Editorial dictation 23 Oct

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Editorial dictation



Hindustan 80words 400words
पहला टेस्ट मैच पूरे पांच दिन चला था, दूसरा चार दिन में खत्म हो गया और तीसरा तो कायदे से तीन दिन भी नहीं चला। बेशक रांची में हुए टेस्ट मैच में दक्षिण अफ्रीका के बचे दो खिलाड़ियों को आउट करने के लिए भारतीय टीम को चौथे दिन भी कुछ देर के लिए मैदान में उतरना पड़ा, पर पहले दिन खराब रोशनी के कारण जो मैच काफी देर नहीं हो सका, उसे अगर इससे घटा दिया जाए, तो तीसरा टेस्ट मैच भारत ने तीन दिन से भी कम समय में जीत लिया। कभी दुनिया की सबसे सशक्त टीमों में गिनी जाने वाली दक्षिण अफ्रीका की टीम को तीनों मैच में करारी मात देकर भारत ने जो रिकॉर्ड कायम किया है, वह न सिर्फ किताबों में दर्ज हुआ है, बल्कि लंबे समय तक याद भी किया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका के कप्तान डुप्लेसिस के शब्दों में, यह ऐसी हार है, जिससे पहुंचे मानसिक आघात से उबरने में काफी वक्त लगेगा। वैसे तो यह शुरू से ही माना जा रहा था कि दक्षिण अफ्रीका की टीम भारतीय टीम के मुकाबले काफी कमजोर है, लेकिन वह तीनों टेस्ट मैच हार जाएगी और उनमें से भी दो में उसे फॉलोऑन मिलेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। ऐसे में, यह तर्क बेमतलब है कि दक्षिण अफ्रीका के कई अच्छे खिलाड़ी इस बार या तो टीम में नहीं थे या फॉर्म में नहीं थे। इस हिसाब से देखें, तो भारत के सबसे अच्छे गेंदबाज बुमराह चोटिल होने के कारण नहीं खेल सके। ऐसा तो हर शृंखला में लगभग हर टीम के साथ होता है।

किसी भी टीम के लिए अच्छी शृंखला वह होती है, जो सिर्फ उसे जिताती ही नहीं है, बल्कि उसे नया आत्मविश्वास और कुछ नए खिलाड़ी देती है। टीम इंडिया को इस शृंखला से ये तीनों चीजें ही मिलीं, जीत भी, आत्मविश्वास भी और नए खिलाड़ी भी। पूरी शृंखला में मयंक अग्रवाल और आखिरी मैच में शाहबाज नदीम ने बड़ी उम्मीद बंधाई है। रोहित शर्मा ने खुद को टेस्ट मैच की जरूरतों के लिहाज से जिस तरह ढाला है, उसका जिक्र भी जरूरी है। कुल मिलाकर, यह ऐसी टीम है, जिसने बहुत बड़ा स्कोर भी खड़ा किया और विरोधी टीम को दोनों पारियों में आउट भी किया। यह ऐसा संतुलन है, जो दुनिया की किसी भी टीम पर भारी पड़ सकता है। भारत ने घरेलू मैदान पर लगातार 11वीं शृंखला जीती है और इसके साथ ही कप्तान विराट कोहली को यह आत्मविश्वास दिया है कि उनके खिलाड़ी अब दुनिया के किसी भी मैदान पर किसी टीम को हरा सकते हैं।417 words


Danik jagran 90wpm 430words
यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया के दुरुपयोग को
रोकने के लिए विभिन्न उच्च न्यायालयों में दायर याचिकाओं को अपने
पास स्थानांतरित कर लिया। अब इन सभी याचिकाओं की सुनवाई वह
स्वयं करेगा। इन याचिकाओं के संदर्भ में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को
सूचित किया है कि उसकी ओर से अगले तीन माह में सोशल मीडिया
संबंधी नियम तैयार कर लिए जाएंगे। इन नियमों के बारे में अभी कुछ
कहना कठिन है, लेकिन ऐसे सवाल उठ खड़े होना स्वाभाविक है कि
आखिर सरकार को ऐसे कोई नियम क्यों तैयार करने चाहिए ? यह अंदेशा
भी प्रकट किया जा रहा है कि कहीं नियम बनाकर सरकार सोशल मीडिया
की निगरानी तो नहीं करने लगेगी? ऐसे सवाल और संदेह के बीच इस
सच की अनदेखी नहीं की जा सकती कि पूरी दुनिवा के लिए सोशल
मीडिया का दुरुपयोग एक गंभीर समस्या बना गया है। यह समस्या
इसलिए और विकट हो गई है, क्योंकि सोशल मीडिया कंपनियां अपने
प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग रोकने के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं कर रही
हैं। जब उनसे इसकी अपेक्षा की जाती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
बाधित करने का शोर मचने लगता है। यह शोर सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच
सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सोशल मीडिया के नियमन
की कोई जरूरत नहीं। सच तो यह है कि इसकी जरूरत कहीं अधिक
बढ़ गई है। इसका कारण यही है कि सोशल मीडिबा का दुरुपयोग सभ्य
समाज के समक्ष गंभीर संकट पैदा कर रहा है।
सरकारों के साथ उसकी एजेंसियों के लिए सोशल मीडिया का
दुरुपयोग रोकना कठिन हो रहा है। सरकारी एजेंसियों की ओर से सोशल
मीडिया के बेजा इस्तेमाल को रोकने के जो थोड़े-बहुत उपाय किए गए
हैं वे इसलिए बेअसर साबित हो रहे हैं, क्योंकि फर्जी एवं अधकचरी
खबरों के जरिये दुष्प्रचार अभियान चलाने और सामाजिक ताने-बाने को
क्षति पहुंचाने अथवा किसी को बदनाम करने वाला एक संगठित उद्योग
खड़ा हो चुका है। यह एक ऐसा उद्योग है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए
खतरा बन रहा है। आखिर कौन भूल सकता है कैब्रिज एनालिटिका
नामक कंपनी की उस कारस्तानी को जिसने फेसबुक का डाटा चोरी
कर कई देशों के चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की थी? ऐसे
व्यापक छल-कपट को देखते हुए यह आशा करना व्यर्थ है कि सरकारें
सोशल मीडिया का नियमन करने के कोई उपाय न करें । नियमन की
जरूरत इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि सोशल मीडिया कंपनियां अपनी
जिम्मेदारी समझने के लिए तैयार नहीं। इसकी गिनती करना कठिन है
कि फेसबुक सरीखी नामी कंपनी ने डाटा चोरी के मामले में कितनी बार
मिथ्या जानकारी देकर लोगों को भरमाने की कोशिश की है।430 words

