Editorial 22 oct

Hindustan 80wpm 5min
गुरुनानक देव से जुड़े करतारपुर गुरुद्वारा साहिब की यात्रा पर संकट के
बादलों का मंडराना जितना दुखद
यात्रा संबंधी छोटे-मोटे विवादों को सुलझाने की जरूरत थी, लेकिन
शनिवार को होने वाली बैठक के टल जाने से भी आशंकाओ को बल
मिला है। भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर बहुप्रतीक्षित
करतारपुर यात्रा पर जिस तरह से पड़ रहा है, उस पर समय रहते गौर करने
की जरूरत है। विगत महीनों से भारत और पाकिस्तान की सरकारें
करतारपुर यात्रा को व्यवस्थित स्वरूप देने में लगी हैं। अब जब यात्रा
की तैयारियां अंतिम चरण में हैं, तब जो लोग करतारपुर की राह में कार्ट
बिछा रहे हैं, वे न केवल धार्मिक सद्भाव, बल्कि अमन-चैन के भी
दुश्मन हैं। चिंता की बात यह है कि पाकिस्तान हर तीर्थयात्री से 20
अमेरिकी डॉलर अर्थात 1,400 रुपये की फीस चाहता है। पाकिस्तान
की नजर तीर्थयात्रा के जरिए डॉलर कमाने पर है। यह शुल्क थोपे जाने
के बाद यात्रियों का ऑनलाइन पंजीकरण शुरू नहीं हो सका है। शुल्क
की वजह से नाराजगी है, जिसका इजहार केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर
है,
उतना ही निंदनीय भी। समय रहते 
बादल ने भी कर दिया है, उन्होंने
पाकिस्तान द्वारा लगाए गए शुल्क
को नृशंस करार दिया है। जब सिख
समाज और संसार के तमाम
सद्भावी गुरुनानक जी का 550वां
प्रकाश पर्व मनाने जा रहे हैं, तब इसे
कमाई के मौके में घटाकर देखना
निहायत बचकाना मौकापरस्ती है।
करतारपुर साहिब की भारत-
पाकिस्तान सीमा पर डेरा बाबा
नानक से दूरी महज चार किलोमीटर
है, मात्र इतनी दूरी के लिए प्रति
श्रद्धालु 1,400 रुपये की फीस
अतार्किक है। इस ऐतिहासिक वर्ष में पाकिस्तान को सहृदयता का
परिचय देना चाहिए, लेकिन वह कूटनीतिक और आर्थिक फायदे से
ऊपर सोच नहीं पा रहा है।
भारत की ओर भी फोर लेन की सड़क तैयार है। भारत और पंजाब
सरकार ने अपनी सीमा के अंदर बड़े पैमाने पर तैयारियां कर रखी हैं,
जिनका उद्घाटन 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी करेंगे। पूर्व
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सामान्य यात्री की तरह करतारपुर साहिब
जाएंगे। भारत की ओर पूरा उत्साह है, भारत यह भी चाहता है कि विशेष
दिन पर पाकिस्तान 10 हजार तीर्थयात्रियों को जाने की मंजूरी दे।
पाकिस्तान इस पर खामोश है, लेकिन शुल्क लेने पर अड़ा हुआ है। वह
अपने व्यापक फायदे को नहीं देख पा रहा है, उसे भारतीय सिखों के
माध्यम से प्रतिदिन एक लाख डॉलर की कमाई दिख रही है। आर्थिक
तंगहाली में सद्भाव की गगरी भी खाली है।400words




