Editorial dictation 16 Oct 2019
Steno help pp
Good morning editorial dictation
Jansatta 100wpm
Danik jagran 90wpm
Hindustan 80wpm
Steno help pp
Hindustan 80wpm 5 min
अभिजीत बनर्जी भारत की गरीबी पर शोध करने वाले ऐसे पहले अर्थशास्त्री नहीं हैं, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। इस सिलसिले में सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा नाम गुन्नार मिर्डल का है, जिन्होंने भारत की गरीबी को पहला अर्थशास्त्रीय आधार दिया था। इसके बाद गरीबी और खासकर कुपोषण पर अमर्त्य सेन का अध्ययन है, जो आज भी बेजोड़ है। गुन्नार मिर्डल से लेकर अमर्त्य सेन तक विकासवादी अर्थशास्त्र की जो धारा चलती है, वह अभिजीत बनर्जी और उनकी जीवन संगिनी एस्टर डफ्लो तक आती है। दोनों ही केंब्रिज के मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जुडे़ हैं। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी के ही एक अन्य संस्थान से जुडे़ माइकल के्रमर का जिक्र भी जरूरी है। इन तीनों को ही संयुक्त रूप से 2019 का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। तीनों ही विकासवादी अर्थशास्त्री हैं। यह अर्थशास्त्र की वह धारा है, जो गरीबी को आर्थिक व्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा मानकर चुप नहीं हो जाती, बल्कि यह प्रतिबद्धता भी रखती है कि गरीबी को सरकारी प्रयासों से खत्म किया जा सकता है। गरीबी कम या खत्म करने के लिए पिछले काफी समय से देश में कई तरह की जो योजनाएं चल रही हैं, वे सब कम या ज्यादा विकासवादी अर्थशास्त्र की सोच से प्रेरित हैं। इन सभी अर्थशा्त्रिरयों ने गरीबी का सिर्फ अध्ययन ही नहीं किया, उससे लड़ने और खत्म करने के तरीकों पर भी काफी काम किया है।
इनके दो योगदान सबसे महत्वपूर्ण हैं। कोई भी नीति या गरीबों को लाभ देने का कोई रास्ता कितना कामयाब होगा, इसे जानने के लिए उन्होंने मेडिकल साइंस के उस औजार को उधार लिया, जिसे रेंडम कंट्रोल ट्रॉयल कहा जाता है, यानी वह तरीका है, जिससे किसी भी नई दवा या नए नुस्खे को परखा जाता है कि वह कितना कामयाब हो सकता है। इतना ही नहीं, गरीबी उन्मूलन के लिए उन्होंने जिस संस्था की नींव रखी, उसे भी प्रयोगशाला का ही नाम दिया गया- पॉवर्टी एक्शन लैब। दूसरा महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने गरीबों से दूर रहकर सिर्फ सिद्धांतों के जरिए गरीबी को समझने की कोशिश नहीं की। पति-पत्नी, दोनों ने ही जगह-जगह पर गरीबों के साथ लंबा समय बिताया, ताकि वे उनके जीवन के दबावों और उसकी वजह से बनने वाली सोच व व्यवहार को अच्छी तरह से समझ सकें। अभिजीत बनर्जी को जो चीज बाकी अर्थशा्त्रिरयों से अलग करती है, वह उनके यही अनुभव हैं। जब दूसरे अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि अगर गरीबों को सीधे धन दे दिया जाए, तो उसका अपव्यय कर देंगे, तब अभिजीत बनर्जी यह कह रहे होते हैं कि यह अपव्यय नहीं है, अतिरिक्त धन से गरीब दरअसल अपनी नीरस जिंदगी में रंग भरने की कोशिश करते हैं।
