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वर्तमान युग विज्ञान का युग है और प्राचीन युग अध्यात्मवादी था । स्थिति यह है कि मनुष्य न तो अध्यात्म को ही पचा रहा है और न पूरी तरह विज्ञान को ही अपना पा रहा है कारण विज्ञान भौतिक सुविधाएँ तो देता है परंतु शांति नहीं दे पा रहा है । जहाँ तक अध्यात्म का प्रश्न है उससे शांति तो मिलती है पर जीवन समय से पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों में सामंजस्य हो जो हो नहीं पा रहा है । यही कारण है कि मनुष्य और उससे निर्मित समाज उस मध्य पौराणिक चरित्र त्रिशंक की हालत में हो गया है जो न तो स्वर्ग ही पा सका था और न धरती पर ही लौट सका था ।
व्यक्ति और समाज परस्पर संबंधित है । व्यक्ति के बिना समाज का और समाज के बिना व्यक्ति का न तो कोई मूल्य है और न कोई अर्थ ही है । व्यक्तिरहित समाज एक शून्य की तरह होता है जहाँ मौत के सन्नाटे के अलावा और कुछ भी नहीं है । यही स्थिति व्यक्ति की है यदि वह समाज से कट जाता है तो वह समाज-कंटक और आत्महंता बन जाता है। स्पष्ट शब्दों में व्यक्ति को समाज की और समाज को व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों ही एक दूसरे के बिना व्यर्थ, निस्सार और अर्थहीन होकर समाजघाती व आत्महंता स्थितियों को विकसित करते हैं ।
मनुष्य केवल भूख और काम-वासना की पूर्ति मात्र से ही संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है । यदि कोई उसे यह चारा डालता है तो उसकी पूर्ण संतुष्टि नहीं हो पाती है । यों भी और भोग से ही संतुष्ट होना पशु धर्म है, मानव धर्म नहीं । मनुष्य और पशु में पर्याप्त अंतर
हे। मनुष्य इन उपर्युक्त वासनाओं से ऊपर उठकर विवेक से भी काम लेना चाहता है । अत: उसे भूख
और भोग की अपेक्षा ज्ञानार्जन की भी आवश्यकता होती है ।
करुणा अपना बीज अपने आलंबन या पात्रों में नहीं फेंकती है अर्थात जिस पर करुणा की जाती है वह बदले में करुणा नहीं करता - जैसा कि क्रोध और प्रेम में होता है बल्कि कृतज्ञ होता है अथवा श्रद्धा या प्रीत करता है । बहुत-सी औपन्यासिक कथाओं में यह बात दिखाई गई है कि युवतियाँ दुष्टों के हाथ से अपना उद्धार करने वाले युवकों के प्रेम में फँस गई है । कोमल भावों की योजना में बंगला के सामाजिक उपन्यास लेखक करुणा और प्रीति के मेल से बड़े ही प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करते हैं । 400words
100 wpm 500words
वर्तमान युग विज्ञान का युग है और प्राचीन युग अध्यात्मवादी था । स्थिति यह है कि मनुष्य न तो अध्यात्म को ही पचा रहा है और न पूरी तरह विज्ञान को ही अपना पा रहा है कारण विज्ञान भौतिक सुविधाएँ तो देता है परंतु शांति नहीं दे पा रहा है । जहाँ तक अध्यात्म का प्रश्न है उससे शांति तो मिलती है पर जीवन समय से पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों में सामंजस्य हो जो हो नहीं पा रहा है । यही कारण है कि मनुष्य और उससे निर्मित समाज उस मध्य पौराणिक चरित्र त्रिशंक की हालत में हो गया है जो न तो स्वर्ग ही पा सका था और न धरती पर ही लौट सका था ।
व्यक्ति और समाज परस्पर संबंधित है । व्यक्ति के बिना समाज का और समाज के बिना व्यक्ति का न तो कोई मूल्य है और न कोई अर्थ ही है । व्यक्तिरहित समाज एक शून्य की तरह होता है जहाँ मौत के सन्नाटे के अलावा और कुछ भी नहीं है । यही स्थिति व्यक्ति की है यदि वह समाज से कट जाता है तो वह समाज-कंटक और आत्महंता बन जाता है। स्पष्ट शब्दों में व्यक्ति को समाज की और समाज को व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों ही एक दूसरे के बिना व्यर्थ, निस्सार और अर्थहीन होकर समाजघाती व आत्महंता स्थितियों को विकसित करते हैं ।
मनुष्य केवल भूख और काम-वासना की पूर्ति मात्र से ही संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है । यदि कोई उसे यह चारा डालता है तो उसकी पूर्ण संतुष्टि नहीं हो पाती है । यों भी और भोग से ही संतुष्ट होना पशु धर्म है, मानव धर्म नहीं । मनुष्य और पशु में पर्याप्त अंतर
हे। मनुष्य इन उपर्युक्त वासनाओं से ऊपर उठकर विवेक से भी काम लेना चाहता है । अत: उसे भूख
और भोग की अपेक्षा ज्ञानार्जन की भी आवश्यकता होती है ।
करुणा अपना बीज अपने आलंबन या पात्रों में नहीं फेंकती है अर्थात जिस पर करुणा की जाती है वह बदले में करुणा नहीं करता - जैसा कि क्रोध और प्रेम में होता है बल्कि कृतज्ञ होता है अथवा श्रद्धा या प्रीत करता है । बहुत-सी औपन्यासिक कथाओं में यह बात दिखाई गई है कि युवतियाँ दुष्टों के हाथ से अपना उद्धार करने वाले युवकों के प्रेम में फँस गई है । कोमल भावों की योजना में बंगला के सामाजिक उपन्यास लेखक करुणा और प्रीति के मेल से बड़े ही प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करते हैं
