Editorial dictation 29 oct

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Editorial dictation
29 0ct 2019



Hindustan 402 words 80wpm 

उसका खौफ तो अभी भी था, लेकिन इस्लामिक स्टेट का कथित खलीफा अल-बगदादी पिछले कई महीनों से एक हारती हुई ताकत की तरह था। इराक और सीरिया के वे सारे इलाके उससे मुक्त कराए जा चुके थे, जिन पर कभी उसका नृशंस राज चलता था। ऐसी खबरें लगातार आ रही थीं कि वह भागता फिर रहा है। रविवार को जब हम अपने देश में दीपावली मनाने की तैयारियां कर रहे थे, अमेरिकी फौज ने बगदादी को उसकी उसी मांद में मार गिराया, जहां वह पिछले काफी समय से छिपा हुआ था। इस्लामिक स्टेट के इस सरगना का मारा जाना पूरी दुनिया के लिए राहत की एक बड़ी खबर है। यहां तक कि पश्चिम एशिया के उन देशों के लिए भी, जिनका राजकाज अभी भी इस्लामिक रीति-नीति से चलता है। बगदादी ने जो पागलपन पैदा किया था, उसका पहला खतरा भी इन्हीं देशों को था। लेकिन इस्लामिक स्टेट का खतरा सिर्फ इसी तक सीमित नहीं था। वह तरह-तरह से पूरी दुनिया को घेर रहा था। एक छोटे से दौर में इसने तकरीबन पूरी दुनिया के नौजवानों को गुमराह करने की कोशिश की। यहां तक कि यूरोप और अमेरिका के आधुनिक समाज के बहुत सारे नौजवान खिलाफत कायम करने का सपना लेकर इराक पहुंचने लग गए थे। चंद भारतीय नौजवान भी इस जाल में फंसे। और राहत इसलिए भी कि इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट का आधार भले ही खत्म होने लगा था, लेकिन उसका काला झंडा दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की कई ताकतों के हाथों में दिखने लगा था। और तो और, हमारे पड़ोसी पाकिस्तान और अफगानिस्तान तक में। हम यह भी कह सकते हैं कि बगदादी की मौत से उन लोगों को भी न्याय मिला है, जिनका उसकी फौज ने बड़ी निर्ममता से कत्लेआम किया था। उन औरतों को भी न्याय मिला, जिनसे इसके गुर्गों ने न सिर्फ बलात्कार किया, बल्कि उसे जायज भी ठहराया। और उन पत्रकारों को भी, जो रिर्पोटिंग के लिए गए थे और उनके सिर कलम कर दिए गए।

इसके आगे असल सवाल फिलहाल यह है कि क्या इसके बाद दुनिया उस आतंक से मुक्त होने की ओर बढे़गी, जो इस समय हम सबकी पहली जरूरत भी है और पहली मुराद भी? कुछ साल पहले जब अमेरिका ने पाकिस्तान में अल-कायदा के सर्वेसर्वा ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था, तब भी यही उम्मीद बांधी गई थी। मगर ऐसा हुआ नहीं। महत्वपूर्ण यह भी है कि अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट लगभग एक जैसे हालात की उपज थे। 402words
Danik jagran 430 90wpm
दुनिया के सबसे खूंखार और वहशी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के
सरगना अबू बकर अल बगदादी को सीरिया में मार गिराया जाना एक
बड़ी कामयाबी है। चूंकि इस घिनौने आतंकी सरगना को मार गिराने की
घोषणा खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने की इसलिए इसके प्रति सुनिश्चित हुआ
जा सकता है कि इस बार उसके मारे जाने की सूचना सही है। यह कुछ
वैसी ही कामयाबी है जैसी अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को
खत्म करके हासिल की गई थी। हालांकि इन दोनों आतंकियों को मार
गिराने में तब सफलता मिली जब उनके संगठनों की कमर तोड़ी जा चुकी
थी, लेकिन इसके बाद भी उनका खात्मा आवश्यक था। चूंकि इन दोनों
आतंकियों ने अमेरिका को सीधी चुनौती दी इसलिए उसने उन्हें घेर कर
माण। कहना कठिन है कि बगदादी के खात्मे से अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को
घरेलू स्तर पर वैसी राजनीतिक सफलता मिलेगी या नहीं जैसी ओबामा को
लादेन के अंत से मिली थी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती
कि जेहादी आतंकवाद अभी भी दुनिवा के तमाम हिस्सों में अपना सिर
उठाए है और फिर भी अमेरिका उससे लड़ने के प्रति प्रतिबद्ध नहीं दिखता।
पश्चिम एशिया, अफ्रीका के साथ एशिया के अनेक हिस्सों में किस्म-
किस्म के आतंकी संगठन अभी भी रक्त-पात करने में लगे हुए हैं। चिंता
की बात यह है कि इनमें से कुछ न केक्ल भारत के पड़ोस में सक्रिय हैं,
बल्कि उन्हें पाकिस्तान की ओर से हर तरह का संरक्षण भी मिल रहा है।
इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है जैश और लश्कर सरीखे पाकिस्तान
आधारित जो आतंकी संगठन भारत पर निगाह लगाए हुए हैं उनके रिश्ते
अफगानिस्तान में खून बरह्म रहे तालिबान से हैं। यह कोई शुभ संकेत नहीं
कि अभी ह्ाल तक अमेरिका तालिबान से समझौता करने को लालावित
था। अमेरिका और तालिबान के बीच फिर से बातचीत शुरू होने के आसार
अभी भी हैं। अमेरिका के रवैये ने तालिबान को तो बेलगाम किया ही है,
उसके संरक्षक पाकिस्तान को भी बल प्रदान किया है। इससे बड़ी बिडंबना
और कोई नहीं सकती कि अफगानिस्तान में करीब-करीब हर दिन आतंकी
धमाके कर रहे तालिबान के सरगना बीते दिनों पाकिस्तान के मेहमान बने।
भारत आतंकियों की इस मेहमाननवाजी की अनदेखी नहीं कर सकता
और उसे करना भी नहीं चाहिए, क्योंकि कश्मीर में जेहादी आतंक का
दमन अभी भी शेष है। भारत और साथ ही दुनिया के अन्य देश इसकी भी
अनदेखी नहीं कर सकते कि जेहादी आतंकवाद जिस विचारधारा की उपज
है वह पहले की तरह फल-फूल रही है। बगदादी का खात्मा राहतकारी तो
है, लेकिन यह ध्यान रखा जाए तो बेहतर कि आतंक की विष बेल को जड़
से उखाड़ा जाना शेष है।430words