इनके दो योगदान सबसे महत्वपूर्ण हैं। कोई भी नीति या गरीबों को लाभ देने का कोई रास्ता कितना कामयाब होगा, इसे जानने के लिए उन्होंने मेडिकल साइंस के उस औजार को उधार लिया, जिसे रेंडम कंट्रोल ट्रॉयल कहा जाता है, यानी वह तरीका है, जिससे किसी भी नई दवा या नए नुस्खे को परखा जाता है कि वह कितना कामयाब हो सकता है। इतना ही नहीं, गरीबी उन्मूलन के लिए उन्होंने जिस संस्था की नींव रखी, उसे भी प्रयोगशाला का ही नाम दिया गया- पॉवर्टी एक्शन लैब। दूसरा महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने गरीबों से दूर रहकर सिर्फ सिद्धांतों के जरिए गरीबी को समझने की कोशिश नहीं की। पति-पत्नी, दोनों ने ही जगह-जगह पर गरीबों के साथ लंबा समय बिताया, ताकि वे उनके जीवन के दबावों और उसकी वजह से बनने वाली सोच व व्यवहार को अच्छी तरह से समझ सकें। अभिजीत बनर्जी को जो चीज बाकी अर्थशा्त्रिरयों से अलग करती है, वह उनके यही अनुभव हैं। जब दूसरे अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि अगर गरीबों को सीधे धन दे दिया जाए, तो उसका अपव्यय कर देंगे, तब अभिजीत बनर्जी यह कह रहे होते हैं कि यह अपव्यय नहीं है, अतिरिक्त धन से गरीब दरअसल अपनी नीरस जिंदगी में रंग भरने की कोशिश करते हैं।
Danik jagran 90wpm 5 min 427 words
विधानसभा चुनावों के सिलसिले में महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनावी
सभाओं को संबोधित करने निकले राहुल गांधी राफेल सौदे में कथित
दलाली की चर्चा जिस तरह फिर से कर रहे हैं उससे यही लगता है कि
उन्होंने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय से कोई सबक नहीं
सीखा। लोकसभा चुनावों के पहले उन्होंने इस मुद्दे को तूल देने के साथ
ही चौकीदार चोर हे का नारा भी उछाला था, लेकिन जनता ने उसे नकार
दिया। आम धारणा यही है कि इस नारे ने उलटा असर किया, लेकिन
शायद राहुल गांधी अभी भी यह मान रहे हैं कि राफेल सौदे में दलाली के
आरोप को लगातार उछालने से वह सही साबित हो जाएगा। वह राफेल
सौदे को संदिग्ध बताने के साथ ही अपने इस पुराने आरोप को भी नए
सिरे से धार देते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार केवल उद्योगपतियों के लिए
काम कर रही है। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से किसी की भी
असहमति हो सकती है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं कि उद्योगपतियों
को चोर साबित करने की कोशिश की जाए। दुर्भाग्य से राहुल यही
कर रहे हैं। महाराष्ट्र की एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को
अंबानी और अदानी का लाउड़स्पीकर तो बताया ही, मोदी सरकार की
तुरलाना जेब काटने वालों से भी कर दी। ऐसा करते हुए उन्होंने तू- तड़ाक
वाली भाषा का भी इस्तेमाल किया। आखिर ऐसी भाषा के इस्तेमाल के
बाद कांग्रेस के नेता विरोधी दलों को भाषा की मर्यादा में रहने की नसीहत
कैसे दे सकते हैं?
