भारत में अब तक लगभग 135 ट्रेनों में एक लाख से ज्यादा लोग अपने घर या गृह राज्य लौट चुके हैं , लेकिन यह लौटने की शुरुआत भर है। उत्तर प्रदेश और बिहार में ही करीब 40 लाख लोगों के लौटने का अनुमान है , मगर कुछ हजार लोगों के लौटते ही उन राज्यों की सरकारों पर जोर आने लगा है , जिन्हें मजदूरों का राज्य कहा जाता है। पश्चिम बंगाल सरकार ने तो मुंबई से आने के लिए तैयार अपने लोगों को निराश कर दिया। महाराष्ट्र में मंजूरी मिलने के बाद जब करीब 2,400 लोग बंगाल लौटने को तैयार थे , तब अचानक कदम पीछे खींचने की सराहना नहीं की जा सकती। उचित यही होगा कि लोगों के दबाव और लोकलाज के आगे पश्चिम बंगाल सरकार झुक जाए। बिहार सरकार की नीति भी कुछ बदलती दिख रही है , वह अब केवल बहुत जरूरतमंद लोगों की ही वापसी के पक्ष में है और इसे पूरी तरह से गलत भी नहीं कहा जा सकता। मजदूरों और अपने फंसे हुए लोगों की वापसी का दबाव उत्तर प्रदेश शुरू से ही आगे बढ़कर झेल रहा है और इसके लिए उसकी सराहना होनी ही चाहिए। फिर भी एक हलचल है कि कब तक और कितने लोग लौटेंगे ? घर वापसी शब्द सुनने में बहुत अच्छा लगता है , लेकिन कोरोना के समय में उत्तर...
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