के संकट को
और बढ़ा रहे हैं। फिर ऐसी स्थिति में अगर कहीं कागज के बेजा
इस्तेमाल को हतोत्साहित करने का प्रयास होता है तो यह
स्वागतयोग्य है। रेलवे महकमे में यों तो कामकाज में तेजी लाने के
मकसद से अट्ठावन बड़े दफ्तरों में कागज पर कामकाज पूरी तरह
बंद कर दिया गया है, लेकिन इसका सीधा असर कागज की भारी
पैमाने पर बचत के रूप में होगा। और कागज बचाने को जिस तरह
पेड़ बचाने के रूप देखा जाता है, उससे साफ है कि इस तरह की
कोई भी कोशिश पर्यावरण की फिक्र के रूप में देखी जाएगी।
ताजा कवायद के रूप में रेलवे के दफ्तरों के जरिए करीब पचास
हजार रेल कर्मचारी ऑनलाइन सेवाओं से जोड़ दिए गए हैं। निश्चित
रूप से नई व्यवस्था की मदद से केंद्रीय स्तर पर फाइलों की निगरानी
की जा सकेगी और काम की रफ्तार में बढ़ोतरी होगी। मगर इसके
साथ-साथ कागज का प्रयोग खत्म होने का फायदा कार्बन फुट-प्रिंट
में कमी लाने में भी मिलेगा। इससे पहले भी देश भर में कागज को
बचाने या इसका इस्तेमाल खत्म करने के लिए अलग अलग स्तर
पर पहलकदमी हुई है। मसलन, करीब डेढ़ महीने पहले झारखंड में
नवनिर्मित विधानसभा को पहली कागजरहित विधानसभा का दर्जा
मिला है। इसके अलावा खनन और नागर विमानन मंत्रालय इसी
साल फरवरी में उन नौ सरकारी संगठनों में शामिल था, जिन्हें
कागजरहित कार्य को बढ़ावा देने के लिए पूरस्कृत किया गया था।
खुद प्रधानमंत्री ने लगभग ढाई साल पहले ही कहा था कि किसी
संस्थान के भीतर प्रौद्योगिकी को सामूहिक तौर पर अपनाया जा
सकता है; इस तरह कागज रहित पहल से पर्यावरण की सुरक्षा होगी
और इसलिए यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक अच्छी सेवा है ।
जाहिर है, ज्यादातर काम आधुनिक तकनीकी पर निर्भर होते जाने
के डिजिटल दौर में कागज के कम से कम प्रयोग के जरिए पर्यावरण
को बहुस्तरीय फायदा पहुंचाया जा सकता है। इसलिए लगभग सभी
पर्यावरणविद पेड़ लगाने या मौजूदा पेड़ बचाने के साथ-साथ कागज
के बेलगाम प्रयोग को बंद करने या कम करने की सलाह देते रहे हैं ।
विडंबना यह है कि जहां हम कागज का कम इस्तेमाल कर सकते हैं
या बिना कागज के भी काम चला सकते हैं, वहां हम इसको देख रहे हैं। 500words

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