राहुल गांधी जीएसटी को भी फिर से गब्बर सिंह टैक्स बताने में जुट
गए हैं। इससे कुछ पता चल रहाम है तो यही कि वह ऐसे नेता नहीं जो
अपनी गलतियों पर गौर करें। अभी हाल तक कांग्रेस के अध्यक्ष सहे राहुल
गांधी अपने हिसाब से राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसा
करते हुए उन्हें यह भी देखना चाहिए कि पार्टी किस दिशा की ओर बढ़
रही है? यह अपेक्षा इसलिए, क्योंकि खुद कांग्रेस के ही कई नेता यह
कह रहे हैं कि हरियाणा और महाराष्ट्र में पार्टी की जीत के आसार नहीं
दिख रहे हैं। पता नहीं, चुनाव नतीजे क्या बयान करेंगे, लेकिन इससे
इन्कार नहीं कि कांग्रेस की दशा दयनीय दिख रही है। शायद ही कोई राज्य
ऐसा हो जहां पार्टी गुटबाजी से ग्रस्त न हो। इससे भी खराब बात यह है
कि यह जानना कठिन हो रहा है कि कांग्रेस अपने पक्ष में कैसा विमर्श
खड़ा करना चाह रही है? राहुल गांधी कुछ भी दावा करें, इसमें संदेह है
कि उनके चुनावी भाषण कांग्रेस को एक जिम्मेदार दल के तौर पर उभारने
का काम कर सकेंगे।
सभाओं को संबोधित करने निकले राहुल गांधी राफेल सौदे में कथित
दलाली की चर्चा जिस तरह फिर से कर रहे हैं उससे यही लगता है कि
उन्होंने लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की पराजय से कोई सबक नहीं
सीखा। लोकसभा चुनावों के पहले उन्होंने इस मुद्दे को तूल देने के साथ
ही चौकीदार चोर हे का नारा भी उछाला था, लेकिन जनता ने उसे नकार
दिया। आम धारणा यही है कि इस नारे ने उलटा असर किया, लेकिन
शायद राहुल गांधी अभी भी यह मान रहे हैं कि राफेल सौदे में दलाली के
आरोप को लगातार उछालने से वह सही साबित हो जाएगा। वह राफेल
सौदे को संदिग्ध बताने के साथ ही अपने इस पुराने आरोप को भी नए
सिरे से धार देते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार केवल उद्योगपतियों के लिए
काम कर रही है। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से किसी की भी
असहमति हो सकती है, लेकिन इसका कोई मतलब नहीं कि उद्योगपतियों
को चोर साबित करने की कोशिश की जाए। दुर्भाग्य से राहुल यही
कर रहे हैं। महाराष्ट्र की एक रैली में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को
अंबानी और अदानी का लाउड़स्पीकर तो बताया ही, मोदी सरकार की
तुरलाना जेब काटने वालों से भी कर दी। ऐसा करते हुए उन्होंने तू- तड़ाक
वाली भाषा का भी इस्तेमाल किया। आखिर ऐसी भाषा के इस्तेमाल के
बाद कांग्रेस के नेता विरोधी दलों को भाषा की मर्यादा में रहने की नसीहत
कैसे दे सकते हैं?
राहुल गांधी जीएसटी को भी फिर से गब्बर सिंह टैक्स बताने में जुट
गए हैं। इससे कुछ पता चल रहाम है तो यही कि वह ऐसे नेता नहीं जो
अपनी गलतियों पर गौर करें। अभी हाल तक कांग्रेस के अध्यक्ष सहे राहुल
गांधी अपने हिसाब से राजनीति करने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन ऐसा
करते हुए उन्हें यह भी देखना चाहिए कि पार्टी किस दिशा की ओर बढ़
रही है? यह अपेक्षा इसलिए, क्योंकि खुद कांग्रेस के ही कई नेता यह
कह रहे हैं कि हरियाणा और महाराष्ट्र में पार्टी की जीत के आसार नहीं
दिख रहे हैं। पता नहीं, चुनाव नतीजे क्या बयान करेंगे, लेकिन इससे
इन्कार नहीं कि कांग्रेस की दशा दयनीय दिख रही है। शायद ही कोई राज्य
ऐसा हो जहां पार्टी गुटबाजी से ग्रस्त न हो। इससे भी खराब बात यह है
कि यह जानना कठिन हो रहा है कि कांग्रेस अपने पक्ष में कैसा विमर्श