करुणा अपना बदला नहीं चाहती । करुणा से करुणा उत्पन्न होती नहीं है अपितु कृतज्ञता उत्पन्न होती है । क्रोध एवं प्रेम में बदले की भावना होती है । करुणा इससे भिन्न है । जैसे युवतियाँ अपना उद्धार करने वाले युवंकों की ओर उत्कृष्ट हो जाती है । प्रीति और करुणा का बंगला उपन्यास एक अच्छा उदाहरण है ।
सभापति महोदय, मैं आपको बता सकता हूँ अपने
अनुभव से कि भारत जब स्वतंत्र हुआ तो यहाँ बहुत दंगे
हुए। लोगों को बड़ी परेशानी हुई और उनको इधर से उधर जाना पड़ा तो 500w0rdsकुछ लोग कहने लगे कि इस स्वतंत्रता से हमें क्या मिला, इस जनतंत्र से हमें क्या मिला, इस लोकतंत्र से हमें क्या मिला ।
120wpm 600words 5 min
वर्तमान युग विज्ञान का युग है और प्राचीन युग अध्यात्मवादी था । स्थिति यह है कि मनुष्य न तो अध्यात्म को ही पचा रहा है और न पूरी तरह विज्ञान को ही अपना पा रहा है कारण विज्ञान भौतिक सुविधाएँ तो देता है परंतु शांति नहीं दे पा रहा है । जहाँ तक अध्यात्म का प्रश्न है उससे शांति तो मिलती है पर जीवन समय से पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि दोनों में सामंजस्य हो जो हो नहीं पा रहा है । यही कारण है कि मनुष्य और उससे निर्मित समाज उस मध्य पौराणिक चरित्र त्रिशंक की हालत में हो गया है जो न तो स्वर्ग ही पा सका था और न 1धरती पर ही लौट सका था ।
व्यक्ति और समाज परस्पर संबंधित है । व्यक्ति के बिना समाज का और समाज के बिना व्यक्ति का न तो कोई मूल्य है और न कोई अर्थ ही है । व्यक्तिरहित समाज एक शून्य की तरह होता है जहाँ मौत के सन्नाटे के अलावा और कुछ भी नहीं है । यही स्थिति व्यक्ति की है यदि वह समाज से कट जाता है तो वह समाज-कंटक और आत्महंता बन जाता है। स्पष्ट शब्दों में व्यक्ति को समाज की और समाज को व्यक्ति की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों ही एक दूसरे के बिना व्यर्थ, निस्सार और अर्थहीन होकर समाजघाती व आत्महंता स्थितियों को विकसित करते हैं ।
मनुष्य केवल भूख और काम-वासना की2 पूर्ति मात्र से ही संतुष्ट होने वाला जीव नहीं है । यदि कोई उसे यह चारा डालता है तो उसकी पूर्ण संतुष्टि नहीं हो पाती है । यों भी और भोग से ही संतुष्ट होना पशु धर्म है, मानव धर्म नहीं । मनुष्य और पशु में पर्याप्त अंतर
हे। मनुष्य इन उपर्युक्त वासनाओं से ऊपर उठकर विवेक से भी काम लेना चाहता है । अत: उसे भूख
और भोग की अपेक्षा ज्ञानार्जन की भी आवश्यकता होती है ।
करुणा अपना बीज अपने आलंबन या पात्रों में नहीं फेंकती है अर्थात जिस पर करुणा की जाती है वह बदले में करुणा नहीं करता - जैसा कि क्रोध और प्रेम में होता है बल्कि कृतज्ञ होता है अथवा श्रद्धा या प्रीत करता है । 3बहुत-सी औपन्यासिक कथाओं में यह बात दिखाई गई है कि युवतियाँ दुष्टों के हाथ से अपना उद्धार करने वाले युवकों के प्रेम में फँस गई है । कोमल भावों की योजना में बंगला के सामाजिक उपन्यास लेखक करुणा और प्रीति के मेल से बड़े ही प्रभावोत्पादक दृश्य उपस्थित करते हैं
करुणा अपना बदला नहीं चाहती । करुणा से करुणा उत्पन्न होती नहीं है अपितु कृतज्ञता उत्पन्न होती है । क्रोध एवं प्रेम में बदले की भावना होती है । करुणा इससे भिन्न है । जैसे युवतियाँ अपना उद्धार करने वाले युवंकों की ओर उत्कृष्ट हो जाती है । प्रीति और करुणा का बंगला उपन्यास एक अच्छा उदाहरण है ।
सभापति महोदय, मैं आपको बता सकता हूँ अपने
अनुभव से कि4 भारत जब स्वतंत्र हुआ तो यहाँ बहुत दंगे
हुए। लोगों को बड़ी परेशानी हुई और उनको इधर से उधर जाना पड़ा तो कुछ लोग कहने लगे कि इस स्वतंत्रता से हमें क्या मिला, इस जनतंत्र से हमें क्या मिला, इस लोकतंत्र से हमें क्या मिला । जब इतनी बर्बादी हुई हम अंग्रेजी सरकार से किस तरह से बेहतर है ? तो उस जमाने में लोगो के सामने जो परेशानी आई थी, जो उनका सामना नहीं कर सकते थे उन्हें अंग्रेज सरकार अच्छी लगती थी, क्योंकि अंग्रेजी सरकार में उनको शांति थी और हमारी जब सरकार आई तो अशांति हो गई। कुछ लोग स्वतंत्रता की कोई भी
कीमत देने के लिए तैयार नहीं है । वे चाहते हैं कि
নি:शुल्क ही मिले । हम जानते हैं कि और देशों में
स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए बहुत संख्या में मारकाट हुई ।618words
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