Editorial 25 oct
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Danik jagran 80wpm 5 min
महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे एक बार फिर यह कह रहे हैं कि विधानसभा
चुनावों में राष्ट्रीय मुद्दे कभी-कभार ही कारगर होते हैं। अम तौर पर राज्य स्तर के
चुनावों में एक बड़ी भूमिका क्षेत्रीय मसलों की होती है क्षेत्रीय मसलों के अलावा
जाति-बिरादरी भी अपना असर दिखाती है। यही कारण स्थ कि चंद माह पहले
लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र और हरियाणा में जोरदार प्रदर्शन करने वाली भाजपा
इन राज्यों में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी। महाराष्ट्र में उसे जितनी
सीटों की उम्मीद थी उतनी नहीं मिल सकीं और हरियाणा में बह 75 पार के अपने
लक्ष्व के करीब जाना तो दूर रहा, बहुमत तक भी नहीं पहुंच पाई। ऐसा क्यों हुआ,
इसकी तह तक जाने के क्रम में भाजपा नेतृत्व को यह अक्श्य देखना चाहिए कि
जब खेती संकट में हो, रोजगार का सवाल गंभीर होता जा सहा हो और मंदी का
माहौल लोगों की चिंताएं बढ़ा रहा हो तब फिर राष्ट्रीय मसले उसकी नैया नहीं पार
करा सकते। यह सही है कि महाराष्ट्र में भाजपा इस बार फिछली बार के मुकाबले
कहीं कम सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसका मौजूदा संख्याबल इतना नहीं
कि वह शिवसेना के अनुचित दबाव का प्रतिकार कर सके। अगर शिवसेना के
साथ खींचतान बढ़ी तो इसका असर सरकार के कामकाज पर पड़ सकता है।
अगर महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा को मन मुताबिक नतीजे नहीं हासिल हो
सके और उसके कई दिग्गज मंत्री भी चुनाव हार गए तो इसका एक अर्थ यह भी है
कि लोगों को अपनी सरकारों से जो अपेक्षाएं थी वे सही तर्ह पूरी नहीं हुई। निःसंदेह
यह भी दिख हा है कि मतदाताओं ने विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों को
अधिक महत्व नहीं दिया। इसकी एक वजह जातीय समीकरणों की भूमिका भी
हो सकती है। यह सही है कि भारत सरीखे देश में केंद्र हो या राज्य सरकारें, वे न
तो सबको संतुष्ट कर सकती हैं और न ही पांच साल में सभी समस्याओं को हल
कर सकती हैं, लेकिन उन्हें इस तरह तो काम करना ही चाहिए कि अमें जनता
का भरोसा बढ़े। कम से कम हस्याणा में तो ऐसा होेता नहीं दिखा। बेहतर हो कि
भाजपा नेतृत्व अपनी राज्य सरकारों के कामकाज की समीक्षा करे कह इसकी
अनदेखी नहीं कर सकता कि तमाम कमजोरियों के बाद भी विपक्ष अपनी जमीन
मजबूत करता दिख रह है। विपक्ष और अधिक मजबूती ह्यसिल कर सकता था,
यदि कांग्रेस दिशाहीनता से मुक्त होकर अन्य विपक्षी दलों का सही तरह नेतृत्व कर
रही होती। 407words
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चुनाव में मतदाता जब वोट देते हैं, तो वे सिर्फ उम्मीदवारों को जिताते या
हराते नहीं है, वे उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश भी
देते हैं । महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखें,
तो यह संदेश स्पष्ट सुना जा सकता है। पूरे चुनाव के दौरान और मतदान
के बाद तक यह माना जा रहा था कि दोनों ही राज्यों में भारतीय जनता
पार्टी जोरदार ढंग से सत्ता में वापसी करेगी। यहां तक कि मतदान बाद के
तमाम सर्वेक्षण भी यही कह रहे थे। ऐसे नतीजों पर पहुंचना सबके लिए
बहुत आसान भी था। सत्ताधारी दल के पास गिनाने के लिए पांच साल
कार्यकाल की बहुत सारी उपलब्धियां थीं। यही हर चुनाव में होता है
और अंतिम नतीजे इस पर निर्भर करते हैं कि विपक्ष उसके दावों को
खारिज करने में किस हद तक कामयाब हो पाता है। महाराष्ट्र और
हरियाणा, दोनों ही जगह के विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम
विश्लेषकों में इस बात पर आम सहमति जैसी दिख रही थी कि इस बार
विपक्ष का नैरेटिव बहुत कमजोर है। कई कारणों से विपक्ष हतोत्साहित
दिख भी रहा था। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और महाराष्ट्र में शरद
पवार परिवार अपनी राजनीति के
कारण कम और अपने खिलाफ
चल रहे मुकदमों के कारण सुर्खियों
में ज्यादा दिख रहा था। इन्हीं हालात
में मतदाता ने संदेश दिया है कि उसे
कमजोर विपक्ष पसंद नहीं है।
महाराष्ट्र में तो खैर भाजपा और
शिव सेना की सरकार पहले की
तरह ही चलती रहेगी, हरियाणा में
त्रिशंकु विधानसभा है, सरकार
किसकी बनेगी, अभी यह
भविष्यवाणी संभव नहीं, लेकिन
दोनों ही राज्यों में मतदाताओं ने
मजबूत विपक्ष का आधार तैयार कर दिया है। महाराष्ट्र में सत्ताधारी
गठजोड़ के पास स्पष्ट बहुमत है, लेकिन संख्या बल इतना ज्यादा नहीं