Jansatta 100wpm 5 min 514 words

तमाम विवादों और सहमति-असहमति के बीच करतारपुर साहिब
गुरद्वारे तक श्रद्धालुओं की पहुंच के लिए भारत और पाकिस्तान के
बीच होने वाला समझौता दोनों देशों के रिश्तों में नए युग की शुरुआत
से कम नहीं माना जाना चाहिए। करतारपुर गलियारे का रास्ता खुलना
और इसके लिए पाकिस्तान के साथ होने वाला समझौता दोनों देशों के
बीच जमी बर्फ को पिघलाने का काम कर सकता है। लंबे समय से
भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जो तनाब बना हुआ है, उस स्थिति
में यह समझौता होना बड़ी बात है। हालॉकि इस समझौते के साथ
भारत ने पाकिस्तान से यह उम्मीद की थी कि वह हर तीर्थयात्री से बीस
डॉलर का सेवा शुल्क लेने का फैसला टाल दे । लेकिन पाकिस्तान इस
शुल्क को लेने पर अड़ा हुआ है। इससे हर श्रद्धालु पर करीब डेढ़
हजार रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। वैसे इस मौके पर पाकिस्तान
थोड़ी-सी दरियादिली दिखाए और इस शुल्क को वापस ले ले तो इससे
उसका कोई बहुत भारी नुकसान नहीं होने वाला है, बल्कि सिख
समुदाय और भारत के मन में उसके प्रति एक जगह ही बनेगी यह
कोई कारोबारी समझौता तो है नहीं जिसमें नफा-नुकसान देखा जाए,
बल्कि धार्मिक पर्यटन के तहत रियायत दी जा सकती है। लेकिन भारत
ने फिलहाल अपनी ओर से इसे कोई ऐसा मुद्दा नहीं बनाया है जिससे
कि समझौते के रास्ते में कोई बाधा पैदा हो।
कश्मीर सहित कई मुद्दों को लेकर समय-समय पर भारत और
पाकिस्तान के बीच रिश्ते नाजुक दौर में पहुंचते रहे हैं। करगिल युद्ध
से ठीक पहले दोनों देशों के बीच लाहौर-दिल्ली बस सेवा शुरू हुई
थी। उसके बाद मुनाबाव-खोखरापार रेल लिंक और श्रीनगर-
मुजफ्फराबाद बस सेवा के लिए समझौता हुआ था। लेकिन इस साल
पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आतंकी हमले के बाद भारत
ने पाकिस्तान से रिश्तों में सुधार की सारी उम्मीदें छोड़ दी थीं। जम्मू-
कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म किए जाने के बाद से तो दोनों
देशों के बीच युद्ध जैसे हालात बन गए और पाकिस्तान ने परमाणु
युद्ध तक की धमकी दे डाली। लेकिन इतना सब होते हुए भी अगर
पाकिस्तान ने भारतीय सिखों के लिए करतारपुर साहिब गलियारे का
रास्ता खोला है तो इससे काफी उम्मीदें बनती हैं।
सिखों के लिए करतारपुर का यह गुरद्वारा एक पवित्र स्थान है। अभी
तक लोग सीमा के पास से दूरबीनों से ही इसकी झलक भर देख पाते हैं।
लेकिन भारत सरकार की सतत ठोस पहल और पाकिस्तान के सकारात्मक
रुख से गलियारे का निर्माण हुआ और गुरद्वारे तक पहुंचने का रास्ता बना।
यह गुरद्वारा अंतरराष्ट्रीय सीमा से मात्र साढ़े चार किलोमीटर की दूरी पर
है। भारत ने अपने यहां से जाने वाले श्रद्धालुओं को सीमा के पास बड़ी
सुविधाएं देने की तैयारी कर ली है। फिलहाल पाकिस्तान ने पांच हजार
तीर्थयात्रियों को इजाजत देने का फैसला किया है। हालांकि तीर्थयात्रियों की
संख्या पर किसी तरह के प्रतिबंध का कोई औचित्य नजर नहीं आता।
करतारपुर साहिब तक श्रद्धालुओं को जाने देने का मामला दो दशक पहले
से चला आ रहा था। 1999, 2004 फिर 2008 में भारत ने इस मुद्दे को
पाकिस्तान के समक्ष उठाया था, लेकिन पाकिस्तानी हुकूमत की हठधर्मिता
के कारण सारी कोशिशें बेकार गईं।513

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