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Janik jagran 80wpm
Hindustan 90wpm
Jansatta 100wpm



Danik jagran 80wpm 5 min
कश्मीर में बीते तीन दिनों में तीन गैर कश्मीस्यों की जिस तरह चुन-चुन
कर हत्या की गई उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि घाटी में छिपे आतंकी
दहशत फैलाने में तुल गए हैं। इस दहशतगदी का सिर कुचला ही जाना
चाहिए और वह भी आनन-फानन। आतंकियों ने जिन्हें अपना निशाना
बनाया उनमें एक ट्रक ड्राइवर था, एक सेब व्यापारी और एक इंट भट्ठे
में काम करने वाला मजदूर। आतंकियों ने खास तौर पर सेब की खेप
लाने गए लोगों को जिस तरह निशाना बनाया उसका मतलब यहीं है कि
वे नहीं चाहते कि घाटी में सेब उगाने वाले किसानों का भला हो। ये तीन
हत्याएं कश्मीरियत को कलंकित करने के साथ ही यह भी बताती हैं कि
कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर सक्रिय आतंकी किस तरह कश्मीरियों
के लिए ही खतरा बन गए हैं। तीन निदोष-निहत्थे लोगों की हत्या के बाद
कश्मीर में काम-धंधे के लिए गए अन्य लोगों में दहशत होना स्वाभाविक
है। वदि उन्हें सुरक्षा का भरोसा नहीं दिलाया गया तो वे कश्मीर छोड़ने को
मजबूर हो सकते हैं। इससे सबस
होगा। निःसंदेह एक ओर जहां यह जरूरी है कि पुलिस एवं सुरक्षा बल
काम-धंधे की बजह से कश्मीर गए बाहरी लोगों का निशाना बना रहे
आतंकियों का सफाया करें बहीं यह भी आवश्यक है कि आम कश्मीरी
जनता आतंकी तत्वों के खिलाफ खुलकर खड़ी होे। आम कश्मीरी
जनता पाकिस्तानपरस्त कायर आतंकियों और साथ ही उनके खुले-छिपे
समर्थकों के खिलाफ मुखर हो, इसकी कोशिश सुरक्षा बलों के साथ-
साथ कश्मीर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक संगठनों को
भी करनी चाहिए। ऐसा करके ही कश्मीरियत को जीबित किया जा
सकता है।
यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि गैर कश्मीरी लोगों को मारने
वाले आतंकियों ने प्रतिबंधों में ढील का फायदा उठाया है। बे ऐसा कैसे
कर पा रहे हैं, इसकी न केवल तह तक जाना होगा, बल्कि आतंकियों
और उनके समर्थकों के खिलाफ सख्ती का भी परिचय देना होगा।
ऐसा करते हुए वह भी सुनिश्चित करना होगा कि आतंक के समर्थक
मानवाधिकारों की फर्जी आड़ न लेने पाएं। सरकार और सुरक्षा बल
इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की
बात करने वाले कई ऐसे तत्व सक्रिय हैं जो वास्तव में अलगाव और
आतंक के पिट्ठू हैं। यही तत्व कश्मीर के बारे में दुष््रचार करने में लगे
हुए हैं। उनकी ढिटाई का पता इससे चलता है कि वे खूंखार आतंकियों
को भी आम कश्मीरी नागरिक की संज्ञा देने से बाज नहीं आते। 400words

Hindustan 90wpm 459 words 5 min


अपनी आर्थिक ताकत को कूटनीतिक व सामरिक बढ़त में बदलने की चीन की कोशिशें अब नया रंग दिखा रही हैं। चीन ने प्रशांत महासागर में सोलोमन के एक पूरे द्वीप को ही 75 साल के पट्टे पर ले लिया है। सोलोमन एक ऐसा देश है, जो तकरीबन 900 छोटे-बडे़ द्वीपों से मिलकर बना है। अगर नक्शे पर देखें, तो ऑस्ट्रेलिया के आगे पापुआ न्यू गिनी के उस पार कुछ छोटी-छोटी बिंदियां दिखाई देती हैं, यही सोलोमन द्वीप समूह है। इसी का एक छोटा सा द्वीप तुलागी है, जिसे चीनी कंपनी चाइना सैम इंटरप्राइजेज ने पट्टे पर लिया है। इस द्वीप पर कितनी आबादी है, यह तो ठीक से नहीं पता, लेकिन अभी तक वहां कुछ होटल व रिजॉर्ट हैं। जाहिर है, वहां दुनिया भर के अमीर छुट्टियां मनाने के लिए जाते होंगे, पर अब माना जा रहा है कि जल्द ही यह जगह चीन का सैनिक या असैनिक अड्डा होगी। लीज की शर्तों में चीन की कंपनी को औद्योगिक विकास या जैसी जरूरत वह समझे, उस हिसाब से इसके इस्तेमाल की इजाजत दी गई है। अभी यह साफ नहीं है कि वहां होने वाली गतिविधियों पर सोलोमन का कोई नियंत्रण रहेगा या नहीं।