रह गया कि विपक्ष की आवाज दब जाए। वैसे यह भी सच है कि पिछले
पांच साल के दौरान विपक्ष की भूमिका ज्यादा अच्छी तरह से भाजपा
की सहयोगी शिव सेना ने ही निभाई, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के
गठजोड़ ने नहीं । हरियाणा में विपक्ष इस दौरान अंदरूनी झगड़ों और
घटकवाद में ही उलझा दिखाई दिया। दिलचस्प यही है कि इन हालात
के बाद भी जनता ने विपक्ष को मजबूत बनाने का रास्ता चुना। महाराष्ट्र
में तो खैर सत्ता नहीं बदली और हरियाणा में भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी
बनकर उभरी है, मगर इसका एक अर्थ यह भी है कि मतदाताओं में
बदलाव की कोई बड़ी इच्छा नहीं थी, पर उसने विपक्ष को एक बड़ी
भूमिका जरूर सौंप दी है। अब यह विपक्ष पर है कि वह जनता के इस
विश्वास को किस तरफ ले जाता है।
दोनों ही राज्यों में भाजपा ने प्रचार का मुख्य मुद्दा कश्मीर और
अनुच्छेद 370 को बनाया। ये दोनों ही ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर देश भर में
आम सहमति है455words
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हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे अनुमान के विपरीत आए हैं।
भाजपा को पूरा विश्वास था और मतदान पश्चात के सर्वेक्षण भी बता
रहे थे कि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार बनेगी। इसकी कुछ ठोस
वजहें भी थीं । दोनों जगह कोई सत्ता विरोधी लहर नजर नहीं आ रही थी।
महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर सरकार
के कामकाज कमोबेश संतोषजनक ही नजर आ रहे थे । इसलिए दोनों
जगहों पर भाजपा अपनी सीटों में इजाफे की उम्मीद कर रही थी।
हरियाणा में तो उसने नब्बे में से पचहत्तर से ऊपर सीटें जीतने का दावा
किया था। पर वहां वह बहुमत के करीब पहुंचने से भी रह गई। पिछली
बार की तुलना में उसने अपनी करीब आठ सीटें गंवा दी । वहां नई बनी
जननायक जनता पार्टी ने अपनी जोरदारी पारी की शुरुआत की। वह दस
सीटें अपने खाते में ले गई। जबकि इंडियन नेशनल लोकदल का एक
तरह से अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है । इन सबके बीच उम्मीद के
उलट दोनों राज्यों में कांग्रेस की हैसियत बढ़ी दर्ज हुई। ऐसे वक्त में जब
कांग्रेस के भीतर कलह है, बहुत सारे नेता छोड़ कर जा चुके हैं या फिर
नाराज चल रहे हैं, दोनों राज्यों में वह बहुत ढीले-ढाले तरीके से मैदान
में उतरी थी, तब उसका भाजपा को टक्कर देना और चौंकाने वाले नतीजों
तक पहुंच जाना मतदाता के मन की कुछ और ही थाह देता है।
हालांकि विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं,
पर राष्ट्रीय मुद्दे भी कहीं न कहीं उनके साथ नत्थी होते हैं। भारतीय
जनता पार्टी पिछले पांच सालों से विजय रथ पर सवार है । प्रधानमंत्री
पर लोगों का भरोसा कमजोर नहीं हुआ है। इसलिए जिन राज्यों में
पहले से भाजपा की सरकारें रही हैं, वहां माना जाता रहा है कि यह
भरोसा उसे विजय दिलाएगा। मगर राजस्थान, मध्यप्रदेश और
छत्तीसगढ़ में यह प्रभाव काम नहीं आया । फिर लोकसभा चुनावों में
भाजपा ने अप्रत्याशित विजय हासिल की, तो पार्टी के हौसले
स्वाभाविक रूप से बढ़े। इसके अलावा मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस
लगातार कमजोर होती दिखी। लोकसभा नतीजों के बाद उसके राष्ट्रीय
अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया, फिर लंबे समय तक उन्हें मनाने और नए
अध्यक्ष पर विचार की प्रक्रिया चलती रही। अंततः सोनिया गांधी को
ही तदर्थ जिम्मेदारी सौंप दी गई। इससे पार्टी में कलह उभरा। हरियाणा
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कई कद्दावर नेता अलग हो गए । वे
अलग-अलग मंचों से अपनी ताकत प्रदर्शित करने लगे । उससे भी
भाजपा की स्थिति मजबूत लगने लगी थी। पर मतदाता ने उसकी तरफ
एक बार फिर रुख कर लिया।
महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा को हुए नुकसान की कुछ वजहें
साफ हैं। एक तो यह कि उसने स्थानीय मुद्दों
राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, सुरक्षा आदि मुद्दे उठाए । स्थानीय मुद्दों की तरफ
ध्यान नहीं दिया गया, जबकि विपक्षी दल उसे महंगाई, खराब
अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली आदि मुद्दों पर घेर रहे
थे। इसके अलावा, भाजपा नेताओं और कार्यकर्ता ओं में जीत का
अतिरिक्त आत्मविश्वास नजर आने लगा था, जिसके चलते कई नेता
ईवीएम और जीत आदि से जुड़े बयान देते देखे गए।507words
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