29 april 2018 editorial 100 wpm


भारत सरकार ने कोरोना से बहुत मामूली रूप से संक्रमित मरीजों को उनके घर में रखकर ही उपचार के जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, वे न केवल प्रशंसनीय, बल्कि अनुकरणीय भी हैं। जिन मरीजों में संक्रमण के बहुत मामूली संकेत हैं या जिनमें कोरोना के लक्षण उभरे नहीं हैं, उन्हें वाकई अस्पताल लाकर भीड़ बढ़ाने की जरूरत नहीं है। ऐसे मरीजों को उनके घर पर ही उपचार किया जा सकता है। ऐसे मरीजों के घर में एकांतवास की सहूलियत होना जरूरी है। साथ ही एक ऐसे समझदार तिमारदार की भी जरूरत पड़ेगी, जो अस्पताल से लगातार जुड़ा रहेगा। विशेष रूप से जो लोग जागरूक या सतर्क हैं, उन्हें इससे बड़ी सहूलियत हो जाएगी। आम तौर पर स्थिति के खराब होने या कोरोना के लक्षणों के उभरने के बाद ही मरीज अस्पतालों में भर्ती किए जा रहे हैं। सरकार के होम आइसोलेशन संबंधी दिशा-निर्देशों का महत्व तभी है, जब मरीज समय रहते सतर्क हो जाएं। ऐसे सतर्क मरीज को अस्पताल की सुविधाओं या भीड़ या डर से दो-चार नहीं होना पडे़गा। घर में एकांतवास में उपचार लाभ करते हुए समय पर बेहतर भोजन, दवा, पानी की सुविधा भी मिल सकेगी। 
सरकार का यह कदम अस्पतालों को मरीजों के गैर-जरूरी बोझ से बचाने के लिए भी जरूरी था। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ठीक हो चुके करीब 7,000 मरीजों को छोड़ दें, तो अभी भी अब भारत में संक्रमितों की संख्या करीब 22,000 पहुंच रही है, इन सबकी तिमारदारी की जिम्मेदारी अस्पतालों पर है। इन 22,000 मरीजों में से अगर दस प्रतिशत मरीज भी ऐसे हैं, जिनका उपचार उनके घर के एकांतवास में हो सकता है, तो यह एक बड़ी बात होगी। वैसे भी अस्पतालों में जिस तरह से इलाज हो रहा है, वह भी किसी एकांतवास से कम नहीं है, पर जब घर में ही इलाज चलेगा, तो मरीज के साथ उनके परिजन का भी मनोबल बना रहेगा।
इसमें कोई शक नहीं कि इस बीमारी का खतरा कायम है, लेकिन उसका भय लगातार कम हो रहा है। हम इस बीमारी से लड़ने के तरीकों का विकास भी करते चल रहे हैं, तो यह जितना स्वाभाविक है, उतना ही जरूरी भी है। हमें मरीजों की बढ़ती संख्या के साथ केवल अस्पतालों और उपलब्ध बिस्तरों के बारे में ही नहीं सोचना है, हमें उन डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के बारे में भी सोचना है, जो दिन-रात सेवा में जुटकर खुद को जोखिम में डाले हुए हैं। सरकार की होम आइसोलेशन की नीति से चिकित्सा समाज को भी राहत का एहसास होगा। विशेष रूप से सक्षम समाज के मरीज अस्पतालों पर बोझ नहीं बनेंगे। लेकिन होम आइसोलेशन की सुविधा की निगरानी भी बेहतर ढंग से करनी पडे़गी और इसमें स्वयं मरीजों द्वारा यथोचित सहयोग इलाज की बुनियाद होगा। इसके अलावा सरकार को व्यापक रूप से भी सोचना चाहिए, घर बैठे इलाज की सुविधा की जरूरत देश में अभी लाखों उन मरीजों को भी है, जो अन्य गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे लाखों मरीजों को अस्पतालों ने कोरोना की वजह से घर लौटा दिया है। अब समय आ गया है कि लगभग 35 दिन के लॉकडाउन के उपरांत ऐसे मरीजों को भी घर बैठे हर संभव चिकित्सा सेवा मुहैया कराई जाए। यकीन मानिए, कोरोना से लड़ाई में ऐसे अनेक अच्छे तरीके हमें हासिल होंगे, जो भविष्य में तमाम बीमारियों से लड़ने में काम आएंगे।
