एडिटोरियल dictation 17 oct
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एडिटोरियल dictation
दैनिक जागरण 5 min 80wpm 429 words
अयोध्या मामले की सुनवाई तय समय में पूरी होने के साथ ही सदियों
पुराने इस विवाद के समाधान की उम्मीद बढ़ गई है। चूंकि इस मामले
की सुनवाई कर रही संविधान पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश 17
नवंबर को सेवानिवृत हो रहे हैं इसलिए इसके पहले फैसला आना है।
इस मामले में फैसला कुछ भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती
कि एक समय यह धारणा बन रही थी कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक एवं
सामाजिक रूप से संवेदनशील इस प्रकरण की सुनवाई करने से बचना
चाह रहा है। लंबे इंतजार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को दूर करते
हुए इस मामले की सुनवाई करने का फैसला किया और उसने दिन-
प्रतिदिन सुनवाई की। राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई में ऐसी ही
तत्परता का परिचय दिया जाना चाहिए, क्योंकि एक बड़ी संख्या में लोग
फैसले की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। इस मामले में तो फैसले का इंतजार
पूरा देश ही कर रहा है।
बेहतर तो यह होता कि अयोध्या मामला अदालत की चौखट तक
आता ही नहीं, लेकिन जब आपसी बातचीत से मामले को सुलझाने की
कोशिश नाकाम रही तब फिर इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया
था कि अदालत अपना फैसला सुनाए। भले ही दुनिया की नजर में यह
मामला जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक की लड़ाई हो, लेकिन
सच्चाई यह है कि यह आस्था से जुड़ा सवाल भी है। बैसे तो अदालतें
आस्था से जुड़े मामलों का फैसला आसानी से नहीं कर सकतीं, लेकिन
सौभाग्य से इस मामले में ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हैं जो फैसले को दिशा
देने का काम करेंगे। इनमें सबसे उल्लेखनीय है पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग
की बह रिपोर्ट जो अयोध्या में विवादित स्थल पर किए गए उत्खनन पर
आधारित है। इसके अलावा अन्य अनेक महत्वपूर्ण साक्ष्य भी हैं। अब
जब यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन्हीं साक्ष्यों पर आधारित
होगा तब फिर सभी पक्षों को उसका सम्मान करने के लिए तैयार रहना
चाहिए। उचित यह होगा कि दोनों पक्ष इसके लिए माहौल बनाएं कि जो
भी फैसला आए उसे सभी स्वीकार करें। पूरे देश का ध्यान खींचने बाले
अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर जो तमाम
दलीलें दी गईं उनसे यह तो संकेत मिला कि कौन कितने मजबूत धरातल
पर है, लेकिन उनके आधार पर निष्कर्ष निकालकर अपने - अपने पक्ष में
दावे करने का कोई मतलब नहीं। यह समय किसी भी तरह की दावेदारी
जताने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि सुप्रीम कोर्ट के
फैसले का सम्मान हो। निःसंदेह यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी
उनकी अधिक है जो अयोध्या मामले की सुनवाई से जुड़े रहे हैं। 429 words
पुराने इस विवाद के समाधान की उम्मीद बढ़ गई है। चूंकि इस मामले
की सुनवाई कर रही संविधान पीठ में शामिल प्रधान न्यायाधीश 17
नवंबर को सेवानिवृत हो रहे हैं इसलिए इसके पहले फैसला आना है।
इस मामले में फैसला कुछ भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती
कि एक समय यह धारणा बन रही थी कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक एवं
सामाजिक रूप से संवेदनशील इस प्रकरण की सुनवाई करने से बचना
चाह रहा है। लंबे इंतजार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को दूर करते
हुए इस मामले की सुनवाई करने का फैसला किया और उसने दिन-
प्रतिदिन सुनवाई की। राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई में ऐसी ही
तत्परता का परिचय दिया जाना चाहिए, क्योंकि एक बड़ी संख्या में लोग
फैसले की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। इस मामले में तो फैसले का इंतजार
पूरा देश ही कर रहा है।
बेहतर तो यह होता कि अयोध्या मामला अदालत की चौखट तक
