Editorial dictation 31 oct
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Editorial dictation
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यह समय ही बताएगा कि कश्मीर पहुंचे यूरोपीय संघ के सांसदों का
नजरिया भारत के इस हिस्से के बारे में विश्व समुदाय के रुख-रवैये को
प्रभावित करने में कितना सह्यक होगा, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि यह
घाटी के हालात पर भी निर्भर करेगा। यूरोपीय देशों के सांसदों के श्रीनगर
पहुंचते ही आतंकियों ने जिस तरह पश्चिम बंगाल के मजदूरों को निशाना
बनाया उससे यह स्पष्ट है कि कश्मीर के हालात ठीक करने में अभी समय
लगेगा। निःसंदेह इसमें सफलता तब मिलेगी जब आतंकियों को छिपने-
भागने के लिए विवश किया जाएगा। वदि आम कश्मीरी जनता कश्मीर को
बदनाम करने और वहां दहशत फैलाने में जुटे आतंकियों के खिलाफ मुखर
हो सके तो माहौल कहीं आसानी से बदला जा सकता है। ह्यलांकि कश्मीर
में पहले भी बाहरी लोगों को निशाना बनाया जाता रहा है, लेकिन बीते कुछ
दिनों में घाटी के बाहर के लोगों को जिस तरह चुन-चुनकर मारा गया उससे
न केवल यह स्पष्ट है कि पाकिस्तानपरस्त आतंकी गैर कश्मीरियों में खौफ
पैदा करने पर आमादा हैं, बल्कि यह भी कि उनकी तथाकथित लड़ाई का
राजनीतिक अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं। सच तो यही है कि कश्मीर
में अधिकारों के नाम पर आतंक का कारोबार जारी है और इसीलिए उन
निर्दोष-निहत्थे लोगों को भी मारा जा रहा जो कश्मीर की भलाई के लिए
वहां मेहनत-मजदूरी कर रहे हैं।
यूरोपीय देशों के सांसदों के साथ विश्व समुदाय इसकी अनदेखी नहीं
कर सकता कि कश्मीर गए ट्रक ड्राइवरों और वहां प्रवास कर रहे मजदूरों
पर किए गए आतंकी हमलों में एक दर्जन लोगों को जान गंवानी पड़ी है।
चूंकि ये आतंकी हमले पाकिस्तान के इशारे पर ही हो रहे हैं इसलिए इससे
एक सीमा तक ही संतुष्ट हुआ जा सकता है कि यूरोपीय देशों के सांसदों ने
कश्मीर में आतंक के लिए पाकिस्तान पर निशाना साधा और आतंकवाद
के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देने की हामी भरी आखिर पाकिस्तान
को जवाबदेह कब बनाया जाएगा? इससे भी जरूरी सवाल यह है कि
उसे आतंकवाद को खाद-पानी देने के लिए दंडित कब किया जाएगा?
इन सवालों के बीच वह अच्छा नहीं हुआ कि यूरोपीय देशों के सांसदों
के कश्मीर दौरे को लेकर विवाद खड़ा कर दिया गया। इससे बचा जाना
चाहिए था। इन सांसदों के कश्मीर दौरे को लेकर उदाए गए विपक्ष के सभी
सवालीं को निराधार नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस मांग में वजन है कि
आखिर इन सांसदों को कश्मीर आमंत्रित करने के पहले विपक्षी नेताओं
को वहां क्यों नहीं भेजा गया? 404words
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भात ने सऊदी अरब की कंपनियों को ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने
और नए उद्योगों (स्टार्टअप) में पूंजी लगाने का जो न्योता दिया
है, वह निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक और
कूटनीतिक रिश्तों का संकेत है। अगर इस तरह की पहल कामयाब होती
है और सऊदी अरब की कंपनियां भारत में निवेश करती हैं तो भारत के
ऊर्जा क्षेत्र का विकास होगा और अर्थव्यवस्था भी जोर पकड़ेगी । इन
दिनों सऊदी अरब की राजधानी रियाद में चल रहे निवेशक सम्मेलन में
दुनियाभर के निवेशक पहुंचे हैं। भारत में पिछले कई महीनों से
अर्थव्यवस्था में मंदी का जो माहौल बना हुआ है, उसका एक बड़ा
कारण निवेश नहीं आना भी रहा है । ऐसे में बाहर से निवेश का आना
अर्थव्यवस्था की बड़ी जरूरत भी है। सऊदी अरब ने भारत में सौ अरब
डॉलर के निवेश के संकेत भी दिए हैं। इसके अलावा भारतीय कंपनियां
भी सऊदी अरब की कई बड़ी परियोजनाओं में अपनी भागीदारी बढ़ा
रही हैं। दोनों देशों के बीच सालाना कारोबार साढ़े सत्ताईस अरब डॉलर
से ज्यादा पहुंच गया है। इस लिहाज से भी भारत के लिए सऊदी अरब
एक बड़े व्यापारिक साझीदार के रूप में सामने आया है ।
अब तक माना जाता था कि सऊदी अरब के संबंध भारत के मुकाबले
पाकिस्तान के साथ ज्यादा मजबूत हैं और वक्त पड़ने पर वह पाकिस्तान
का साथ देता रहा है। इस्लामिक देशों के संगठन ओआइसी में भी सऊदी
अरब का दबदबा है। लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात बदले हैं और