खड़ा करना चाह रही है? राहुल गांधी कुछ भी दावा करें, इसमें संदेह है
कि उनके चुनावी भाषण कांग्रेस को एक जिम्मेदार दल के तौर पर उभारने
का काम कर सकेंगे।
Jansatta 100wpm 5 min 514 words
इस साल का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार यह दर्शाता है कि
२ अर्थव्यवस्था के तकाजे के हवाले से गरीबों और वंचितों के सवाल
किसी न किसी बहाने तात्कालिक रूप से पीछे छोड़ देने की दलील के
बरक्स बेहतर संकल्पनाएं मौजूद हैं। अब निश्चित रूप से फिर इस सिरे
से अर्थव्यवस्था का विश्लेषण होगा और चुनौतियों का हल निकालने
की कोशिश होगी। अभिजित बनर्जी, एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर
को संयुक्त रूप से मिला नोबेल पुरस्कार दरअसल विकास के
अर्थशास्त्र को फिर से जीवित करने में उनके योगदान के लिए दिया
गया है । अर्थव्यवस्था की सतही चकाचौंध के बरक्स इन प्रयोगधर्मी
अर्थशास्त्रियों ने यह साबित किया कि दुनिया भर में पसरी गरीबी से
छोटे और ज्यादा सटीक सवालों के जरिए कैसे निपटा जा सकता है ।
नोबेल समिति ने उनके योगदान के बारे में कहा कि इन तीनों ही
अर्थशास्त्रियों के प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण ने पिछले कई दशकों में विकास
अर्थशास्त्र के स्वरूप को बदला है। उनके अध्ययनों और प्रयोगों के
निष्कर्षों के जरिए खासतौर पर गरीब और मध्य आय वाले देशों में नीति
निर्माण में काफी मदद मिल सकती है । इन तीनों ने ही गरीबी,
असमानता और जनकल्याण जैसे समान विषयों पर शोध किए हैं जो
तीसरी दुनिया के देशों के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं ।
सन 1998 में अमत्त्य सेन को अर्थशास्त्र में गरीबी उन्मूलन की दिशा
में ही काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिलने के इक्कीस सालों बाद
यह दूसरा मौका है जो भारत के लिए खास और अहम है। दरअसल,
अभिजित बनर्जी भारतीय मूल के हैं जिन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। एक अन्य खास बात यह भी है कि
अर्थशास्त्र में इस साल की नोबेल तिकड़ी में अभिजित बनर्जी और एस्थर
डफ्लो पति- पत्नी भी हैं इन्होंने अपने प्रयोगों के जरिए यह साबित किया
कि गरीबी के मुद्दे पर बड़ी-बड़ी बहसों के बजाय अगर गरीबी को दूर
करने के लिए लघुस्तरीय कार्यक्रमों को व्यापक पैमाने पर अंजाम दिया
जाए तो वह ज्यादा उपयोगी है। अगर गरीब तबकों के बीच शिक्षा, पोषण
और टीकाकरण जैसे कामों को मुख्य केंद्र बनाने के साथ-साथ लोगों को
थोड़ी सहायता दी जाए तो ऐसे कार्यक्रमों में अपेक्षा से अधिक कामयाबी
दर्ज की जा सकती है । मसलन, एक प्रयोग के तहत इन अर्थशास्त्रियों ने
प्रोत्साहन के तौर पर सिर्फ दाल का इस्तेमाल करके राजस्थान के एक
इलाके में टीकाकरण के कार्यक्रम को सफलता से पूरा किया ।
आधुनिक विश्व में बाजार को सबसे बड़ी ताकत माना जाता है और
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को उसकी मजबूती और कमजोरी का
एक सबसे अहम पहलू। दुनिया भर में अब इसी केंद्र के इर्द-गिर्द न
केवल विकास से संबंधित गतिविधियां चल रही हैं, बल्कि राजनीति भी
इसी से प्रभावित होती है । लेकिन इसी के समांतर ऐसे सवाल भी उठते
रहे हैं कि किसी लोकतांत्रिक देश में अर्थव्यवस्था केंद्रित विकास में अगर
अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है तो ऐसा क्यों है
और आखिर इसकी वजहें क्या हैं! इसका जवाब केवल विकास के
