Editorial 30oct

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Jansatta 80wpm
5min 402words

कमीर में बढ़ती आतंकी हिंसा की जो खबरें आ रही हैं, वे चिंताजनक
हैं। पूरी कश्मीर घाटी में सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस की भारी
तैनाती, अनवरत निगरानी के बावजूद आतंकी जिस तरह से वारदात को
अंजाम दे रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि आतंकियों का नेटवर्क अभी भी
कमजोर नहीं पड़ा है और वे अपने मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं । सोमवार
को सोपोर में आतंकियों ने बस अड्डे पर हथगोला फेंक कर हमला किया ।
इस घटना में बीस लोग घायल हो गए । इससे टीक तीन दिन पहले श्रीनगर
में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के दल पर आतंकी हमले में छह जवान जख्मी
हो गए थे । तीन दिनों में लगातार दो हमले बता रहे हैं कि आतंकियों का
दुस्साहस कम नहीं हो पाया है और वे जगह-जगह बमों से हमले कर
लोगों में दहशत फैलाने में कामयाब हो रहे हैं । हैरानी की बात यह है कि
हमलावर आतंकी भाग निकलने में भी सफल रहते हैं । ऐसे में आतंकियों
से निपटने की रणनीति पर सवाल उठने लाजिमी हैं। ऐसा लगता है कि
घाटी में आतंकियों से निपटने और उन्हें खोज निकालने की सेना, सुरक्षा
बलों की रणनीति में कहीं न कहीं खामियां हैं । बढ़ते आतंकी हमले क्या
आतंकवाद से निपटने के सरकारी दावों की पोल नहीं खोलते ?
दूसरी चिंताजनक बात घाटी में ट्रक ड्राइवरों पर होने वाले हमले
हैं। सोमवार को दक्षिण कश्मीर के बिजबेहड़ा में फिर एक ट्रक ड्राइवर
को आतंकवादियों ने मार डाला। इससे पहले चौदह अक्तूबर को भी
शोपियां में एक ट्रक ड्राइवर की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के
दो दिन बाद पंजाब के दो सेब व्यापारियों को आतंकियों ने अपना
निशाना बनाया और उनके ट्रक को आग के हवालै कर दिया था ।
जाहिर है, आतंकियों की रणनीति अब व्यापारियों को निशाना बनाने की
है, ताकि व्यापारी कारोबार न कर पाएं। इस वक्त घाटी में ज्यादातर
धंधे ठप पड़े हैं। कश्मीर में पिछले तीन महीने के दौरान दस हजार
करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबारी नुकसान हो चुका है । ले -देकर
कुछ उम्मीदें सैब व्यापारियों को बनी थीं और सरकार ने कारोबारियों
को पूरी सुरक्षा मुहैया कराने का भरोसा भी दिया था । लेकिन अब
हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं। बागों में सेब सड़ रहे हैं, लेकिन
उन्हें उठाने और मंडियों तक पहुंचाने का पुख्ता इंतजाम नहीं है। अब
तो दहशतगदों ने जिस तरह ट्रक ड्राइवरों को निशाना बनाना शुरू कर
दिया है 402words 

Hindustan 90wpm 465 words
कश्मीर में सुरक्षा कारणों से लगाई गई पाबंदियों में ढील दिए जाने के बाद से यह लगातार चौथी ऐसी घटना है। सोमवार को फिर कश्मीर में एक ट्रक ड्राइवर की आतंकवादियों ने हत्या कर दी। स्थिति नाजुक है, यह खुद सरकार भी समझ रही थी, कश्मीर के शोपियां क्षेत्र के लिए तो चेतावनी ही जारी कर दी गई थी कि बाहरी ट्रक ड्राइवर या मजदूर वगैरह उस इलाके में न जाएं। कश्मीर में इस समय सेब का सीजन चल रहा है। सेब के लदान और उन्हें पूरे देश व दुनिया में ले जाने के लिए बडे़ पैमाने पर मजदूर और ट्रक ड्राइवर वगैरह जाते हैं। अपना पेट पालने के साथ ही ये लोग कश्मीर की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देते हैं। इन लोगों के न जाने का अर्थ होगा, कश्मीर की अर्थव्यवस्था को आघात पहुंचना। कश्मीर में सेब की बागवानी न सिर्फ स्थानीय और खासकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग है, बल्कि यह एक तरह से पूरी दुनिया में कश्मीर को पहचान भी देती है। जाहिर है, कश्मीर में इस समय ऐसी ताकतें सक्रिय हो गई हैं, जो सीधे तौर पर उसकी अर्थव्यवस्था को बड़ा आघात पहुंचाना चाहती हैं। यह भी मुमकिन है कि उनका इरादा वहां आर्थिक बदहाली फैलाकर लोगों में असंतोष पैदा करना हो। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सरकार ने कश्मीर में आतंकवाद पर लगाम लगाने में खासी कामयाबी हासिल की है, लेकिन इस तरह की इक्का-दुक्का घटनाओं को रोकना आसान नहीं है। यह समय और ज्यादा सख्त कदम उठाए जाने का भी नहीं है, क्योंकि आखिरकार यह देखना भी सरकार की ही जिम्मेदारी है कि बागवानों का यह सीजन खराब न जाए।