Jansatta 100wpm

अपने उद्भव के बाद कुछ ही समय में समूची दुनिया में खौफ
और बर्बरता का पर्याय बन चुके संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ
इराक एंड सीरिया यानी आइएसआइएस के सरगना अबू-बकर
अल-बगदादी के मारे जाने की खबर को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में
एक बड़ी घटना के रूप में दर्ज किया जाएगा। यों इससे पहले भी
कई बार उसके मारे जाने की खबरें आई, लेकिन कुछ समय बाद
वे निराधार साबित हुईं। लेकिन अमेरिकी सुरक्षा बल 'डेल्टा
कमांडोज' के एक गोपनीय अभियान के बाद जिस तरह के तथ्य
सामने आए हैं, उनसे यही लगता है कि इस बार दुनिया को बगदादी
और उसके आतंक से मुक्ति मिली है। खबरों के मुताबिक सीरिया के
इदलीब प्रांत के सुदूर गांव बारिशा में एक गुप्त ठिकाने का पता लगाने
के बाद अमेरिकी सैनिकों ने अचानक हमला किया और बगदादी को
घेर लिया। कोई विकल्प नहीं देख कर बगदादी ने कमर में बंधे
विस्फोटक से खुद को उड़ा लिया। इस मसले पर खुद अमेरिकी
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह की घोषणा की, उससे यही लगता
है कि इस बार बगदादी के खात्मे की खबर आखिरी है । इसके
बावजूद यह मानना शायद जल्दबाजी होगा कि अल- बगदादी के
खात्मे के साथ ही आइएस का समूचा तंत्र ही खत्म हो गया है ।
गौरतलब है कि बगदादी के मारे जाने की खबरों के बाद यह
जानकारी भी सामने आई कि आइएस ने अब अब्दुल्लाह कार्दश को
अपना सरगना चुन लिया। सवाल है कि इसकी क्या गारंटी है कि
अब्दुल्लाह कार्दश आने वाले वक्त में बगदादी जैसा ही आतंक नहीं
पैदा करेगा! दरअसल, कार्दश ने काफी पहले से आइएस के कई
मामलों को संभालना शुरू कर दिया था और सभी आतंकी हमलों को
अंजाम देने में कार्दश की मुख्य भूमिका होती थी। यह छिपी बात नहीं
है कि सीरिया और आसपास के देशों तक फैल चुकी लड़ाई में आइएस
के खिलाफ अमेरिका, रूस, तुर्की सहित कई देशों के अलग-अलग या
फिर संयुक्त अभियान के बावजूद पिछले कई सालों से इस संगठन ने
अपनी मौजूदगी बनाए रखी है। आइएस ने दुनिया का ध्यान पहली बार
तब खींचा था, जब उसने इराकी शहर मोसुल पर कब्जा कर लिया था
और यहां तक कि सद्दाम हुसैन के गृह जनपद तिकरित को भी अपने
झंडे के नीचे ले लिया था। माना जाता है कि कई देशों की सेना ओं के
सामने टिके रहने के पीछे अल-बगदादी की नेतृत्व क्षमता थी।
रूढ़िवादी और हिंसक इस्लामी आंदोलन में विश्वास रखने वाले
बगदादी ने अपने कब्जे वाले इलाके में शरीयत के मुताबिक शासन
चलाने की घोषणा कर दी थी । इसलिए उसके मारे जाने की खबर
निश्चित रूप से आइएस के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।
यह एक जटिल स्थिति है कि आइएस न केवल मैदानी जंग लड़ने
वाला आतंकी संगठन है, बल्कि उसने अपने विचारों के प्रसार और
दूसरे देशों के भोले-भाले युवाओं को अपनी चपेट में लेने की भी
कोशिश की। यहां तक कि भारत में भी आइएस के एजेंटों ने युवाओं
को आकर्षित करने का जाल रचा, लेकिन यहां के सामाजिक-
राजनीतिक माहौल की वजह से वह नाकाम रहा। 500words 

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