'संक्रमणकाल' या फिर धीरे -धीरे रिस कर वंचित तबकों तक पहुंचने के
आश्वासन भर से नहीं ढूंढ़ा जा सकता है। 514 words
२ अर्थव्यवस्था के तकाजे के हवाले से गरीबों और वंचितों के सवाल
किसी न किसी बहाने तात्कालिक रूप से पीछे छोड़ देने की दलील के
बरक्स बेहतर संकल्पनाएं मौजूद हैं। अब निश्चित रूप से फिर इस सिरे
से अर्थव्यवस्था का विश्लेषण होगा और चुनौतियों का हल निकालने
की कोशिश होगी। अभिजित बनर्जी, एस्थर डफ्लो और माइकल क्रेमर
को संयुक्त रूप से मिला नोबेल पुरस्कार दरअसल विकास के
अर्थशास्त्र को फिर से जीवित करने में उनके योगदान के लिए दिया
गया है । अर्थव्यवस्था की सतही चकाचौंध के बरक्स इन प्रयोगधर्मी
अर्थशास्त्रियों ने यह साबित किया कि दुनिया भर में पसरी गरीबी से
छोटे और ज्यादा सटीक सवालों के जरिए कैसे निपटा जा सकता है ।
नोबेल समिति ने उनके योगदान के बारे में कहा कि इन तीनों ही
अर्थशास्त्रियों के प्रयोगधर्मी दृष्टिकोण ने पिछले कई दशकों में विकास
अर्थशास्त्र के स्वरूप को बदला है। उनके अध्ययनों और प्रयोगों के
निष्कर्षों के जरिए खासतौर पर गरीब और मध्य आय वाले देशों में नीति
निर्माण में काफी मदद मिल सकती है । इन तीनों ने ही गरीबी,
असमानता और जनकल्याण जैसे समान विषयों पर शोध किए हैं जो
तीसरी दुनिया के देशों के लिए बेहद अहम साबित हो सकते हैं ।
सन 1998 में अमत्त्य सेन को अर्थशास्त्र में गरीबी उन्मूलन की दिशा
में ही काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिलने के इक्कीस सालों बाद
यह दूसरा मौका है जो भारत के लिए खास और अहम है। दरअसल,
अभिजित बनर्जी भारतीय मूल के हैं जिन्होंने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू
विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। एक अन्य खास बात यह भी है कि
अर्थशास्त्र में इस साल की नोबेल तिकड़ी में अभिजित बनर्जी और एस्थर
डफ्लो पति- पत्नी भी हैं इन्होंने अपने प्रयोगों के जरिए यह साबित किया
कि गरीबी के मुद्दे पर बड़ी-बड़ी बहसों के बजाय अगर गरीबी को दूर
करने के लिए लघुस्तरीय कार्यक्रमों को व्यापक पैमाने पर अंजाम दिया
जाए तो वह ज्यादा उपयोगी है। अगर गरीब तबकों के बीच शिक्षा, पोषण
और टीकाकरण जैसे कामों को मुख्य केंद्र बनाने के साथ-साथ लोगों को
थोड़ी सहायता दी जाए तो ऐसे कार्यक्रमों में अपेक्षा से अधिक कामयाबी
दर्ज की जा सकती है । मसलन, एक प्रयोग के तहत इन अर्थशास्त्रियों ने
प्रोत्साहन के तौर पर सिर्फ दाल का इस्तेमाल करके राजस्थान के एक
इलाके में टीकाकरण के कार्यक्रम को सफलता से पूरा किया ।
आधुनिक विश्व में बाजार को सबसे बड़ी ताकत माना जाता है और
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को उसकी मजबूती और कमजोरी का
एक सबसे अहम पहलू। दुनिया भर में अब इसी केंद्र के इर्द-गिर्द न
केवल विकास से संबंधित गतिविधियां चल रही हैं, बल्कि राजनीति भी
इसी से प्रभावित होती है । लेकिन इसी के समांतर ऐसे सवाल भी उठते
रहे हैं कि किसी लोकतांत्रिक देश में अर्थव्यवस्था केंद्रित विकास में अगर
अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है तो ऐसा क्यों है
और आखिर इसकी वजहें क्या हैं! इसका जवाब केवल विकास के
'संक्रमणकाल' या फिर धीरे -धीरे रिस कर वंचित तबकों तक पहुंचने के
आश्वासन भर से नहीं ढूंढ़ा जा सकता है। 514 words
Thanks for watching
Steno help pp
Comments
Post a Comment