आता ही नहीं, लेकिन जब आपसी बातचीत से मामले को सुलझाने की
कोशिश नाकाम रही तब फिर इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया
था कि अदालत अपना फैसला सुनाए। भले ही दुनिया की नजर में यह
मामला जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक की लड़ाई हो, लेकिन
सच्चाई यह है कि यह आस्था से जुड़ा सवाल भी है। बैसे तो अदालतें
आस्था से जुड़े मामलों का फैसला आसानी से नहीं कर सकतीं, लेकिन
सौभाग्य से इस मामले में ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हैं जो फैसले को दिशा
देने का काम करेंगे। इनमें सबसे उल्लेखनीय है पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग
की बह रिपोर्ट जो अयोध्या में विवादित स्थल पर किए गए उत्खनन पर
आधारित है। इसके अलावा अन्य अनेक महत्वपूर्ण साक्ष्य भी हैं। अब
जब यह स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन्हीं साक्ष्यों पर आधारित
होगा तब फिर सभी पक्षों को उसका सम्मान करने के लिए तैयार रहना
चाहिए। उचित यह होगा कि दोनों पक्ष इसके लिए माहौल बनाएं कि जो
भी फैसला आए उसे सभी स्वीकार करें। पूरे देश का ध्यान खींचने बाले
अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर जो तमाम
दलीलें दी गईं उनसे यह तो संकेत मिला कि कौन कितने मजबूत धरातल
पर है, लेकिन उनके आधार पर निष्कर्ष निकालकर अपने - अपने पक्ष में
दावे करने का कोई मतलब नहीं। यह समय किसी भी तरह की दावेदारी
जताने का नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने का है कि सुप्रीम कोर्ट के
फैसले का सम्मान हो। निःसंदेह यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी
उनकी अधिक है जो अयोध्या मामले की सुनवाई से जुड़े रहे हैं। 429 words
Jansatta 90wpm 571 words 6 min
कुपोषित विकास
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर दुनिया भर में
अर्थव्यवस्था को पैमाना बना कर अलग-अलग देशों में विकास की
चमकती तस्वीरें पेश की जा रही हैं और दूसरी ओर बड़ी तादाद में बच्चे
कुपोषण के शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से मंगलवार को जारी बाल
पोषण संबंधी रिपोर्ट में यह आंकड़ा सामने आया है कि विश्वभर में पांच
साल से कम उम्र के लगभग सत्तर करोड़ बच्चों में से एक तिहाई बच्चे
या तो कुपोषित हैं या फिर मोटापे से पीड़ित हैं। नतीजतन, इन बच्चों पर
पूरे जीन कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रहने का खतरा बना
रहेगा। 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्डरून' रिपोर्ट की ताजा तस्वीर विकास
के दावों की हकीकत बताने के लिए काफी है । सवाल है कि
अर्थव्यवस्था के चमकते आंकड़ों के बरक्स अगर दुनिया के एक तिहाई
बच्चे किसी न किसी बीमारी की चपेट में अपनी जिंदगी कारटेंगे तो उस
चमक को किस तरह देखा जाएगा! विकास के प्रचारित पैमानों में अगर
बच्चों के पोषण पर केंद्रित कार्यक्रम दुनिया के देशों की प्राथमिकता में
शुमार नहीं
का अंदाजा भर लगाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हम स्वस्थ खानपान
की लड़ाई हार रहे हैं। असल में एक नई समस्या यह खड़ी हो रही है।
कि कहीं जरूरत से ज्यादा और असंतुलित खानपान की वजह से बच्चों
का वजन अत्यधिक है तो किसी परिवार में बच्चों को पेट भर खाना भी
नहीं मिल पा रहा है। दोनों ही स्थितियों को कुपोषण के ही रूप में देखा
गया है। एक में बच्चे मोटापे से पीड़ित हो रहे हैं तो दूसरे में बच्चों का
कद अपनी आयु के मुताबिक काफी छोटा है और वे अत्यंत दुबलेपन
की समस्या से जूझ रहे हैं। कुपोषण, भोजन में पोषण तत्त्वों की कमी
और मोटापा एक ही साथ आसपास और यहां तक कि कई बार एक
परिवार में भी देखा जा सकता है । जहां विश्वभर में पांच वर्ष से कम
आयु के बच्चों में से करीब आधे बच्चों को भोजन में आवश्यक विटामिन
और खनिज नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं लगभग दो अरब लोग हानिकारक
खाद्य पदार्थों का जरूरत से ज्यादा सेवन कर रहे हैं, जिसके चलते
मोटापे, हृदय संबंधी और मधुमेह की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
