17 april editorial dictation


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भारत में चिकित्सक समुदाय पर लगातार जारी हमलों की जितनी निंदा की जाए, कम ही होगी। ये हमले न केवल जघन्य अपराध हैं, बल्कि अमानवीयता की पराकाष्ठा भी हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार से लेकर नई दिल्ली तक अनेक राज्य हैं, जहां कोरोना जांच या सेवा में लगे लोगों पर हमले किए जा रहे हैं। अमेरिका, मेक्सिको, फिलीपींस, आइवरी कोस्ट, पाकिस्तान इत्यादि अनेक देशों में भी चिकित्साकर्मियों पर हमले हुए हैं, लेकिन भारत में मानो ऐसे हमलों का सिलसिला-सा चल पड़ा है। इंदौर हो या मुरादाबाद या औरंगाबाद, जो डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी लोगों के बचाव और सेवा के लिए खुद को जोखिम में डालकर जा रहे हैं, वे न केवल प्रशंसा, बल्कि श्रद्धा के अधिकारी हैं। महामारी के समय में जब सगे भी कन्नी काटने को मजबूर हैं, तब जो सेवक लोगों को मरहम लगाने, सुरक्षित करने के लिए आ रहे हैं, उनसे बड़ा सगा भला कौन है? यह बात किसी से छिपी नहीं है कि भारत में डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी सेवा करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। कौन ऐसा असभ्य है, जो यह सच नहीं जानता? हम इन सेवकों का भरोसा तोड़ देंगे, तब कौन हमारी सेवा के लिए आगे आएगा? आज कौन ऐसा है, जो डॉक्टरों से सेवा लिए बगैर पला-बढ़ा है? कौन हैं वे लोग, जिन्हें उनके अभिभावकों, उपदेशकों ने डॉक्टरों का सम्मान करना नहीं सिखाया है? कौन हैं वे लोग, जो दुनिया और समाज से इतने कटे हुए हैं कि उन्हें अपने भविष्य और अपनी कारस्तानी से बन रही असभ्य दुनिया की कोई परवाह नहीं है? सेवा को पत्थर मारने वालों ने आज पूरी सभ्यता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। 
हमें भूलना नहीं चाहिए, कई ऐसे वन्य-जीव अभयारण्य हैं, चिड़िया घर हैं, जहां वन्य-जीव भी अपने डॉक्टरों और उनके वाहन तक को पहचानते हैं। हमारे घरों में भी ऐसे पालतू जीव हैं, जो सेवा व व्यवहार का अर्थ जानते हैं। आज कोरोना काल ने हमें सेवा और यथोचित व्यवहार पर फिर से सोचने के लिए विवश कर दिया है। जिन इलाकों से ऐसे हमलावर निकल रहे हैं, उन इलाकों को विशेष रूप से चिह्नित करने की जरूरत है, ताकि इंसानियत को लगी असली बीमारी का माकूल इलाज हो सके। हमें देखना होगा कि इंदौर से संभल तक वे कौन से इलाके हैं, जहां सेवा का मोल नहीं समझा गया है? उन इलाकों में कौन लोग हैं, जो वहां के समाजों को निर्देशित-संचालित करते हैं? वहां के जन-प्रतिनिधि कौन हैं? ऐसे इलाकों के तमाम सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक कर्णधारों को मानव सभ्यता का पाठ सबसे पहले पढ़ना होगा, ताकि वे अपने लोगों को समस्या नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा बनाएं। 

भारत में इस असभ्यता का एक दूसरा पहलू भी है, जिसकी समीक्षा सरकारी तंत्र को करनी चाहिए। ऐसे इलाकों में विशेष रूप से पुलिस व अधिकारियों की जिम्मेदारी ज्यादा है। गौर करना होगा कि लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? सिरफिरों का इलाज तो जेल में हो, पर अविश्वास का इलाज स्थानीय शासन-प्रशासन को अलग ढंग से करना होगा। एक लोकतंत्र में सरकारी सुविधाएं और आर्थिक मदद नागरिकों का हक है, उन्हें दया या हिकारत का पात्र नहीं समझा जाना चाहिए। समय और धूप जब ज्यादा सताने लगे, तब ताड़ की तरह तन जाने का नहीं, बल्कि अपने पूरे फल और घने साये के साथ झुक आने का समय है।
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