सऊदी अरब ने दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव का लोहा माना है । भारत
ने 2008 में 'लुक ईस्ट' की जो नीति शुरू की थी, उसका असर अब
साफ दिख रहा है । इसी का नतीजा है कि दोनों देशों के बीच कारोबारी
रिश्तों के साथ-साथ कूटनीतिक रिश्तों का भी दौर शुरू हुआ । मुसलिम
देशों के बीच भारत की पैठ बनाने में सऊदी अरब की बड़ी भूमिका रही।
सऊदी अरब इस बात को अच्छी तरह जानता- समझता है कि भारत लंबे
समय से आतंकवाद की मार झेल रहा है और इसमें उसके पड़ोसी देश
पाकिस्तान की क्या भूमिका है। इसलिए भारत और सऊदी अरब दोनों ने
ही समय-समय पर आतंकवाद के खिलाफ आवाज उठाई है और इस
समस्या से मिल कर लड़ने और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए समझौते
किए, जिनमें आतंक के खिलाफ सूचनाओं के आदान-प्रदान जैसे
समझौते भी शामिल हैं। बड़ी बात यह है कि कश्मीर के मुद्दे पर सऊदी
अरब ने कभी भी पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया है । ऐसे में सऊदी
अरब और भारत के बीच अगर कारोबारी रिश्तों को नया आयाम और
विस्तार मिलता है तो यह दोनों देशों के लिए स्वर्णिम मौका होगा।
अरब जगत में सऊदी अरब ऐसा देश है 445words
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खतरा सिर पर खड़ा है, इससे कभी इनकार नहीं था, लेकिन यह इतना बड़ा होगा, इसका अंदाज भी नहीं था। अभी तक हम यह मानकर चल रहे थे कि इस सदी के मध्य तक ग्लोबल वार्मिंग के कारण अगर समुद्र का जल-स्तर तेजी से बढे़गा, तो भारत भी उससे निष्प्रभावित नहीं रहेगा। यह माना जा रहा था कि इससे वे हिस्से पानी में डूब जाएंगे, जो समुद्र के किनारे हैं और जिनका भू-स्तर काफी नीचा है। लेकिन धारणा यही बन रही थी कि इससे भारत उतना प्रभावित नहीं होगा, जितना कि कुछ अन्य देश। एक मोटी धारणा यह थी कि समुद्र का बढ़ता जल-स्तर भारत के तटवर्ती इलाकों में रहने वाले लगभग 50 लाख लोगों को विस्थापित कर देगा। कुछ दूसरी तरह के खतरे जरूर दिख रहे थे। जैसे बांग्लादेश के एक बड़े हिस्से और पूरा का पूरा मालदीव के डूबने का खतरा है। इसलिए यह आशंकाथी कि इन देशों के प्रभावित लोग बतौर शरणार्थी भारत की ओर रुख कर सकते हैं। लेकिन अब जो नया आकलन आ रहा है, वह बताता है कि भारत पर सीधा पड़ने वाला खतरा इससे कहीं ज्यादा बड़ा है। नासा के शटल राडार टोपोग्राफी मिशन के जरिए हुए अध्ययन से ये नतीजे निकाले गए हैं कि साल 2050 तक समुद्र का जल स्तर इतना बढ़ जाएगा कि भारत के मुंबई, नवी मुंबई और कोलकाता जैसे महानगर भी सदा के लिए जलमग्न हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र और केरल ही नहीं, गुजरात के कई तटवर्ती इलाके भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। आशंका यह है कि इससे भारत के साढ़े तीन करोड़ लोगों को विस्थापित होना पड़ सकता है।
नए अध्ययन में पाया गया है कि पहले इस मामले में जो आकलन हुए थे, उनमें खतरे को कम आंका गया था। नया अध्ययन बता रहा है कि समुद्र का जल-स्तर बढ़ने से दुनिया की लगभग 30 करोड़ आबादी प्रभावित होगी। अकेले बांग्लादेश में नौ करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हो जाएंगे। जाहिर है, कई तरह से इसका दबाव भी भारत पर ही बन सकता है। समुद्र का जल स्तर किस तेजी से बढ़ रहा है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरी बीसवीं सदी में जल स्तर 11 से 16 सेंटीमीटर के बीच बढ़ा था। अनुमान है कि मौजूदा पूरी सदी में यह 50 सेंटीमीटर से भी ज्यादा बढ़ सकता है। अब यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि अगर कार्बन उत्सर्जन का बढ़ना जारी रहा, तो इस सदी के अंत तक जल स्तर दो मीटर तक ऊपर चढ़ सकता है। इसका अर्थ होगा, कहीं बडे़ हिस्से का डूब जाना।
इसका नुकसान सिर्फ तटवर्ती इलाकों में ही नहीं होने वाला, धरती के बाकी हिस्सों में भी इसका असर जल संकट और खासकर पेयजल संकट के रूप में दिखाई देगा। यह संकट अलग-अलग रूप में हमारे नगरों, महानगरों और गांवों तक पहुंचने लगा है। देश के तकरीबन सभी पुराने नगर, कस्बे और गांव प्राकृतिक जल संसाधनों, जैसे नदी, तालाब आदि के आस-पास ही बसे हैं। यह बताता है कि जल हमारी सभ्यता की कितनी बड़ी जरूरत है।
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