सोमवार को हुई ट्रक ड्राइवर की हत्या पहली तीन ऐसी घटनाओं से इस मायने में अलग है कि इस वारदात को अंजाम देने के लिए एक खास दिन चुना गया। इसकी खबर मंगलवार को ठीक उस समय आई, जब यूरोपीय सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल को हालात का जायजा लेने के लिए कश्मीर जाना था। मंगलवार को ही सुरक्षा बलों पर पथराव की भी कुछ खबरें आईं और इसी दिन श्रीनगर बंद की भी घोषणा की गई। जाहिर है, इन सारी कोशिशों के पीछे अलगाववादियों का एक ही इरादा था- भारत सरकार की कोशिशों पर पानी फेरना और दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश करना कि कश्मीर में सब कुछ ठीक नहीं है। हालांकि इस चक्कर में आतंकवादी संगठनों ने दुनिया को यह भी बता दिया कि गड़बड़ी अगर हो रही है, तो किस तरफ से हो रही है, और उनके पीछे कौन है?

कश्मीर में केंद्र सरकार की चुनौतियां बढ़ भले ही न रही हों, लेकिन वे लगातार जटिल होती जा रही हैं। जब पाकिस्तान पूरी दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि कश्मीर में सब सामान्य नहीं है, तब भारत सरकार को भी पूरी दुनिया को यह बताना पड़ रहा है 465words
Danik jagran 100wpm 412 words
महाराष्ट्र में सरकार गठन में हो रही देरी भाजपा और शिवसना के बाच
बढ़ती खींचतान को ही बयान कर रही है। ऐसा लगता है कि यह खींचतान
लंबी खिंचेगी, क्योंकि जहां शिवसेना इस पर अड़ी है कि ढाई-ढाई साल के
फार्मूले के तहत दोनों दल के नेता बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनें वहीं भाजपा
ऐसी किसी व्यवस्था को स्वीकार करने से इन्कार कर रही है। गठबंधन
सरकार के गठन के दौरान सहयोगी दलों के बीच कुछ न कुछ खींचतान
होती ही है, लेकिन महाराष्ट्र में वह कुछ ज्यादा ही विद्वूप होती जा रही है।
समस्या केवल यह नहीं कि सरकार गठन को लेकर कोई सहमति नहीं बन
रही है, बल्कि यह भी है कि दोनों दलों के बीच मतभेद कटुता का रूप ले
रहे हैं। यह कटुता दोनों दलों के संबंधों में खटास ही पैदा करेगी। इसकी
अनदेखी नहीं की जा सकती कि अतीत में दोनों दल एक-दूसरे से छिटक
चुके हैं। पिछला विधानसभा चुनाव दोनों दल अलग-अलग लड़े थे।
राजनीतिक मजबूरी के चलते दोनों फिर से करीब आए । अब उनमें फिर
से दुराव पैदा हो रहा है। इसका एक बड़ा कारण शिवसेना की ओर से यह
प्रदर्शित किया जाना है कि वह भाजपा पर जितने ज्यादा तीखे हमले करेगी,
उसका दावा उतना ही मजबूत होगा।
यह गठबंधन धर्म के खिलाफ है कि शिवसेना भाजपा पर दबाव बनाने
के लिए उसे धमकाने का काम करे। शिवसेना की ओर से यह संकेत दिया
जाना एक तरह की धमकी ही है कि अगर उसकी शर्तें न मानी गईं तो वह
कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के पाले में जा सकती है। फिलहाल यह
नहीं लगता कि वह अपनी इस धमकी को लेकर गंभीर है, लेकिन राजनीति
में कुछ भी हये सकता है। सत्ता की ललक में राजनीतिक दल किसी भी हद
तक जाने को तैयार रहते हैं। पता नहीं शिवसेना क्या करेगी, लेकिन इसमें
कोई दो राय नहीं कि बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद संभालने की व्यवस्था एक
नाकाम फार्मूला है। यह कभी सफल नहीं हो सकता, क्योंकि यह एक-दूसरे
के प्रति अविश्वास पर टिका होता है। ऐसा कोई फार्मूला शासन व्यवस्था
के लिए एक बोझ ही साबित होगा। इसका कोई मतलब नहीं कि कोई
सरकार ढाई साल तक एक तरह से चले और शेष ढाई साल दूसरी तरह से।
अगर ऐसा नहीं होना है तो फिर इसका औचित्य ही क्या है कि बारी-बारी से
दो मुख्यमंत्री ढाई-ढाई साल सरकार चलाएं? यह समय उन तौर-तरीकों पर
विचार करने का है जिनसे महाराष्ट्र की जनता की अपेक्षाओं को सही तरह
से पूरा किया जा सके। 412words

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