·         जब सर्वे सरकार के मनमाफिक नहीं तो अधिकारी कहते हैं लाभार्थियों (यानी गरीबों) ने और लाभ के लिएझूठ बोला। लेकिन, सीएजी की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि स्वयं सरकारें झूठ बोलती हैं। एनएसएस की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार अभी भी एक-चौथाई ग्रामीण भारत शौचालयों से वंचित हैं। उधर सरकार के स्वच्छता विभाग का मानना है कि जिन ग्रामीणों से यह सवाल किया जाता है वे अक्सर ज्यादा सरकारी मदद के लिए झूठ बोलते हैं।
·         एनएसएस ने भी इस बात को माना है। अगर यह सच है तो देश में शायद ही किसी सरकारी योजना की जमीनी हालत का पता चल पाएगा, क्योंकि लालच में लोग गरीबी और अभाव को बढ़ा-चढ़ाकर बताएंगे और अगर नहीं भी बताया तो सरकार उसे ख़ारिज कर देगी।
·         अगर उपभोग आधारित सर्वे हो तो सरकार का यह आरोप समझा जा सकता है कि गरीब दूध, दाल या अनाज के रोजाना उपभोग का आंकड़ा गलत देकर अपने को गरीब बता सकता है, लेकिन सरकारी मदद से बने शौचालय तो सर्वे करने वाला अपनी आंख से देख सकता है, फिर यह विरोधाभास क्यों? वैसे यह आम शिकायत है कि मात्र 12 हज़ार रुपए में शौचालय नहीं बन सकता, लिहाज़ा लाभार्थी पैसे पाने के लिए ढांचा खड़ा कर देते हैं जो कुछ दिनों में गिर जाता है या शौच के लायक नहीं रहता।
·         सरकारी आंकड़े में वह शौचालय बना रहता है। उधर सीएजी रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु के सरकारी आंकड़े पिछले पांच साल से कम करके बताए जा रहे हैं। इस संवैधानिक संस्था ने पाया कि सबसे बड़ी आबादी वाले इस राज्य में सरकारी अस्पताल में मृत पैदा हुए बच्चों की संख्या लगभग 40% कम बताई जा रही है। मुद्दा यह नहीं है कि किसके शासनकाल में इन कृत्यों को अंजाम दिया गया। सीएजी ने यह भी पाया कि 86% मरीजों को पांच मिनट से भी कम समय में जांच करके भेज दिया जाता है।
·         इसका नतीजा यह होता है कि जब केस बिगड़ जाता है तो मरीज के परिवार वाले उसे मजबूर होकर महंगे निजी अस्पतालों में ले जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारें स्वास्थ्य के मद में सबसे कम खर्च कर रही हैं। उस पर से अगर ये तथ्य भी छिपाने लगी हैं तो इन राज्यों के 32 करोड़ लोगों और हर साल करीब 50 लाख नवजातों का भविष्य कितना अंधकारमय होता होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है।
·          
·         दिल्ली में कोरोना वायरस संक्रमण के 206 नए मामले सामने आने के बाद संक्रमितों की संख्या मंगलवार को बढ़कर 3,314 हो गई। दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने यह जानकारी दी।उन्होंने बताया कि मंगलवार को लगातार तीसरे दिन इस वायरस से किसी की मौत होने का कोई नया मामला सामने नहीं आया।
·         अधिकारियों ने कहा कि अब तक कुल 54 लोगों को मौत हो चुकी है। इस महामारी के कारण जान गंवाने वाले 29 लोगों की आयु 60 साल या उससे अधिक थी जबकि 15 लोगों की उम्र 50 से 59 साल के बीच और 10 मृतकों की आयु 50 साल से कम थी।1041

Comments

Popular posts from this blog

20-05-2020

07-05-2020 editorial