Jansatta 90 wpm 5 min
टिल्लीवासियों के लिए फिलहाल परेशान करने वाली खबर यह है।
कि पराली के धुएं का राजधानी पर असर अब साफ नजर आने
लगा है । गुजरे शनिवार को ये दावा किया गया था कि दिल्ली की हवा
में
कुछ सुधार हुआ है। लेकिन रविवार को यह दावा हवा हो गया |
चौंकाने वाली बात यह है कि इसके अगले दिन यानी सोमवार के लिए
इसमें चार फीसद की बढ़ोतरी की बात कही गई। एक दिन में अगर
पराली का धुआं इतना ज्यादा बढ़ जाए, तो जाहिर है कि पंजाब, हरियाणा
और उत्तर प्रदेश तीनों ही राज्यों में किसान बेखौफ पराली जला रहे हैं ।
ऐसा इसलिए है कि इन राज्यों की सरकारों ने किसानों की इस समस्या
का कोई समाधान नहीं निकाला है, इसलिए किसान भी मजबूर हैं । ऐसे
में घूम-फिर कर यही सवाल बार-बार आ रहा है कि आखिर इस
समस्या का हल है क्या ! अब तक जो हालात है उनसे यह तो साफ हो
चुका है कि यह काम शायद राज्य सरकारों के बूते का नहीं है।
ऐसा नहीं है कि इस समस्या का समाधान नहीं निकल सकता।
इसके लिए इच्छाशक्ति की जरूरत है। ऐसी इच्छाशक्ति देश के प्रमुख
उद्योग संगठन भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ ) ने दिखाई है।
पराली की समस्या से निपटने के लिए सी आइ आइ ने हरियाणा और
पंजाब के एक सौ गांवों को गोद लिया है। सीआइआइ का यह कदम
स्वागतयोग्य इसलिए है कि सालों से चली आ रही इस समस्या से
निपटने के लिए कोई उद्योग संगठन आगे आया है। हालांकि यह
कवायद पिछले साल ही शुरू कर दी गई थी और पंजाब के उन्नीस
गांवों में इस दिशा में काम शुरू कर दिया गया था । उत्साहजनक नतीजे
मिलने से उम्मीदें और बढ़ीं और इस बार सीआइआइ ने सौ गांवों में
अपने अभियान की शुरुआत की। इस प्रयास के तहत सीआइआइ इन
गांवों के किसानों को सस्ती दरों पर पराली काटने की मशीनें मुहैया
करा रहा है। जो किसान मशीन खरीद पाने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें
मामूली किराए पर ये मशीनें दी जा रही हैं । कायदे से ये काम राज्य
सरकारों को करना चाहिए, लेकिन अब उद्योग जगत की भागीदारी से
यह हो रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस कवायद को सीआइआइ
ने एक व्यापक अभियान का रूप दे डाला है, जिसमें सामाजिक
कार्यकर्ताओं, शोध छात्रों, स्कूली बच्चों तक को शामिल किया गया है
जो पराली जलाने से होने वाले नुकसान और वायु प्रदूषण के खतरों के
बारे में किसानों को आगाह कर रहे हैं।
पराली की समस्या से निपटने का दूसरा बड़ा प्रयास यह है कि इसे
अब जलाने के बजाय इससे बायोगैस तैयार करने का रास्ता निकाल
लिया गया है । इसके लिए हरियाणा के करनाल जिले में संयंत्र लगाने
का काम शुरू हो चुका है ।451 words 

Danik jagran 100wpm 4 min
यह स्वागतयोग्य है कि दिल्ली को प्रदूषण से बचाने के लिए भारतीय
उद्योग परिसंघ भी आगे आ गया। वह पंजाब और हरियाणा की सरकारों
से मिलकर इसकी कोशिश करेगा कि यहां के किसान पराली न जलाएं।
केंद्र सरकार पहले से ही इस कोशिश में है कि दिल्ली के पड़ोसी राज्यों
में पराली न जले । दिल्ली को प्रदूषण से बचाने की कोशिश राष्ट्रीय हरित
न्यायाधिकरण अर्थात एनजीटी के साथ सुप्रीम कोर्ट भी कर रहा है। इन
सबके अलावा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी है और पर्यावरण प्रदूषण
नियंत्रण प्राधिकरण भी। इन सबके प्रयासों ने असर दिखाया है और
दिल्ली एवं आसपास के इलाके को प्रदूषण से पूरी तरह न सही, एक बड़ी
हद तक राहत मिली है। इसकी एक वजह आम जनता की जागरूकता
भी है और यह पहलू भी कि नीति-नियंताओं का एक बड़ा वर्ग दिल्ली में
रहता है। दिल्ली में प्रदूषण की रोकथाम के मामले में केंद्र और दिल्ली
सरकार के साथ तमाम सरकारी एजेंसियों की सक्रियता से बेहतर नतीजे
मिलने की उम्मीद आगे भी की जाती है, लेकिन क्या दिल्ली ही देश है?
यह सवाल इसलिए, क्योंकि मौसम में नमी बढ़ने और तापमान घटने के
साथ ही उत्तर भारत के अन्य शहर भी प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक आंकड़े के अनुसार रविवार को
प्रदूषित हवा के मामले में लखनऊ की स्थिति दिल्ली से भी खराब रही।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के भी कई
शहरों में हवा की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज होनी शुरू हो गई है। आने वाले
दिनों में उत्तर भारत में प्रदूषण का दायरा और बढ़ने का अंदेशा है। इस
अंदेशे का एक बड़ा कारण यह है कि पिछले साल विश्व स्वास्थ्य संगठन
की ओर से जारी देश के चुनिंदा प्रदूषित शहरों की सूची में कानपुर,
आगरा, बाराणसी से लेकर गया, पटना और मुजफ्फरपुर भी शामिल थे।
अब अगर सर्दियों में उत्तर भारत के उन शहरों की हवा की गुणवत्ता भी
खराब हो जा रही है जो औद्योगिक शहरों में गिनती नहीं रखते तो इसका
मतलब है कि प्रदूषण की समस्या कहीं अधिक गंभीर हो चुकी है और
वह केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं है। विडंबना यह है कि दिल्ली के
प्रदूषण को लेकर जैसी चिंता जताई जाती है बैसी कोई चिंता उत्तर भारत
के अन्य शहरों को लेकर नहीं की जाती। न तो दिल्ली के मुकाबले उत्तर
भारत के अन्य शहरों के लोग दोयम दर्जे के हैं और न ही ऐसा कुछ है कि
उनके लिए प्रदूषण कम घातक है।410words

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