18 april hindi editorial dictation


देश की अर्थव्यवस्था को उबारने और आम लोगों को राहत देने की भारतीय रिजर्व बैंक की घोषणाएं न केवल आशा का संचार करने की कोशिश करती हैं, बल्कि दूसरी वित्तीय संस्थाओं को प्रेरित भी करती हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बिल्कुल सही कदम उठाते हुए देश के वित्तीय संस्थानों के लिए 50,000 करोड़ रुपये का पैकेज दिया है। नाबार्ड, सिडबी व एनएचबी जैसी संस्थाओं को इससे मदद मिलेगी। इसके अलावा रिजर्व बैंक ने रिवर्स रेपो रेट को 25 आधार अंक घटाया है, मतलब अब बैंक जब रिजर्व बैंक में धन जमा करेंगे, तो उन्हें महज 3.75 फीसदी का ब्याज हासिल होगा। ऐसे में, बैंक अपना बचा हुआ धन रिजर्व बैंक में जमा करने की बजाय बाजार में लगाना पसंद aकरेंगे। रिजर्व बैंक यही चाहता है। कुल मिलाकर, रिजर्व बैंक की कोशिश है कि बैंक अपने संस्थागत और व्यक्तिगत ग्राहकों को आसानी से कर्ज दें, ताकि अर्थव्यवस्था में तेजी आए। क्या रिवर्स रेपो रेट घटने का वाकई लाभ होगा? क्या बैंक नए मौद्रिक परिवर्तनों का लाभ उठाकर उसे अपने ग्राहकों तक पहुंचाएंगे? लोग भूले नहीं हैं, कोरोना के नाम पर कर्ज या ईएमआई चुकाने में जो राहत घोषित हुई थी, वह न सिर्फ अल्पकालिक, बल्कि बाद में भारी साबित होगी। अत: कोरोना के समय में ऐसे अनेक सवाल हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के संवेदनशील विशेषज्ञों और आम लोगों को समान रूप से मथ रहे हैं। 
वैसे भी लॉकडाउन के समय में बैंकों को कामकाज बढ़ाने में कुछ ही सुविधा होगी। पूरा लाभ तभी होगा, जब लॉकडाउन में ढील दी जाएगी और आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी। कोरोना के आतंक से पहले ही वित्त बाजार ठंडा पड़ा हुआ था और अब तो वहां कामकाज लगभग बंद-सा है। शायद ही कोई ऐसा होगा, जो ऐसे प्रतिकूल समय को कर्ज लेने के लिए सही मान रहा होगा। रिजर्व बैंक की पहल से लाभ लेने और देने का ज्यादा दारोमदार बैंकों पर होगा। बैंकों के कामकाज के अलावा अन्य वित्तीय संस्थाओं को भी अपने कामकाज को पुख्ता करना होगा, ताकि वे छोटे, मंझोले उद्योगों और विशेष रूप से भवन निर्माण उद्योग को जरूरी ऋण मुहैया कराएं। कोरोना संकट व देश की डगमगाती अर्थव्यवस्था के बीच आरबीआई के बड़े ऐलानों की परख तभी होगी, जब नाबार्ड, सिडबी और एनएचबी जैसी संस्थाएं सही काम करेंगी। 
एक बड़ा खतरा यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा हासिल प्रत्यक्ष या परोक्ष वित्तीय मदद का उपयोग बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएं अपने घाटे की भरपाई में न करने लगें। यह पहले भी देखा गया है कि रिजर्व बैंक या सरकार द्वारा दी गई राहत बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के स्तर पर अटक जाती है, आम ग्राहकों तक पूरी नहीं पहुंच पाती हैं। जिस तरह से खराब कर्ज बांटकर देश के कुछ बैंकों ने खुद को और आम ग्राहकों को परेशान किया है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। प्रमुख सरकारी बैंकों के खराब कामकाज की निंदा सरकार में उच्च स्तर पर भी हो चुकी है। अत: हमें लंबे, पर ईमानदार वित्तीय संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि कोरोना संकट से निकले, तो 2021-22 में जीडीपी की अनुमानित दर 7.4 फीसदी रहेगी। अगर इस अनुमान को वाकई साकार करना है, तो हमें अर्थव्यवस्था में हर स्तर पर ईमानदारी को बढ़ावा देना होगा और तभी कोई मदद जरूरतमंदों तक पहुंच पाएगी।

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