महत्वपूर्ण यह है कि चीन ने एक तीर से दो शिकार कर लिए हैं। अभी तक सोलोमन दुनिया के उन चंद देशों में था, जो ताईवान को एक अलग देश के रूप में मान्यता देते हैं। उसके ताईवान से राजनयिक संबंध भी थे। चीन ने पिछले ही महीने इस पूरे समीकरण को पलट दिया था। पिछले महीने खबर आई कि सोलोमन ने ताईवान से अपने रिश्ते पूरी तरह तोड़कर चीन से राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए हैं। इसे ताईवान और अमेरिका, दोनों के लिए ही एक बहुत बड़ा झटका माना गया था। लेकिन तब यह नहीं सोचा गया था कि यह पहला कदम है और चीन के इरादे इससे कहीं आगे जाने के हैं। वैसे तो सोलोमन द्वीप समूह हमेशा से ही सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है। यहां तक कि द्वितीय विश्व युद्ध में ही इसके सामरिक महत्व को पहचान लिया गया था। यह माना जाता है कि अमेरिका इस समय प्रशांत महासागर में चीनी विस्तारवाद को रोकने के लिए कमर कसे हुए है। इसमें उसके दो महत्वपूर्ण सहयोगी हैं- जापान और ऑस्ट्रेलिया। सोलोमन उस समुद्री रास्ते पर पड़ता है, जो जापान को ऑस्ट्रेलिया से जोड़ता है। इसी रास्ते पर ताईवान भी है। अभी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अमेरिका ने चीन को घेरने की वाकई कोई सामरिक तैयारी की है, अभी इसकी सारी बातें सिर्फ संभावनाओं के आकलन के स्तर पर ही चल रही हैं। जबकि चीन ने किसी भी संभावना को खत्म करने के लिए अपनी चाल चल दी है।

और कुछ न भी हो, तो तुलागी पर चीन का कब्जा दुनिया के तनाव को बढ़ाने का काम तो करेगा ही। 459

Jansatta 5 min 100wpm
जम्मू-कश्मीर में जन-जीवन सामान्य करने के लिए प्रतिबंध
क्या हटने शुरू हुए, चरमपंथी गतिविधियों ने सिर उठाना शुरू
कर दिया है। हालांकि इसकी आशंका पहले से थी । खुफिया
सूचनाएं मिल रही थीं कि जैसे ही प्रतिबंध हटेंगे, वहां चरमपंथी
गतिविधियां बढ़ सकती हैं। इसीलिए घाटी में कफ्फ्यू हटाने और
संचार सुविधाओं की बहाली में करीब ढाई महीने लग गए । मगर
विपक्षी दल इस बात को लैकर सरकार पर हमलावर थे कि वह
घाटी के लोगों के मूलभूत अधिकारों का हनन कर रही है ।
पाकिस्तान भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गुहार लगाता फिर रहा था कि
पूरे जम्मू-कश्मीर को एक जेल में तब्दील कर दिया गया है। वहां
के लोगों का दमन हो रहा है। इसे देखते हुए सरकार ने चरणबद्ध
तरीके से प्रतिबंध हटाने शुरू कर दिए। फिर वहां ब्लॉक विकास
परिषद के चुनाव भी कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी। अनुमान था
कि इस तरह घाटी के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौटना शुरू कर
देंगे और लोकतंत्र पर उनका भरोसा बढ़ेगा | मगर चरमपंथी संगठन
जैसे पहले से तैयार बैठे थे कि मौका मिलते ही वे अपनी साजिशों
को अंजाम देंगे। इसी का नतीजा है कि जम्मू-कश्मीर में कठुआ,
पुलवामा, शोपियां पुंछ, अनंतनाग आदि जगहों पर आतंकी
सक्रियता बढ़ गई। उन्होंने शोपियां में एक फल बिक्रेता और
पुलवामा में एक दिहाड़ी मजदूर की गोली मार कर हत्या कर दी ।
घाटी में अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने का विरोध अब नए ढंग
से भी सुगबुगाने लगा है । वहां से आने वाली सेबों की खेप में सेबों
पर पाकिस्तान के समर्थन और भारत के विरोध में नारे लिखे मिले।
उन नारों में आतंकवादियों का समर्थन भी जताया गया था । हालांकि
यह सेब किसानों या सामान्य फल विक्रेताओं का विरोध नहीं जान
पड़ता । निश्चित रूप से इसके पीछे भी चरमपंथी गुटों का हाथ
होगा। वहां सशस्त्र बलों का सख्त पहरा है, आतंकवादियों के लिए
किसी बड़ी साजिश को अंजाम देना आसान नहीं है । इसलिए वे
अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के मकसद से ऐसी हरकतें कर रहे
हैं, जो उनकी खीज का पता देती हैं । शायद उन्हें लगता होगा कि
इस तरह वे स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल कर सकेंगे, पर यह
भ्रम ही साबित होगा मगर उनकी ये हरकतें सरकार और
सशत्रबलों के लिए एहतियात बरतने के संकेत तो हैं ही।
जम्मू और लद्दाख संभाग में पहले भी कोई बड़ी चुनौती नहीं थी,
सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर में थी । वहीं पाकिस्तान समर्थित
आतंकवादियों की पैठ हो पाती है और वे अशांति फैलाने का प्रयास
करते हैं । हालांकि अलगाववादी संगठनों पर नकेल कसी जा चुकी
है, विपक्षी राजनीतिक दलों की गतिविधियां भी शिथिल हैं, इसलिए
उनके घाटी के आम लोगों को उकसाने की संभावना फिलहाल
नहीं दिखती। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि
वहां के युवाओं में एक प्रकार का आक्रोश दबा हुआ है। चरमपंथी
और अलगाववादी ताकतों, कट्टरपंथी नेताओं के बहकावे में
आकर वे पहले भी आजाद कश्मीर की मांग के साथ सड़कों पर
उतरते रहे हैं। इसलिए विशेष राज्य का दर्जा समाप्त होने के बाद
उनमें आक्रोश और बढ़ा है। 502 words

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