जहां तक भारत का सवाल है, यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक
यहां हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। जबकि देश में हर साल
एक लाख करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद हो जाता है, यानी चालीस
फीसद भोजन वार्षिक उत्पादन में बेकार हो जाता है। जाहिर है, पोषण
का यह असंतुलन खानपान की स्थितियों से जुड़ा है, लेकिन दरअसल
यह असंतुलित विकास नीतियों का नतीजा है। यह ध्यान रखने की
जरूरत है कि पूरी दुनिया को अगले दशक के आखिर तक भुखमरी से
मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया गया है और संयुक्त राष्ट्र के इस लक्ष्य
से भारत भी जुड़ा हुआ है। विकास के बरक्स व्यापक कुपोषण के
विरोधाभास की यह हकीकत इक्कीसवीं सदी के उस दौर में भी कायम
है, जब कई देश अपने सीमा-क्षेत्र में आम लोगों की जरूरतों और यहां
तक कि बुनियादी समस्याओं से दो-चार होने के समांतर दुनिया में खुद
को विकसित और ताकतवर देशों के साथ होड़ में होने का दावा कर
रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि विकास के पैमानों में वे सवाल हाशिये
पर छोड़ दिए जा रहे हैं, जिनके नतीजों में एक बड़ी आबादी अपने बच्चों
का पेट तक ठीक से नहीं भर पा रही है।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एक ओर दुनिया भर में
अर्थव्यवस्था को पैमाना बना कर अलग-अलग देशों में विकास की
चमकती तस्वीरें पेश की जा रही हैं और दूसरी ओर बड़ी तादाद में बच्चे
कुपोषण के शिकार हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से मंगलवार को जारी बाल
पोषण संबंधी रिपोर्ट में यह आंकड़ा सामने आया है कि विश्वभर में पांच
साल से कम उम्र के लगभग सत्तर करोड़ बच्चों में से एक तिहाई बच्चे
या तो कुपोषित हैं या फिर मोटापे से पीड़ित हैं। नतीजतन, इन बच्चों पर
पूरे जीन कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रहने का खतरा बना
रहेगा। 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्डरून' रिपोर्ट की ताजा तस्वीर विकास
के दावों की हकीकत बताने के लिए काफी है । सवाल है कि
अर्थव्यवस्था के चमकते आंकड़ों के बरक्स अगर दुनिया के एक तिहाई
बच्चे किसी न किसी बीमारी की चपेट में अपनी जिंदगी कारटेंगे तो उस
चमक को किस तरह देखा जाएगा! विकास के प्रचारित पैमानों में अगर
बच्चों के पोषण पर केंद्रित कार्यक्रम दुनिया के देशों की प्राथमिकता में
शुमार नहीं
का अंदाजा भर लगाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हम स्वस्थ खानपान
की लड़ाई हार रहे हैं। असल में एक नई समस्या यह खड़ी हो रही है।
कि कहीं जरूरत से ज्यादा और असंतुलित खानपान की वजह से बच्चों
का वजन अत्यधिक है तो किसी परिवार में बच्चों को पेट भर खाना भी
नहीं मिल पा रहा है। दोनों ही स्थितियों को कुपोषण के ही रूप में देखा
गया है। एक में बच्चे मोटापे से पीड़ित हो रहे हैं तो दूसरे में बच्चों का
कद अपनी आयु के मुताबिक काफी छोटा है और वे अत्यंत दुबलेपन
की समस्या से जूझ रहे हैं। कुपोषण, भोजन में पोषण तत्त्वों की कमी
और मोटापा एक ही साथ आसपास और यहां तक कि कई बार एक
परिवार में भी देखा जा सकता है । जहां विश्वभर में पांच वर्ष से कम
आयु के बच्चों में से करीब आधे बच्चों को भोजन में आवश्यक विटामिन
और खनिज नहीं मिल पा रहे हैं, वहीं लगभग दो अरब लोग हानिकारक
खाद्य पदार्थों का जरूरत से ज्यादा सेवन कर रहे हैं, जिसके चलते
मोटापे, हृदय संबंधी और मधुमेह की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
जहां तक भारत का सवाल है, यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक
यहां हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। जबकि देश में हर साल
एक लाख करोड़ रुपए का अनाज बर्बाद हो जाता है, यानी चालीस
फीसद भोजन वार्षिक उत्पादन में बेकार हो जाता है। जाहिर है, पोषण
का यह असंतुलन खानपान की स्थितियों से जुड़ा है, लेकिन दरअसल
यह असंतुलित विकास नीतियों का नतीजा है। यह ध्यान रखने की
जरूरत है कि पूरी दुनिया को अगले दशक के आखिर तक भुखमरी से
मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया गया है और संयुक्त राष्ट्र के इस लक्ष्य
से भारत भी जुड़ा हुआ है। विकास के बरक्स व्यापक कुपोषण के
विरोधाभास की यह हकीकत इक्कीसवीं सदी के उस दौर में भी कायम
है, जब कई देश अपने सीमा-क्षेत्र में आम लोगों की जरूरतों और यहां
तक कि बुनियादी समस्याओं से दो-चार होने के समांतर दुनिया में खुद
को विकसित और ताकतवर देशों के साथ होड़ में होने का दावा कर
रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि विकास के पैमानों में वे सवाल हाशिये
पर छोड़ दिए जा रहे हैं, जिनके नतीजों में एक बड़ी आबादी अपने बच्चों
का पेट तक ठीक से नहीं भर पा रही है।
Hindustan 100wpm 539 words
दलीलें खत्म, अब उम्मीद बांधने का समय है। डेढ़ सदी से भी ज्यादा पुराने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर अंतिम अदालती फैसले तक पहुंचने का समय अब शायद ज्यादा दूर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने मामले की सुनवाई पूरी कर ली है और इसके साथ ही यह उम्मीद भी बंध गई है कि एक महीने के भीतर ही अदालत का फैसला हमारे सामने होगा। इस उम्मीद का सबसे बड़ा कारण यह है कि एक महीने बाद ही इस संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई रिटायर हो जाएंगे। माना यही जा रहा है कि वह अपनी इस पारी का समापन देश के न्यायिक इतिहास के सबसे बडे़ मुकदमे के साथ करेंगे। फैसला क्या होगा, यह इंतजार तो सभी को है, क्योंकि मामला अपने आप में काफी उलझा हुआ है। एक तरह से देखें, तो यह सिर्फ एक जमीन की मिल्कियत का विवाद है। वक्फ बोर्ड की जमीन है, जहां कभी बाबरी मस्जिद की इमारत खड़ी थी। इस ढांचे को राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कारसेवकों ने गिरा दिया था। वहीं एक अस्थाई टेंट में रामलला की मूर्ति है, जो इस मामले में एक पार्टी भी है। फिर यह मामला एक समुदाय की आस्था से जुड़ा है, तो दूसरे की आशंकाओं से। इसके साथ ही अदालत के सामने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला है, जिसे प्रबंधन की भाषा में आउट ऑफ बॉक्स कहा जा सकता है। इसमें उच्च न्यायालय ने विवादित जमीन का विभाजन करके सभी पक्षों के लिए प्रावधान किया था। हालांकि इस फैसले से कोई भी पक्ष खुश नहीं हुआ, लेकिन कोई पूरी तरह नाराज भी नहीं हुआ था।लेकिन कानूनी पेचीदगियों से ज्यादा जटिल इस मामले की संवेदनशीलता है। कोई भी फैसला देश की आबादी के एक बडे़ हिस्से के मनोविज्ञान पर असर डाल सकता है। अच्छी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुरू से इस जोखिम को समझा और फूंक-फूंककर कदम रखा। इस मामले में संबंधित पक्षों के बीच समझौता कराने की न जाने कितनी कोशिशें हो चुकी हैं, लेकिन वे नाकाम ही रहीं। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत यह मानकर की कि एक और कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है। इसके लिए मध्यस्थ पैनल भी नियुक्त किया, मध्यस्थ पैनल जब किसी नतीजे पर पहुंचने में नाकाम रहा, तभी अदालत ने हर रोज की सुनवाई शुरू की। लगातार 39 कार्यदिवसों तक चली मैराथन सुनवाई के बाद बुधवार को आखिरी दिन अदालत में जो नाटकीयता दिखी, वह दरअसल दबाव के चरम पर पहुंच जाने का संकेत भी थी।
किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उम्मीद यही की जाती है कि सभी पक्ष फैसले को सिर-माथे पर लेंगे। यही संभवत: इस मामले में भी होगा। लेकिन चुनौती इससे आगे कहीं है। यह मामला जन-समुदायों की मानसिकता से जुड़ गया है और इसीलिए संवदेनशील भी है। संबंधित पक्षों व उनसे जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के लिए सिर्फ फैसले को सिर-माथे लेना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी यह है कि जीत का ऐसा जश्न न हो, जो किसी को चिढ़ाता हुआ लगे और हार का ऐसा मातम न हो कि किसी तनाव का कारण बन जाए। एक महीने के भीतर ही जब अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा, तो यह हमारे राजनीतिक नेतृत्व व सामाजिक सद्भाव के लिए परीक्षा का क्षण भी होगा।539
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