27-04-2020


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                      10 MIN EDITORIAL DICTATION   27-04-2020
देश के विकास में राजमार्गों की बड़ी भूमिका होती है, उनके सहारे ही देश दौड़ता है। लेकिन अगर देश की रीढ़ जैसे जरूरी राजमार्गों पर भारतीयों को हर साल 48 हजार करोड़ रुपये की रिश्वत अदा करनी पड़ती है, तो यह न केवल दुखद, बल्कि शर्मनाक भी है। सड़क सुरक्षा की पैरोकारी करने वाले संगठन सेफ लाइफ फाउंडेशन (एसएलएफ) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, राजमार्गों पर रिश्वत लेने में स्थानीय पुलिस भी आगे है।
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, 48 हजार करोड़ रुपये की रिश्वत तो सिर्फ व्यावसायिक वाहनों को चुकानी पड़ती है। यदि इसमें राजमार्गों पर चलने वाले अन्य प्रकार के वाहनों को भी जोड़ दिया जाए, तो राजमार्गों पर वसूली जा रही कुल रिश्वत की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। कौन हैं ये रिश्वतखोर, और कौन हैं, जो इन रिश्वतखोरों को पाल रहे हैं? राष्ट्रीय विकास और ईमानदारी की बुनियाद में छेद करने वाले लोग कौन हैं? राजमार्गों पर देश की विकासशील संपन्नता पर डाका डालने वाले लोग कौन हैं

राजमार्गों की बड़ी कमजोरी की पोल खोलती यह रिपोर्ट बताती है कि विगत एक दशक में राजमार्गों पर चल रही रिश्वतखोरी के मामलों में 120 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह एक आम धारणा रही है कि डिजिटल दौर में रिश्वतखोरी घटेगी, लेकिन सर्वे से सामने आई जमीनी हकीकत इसके विपरीत बयान कर रही है। एक अन्य धारणा यह भी है कि जगह-जगह सीसीटीवी कैमरों के कारण भी रिश्वतखोरी घटेगी, लेकिन शायद यहां भी नाकामी हाथ लगी है।
डिजिटल और सीसीटीवी का कोई लाभ न होना हमें ही नहीं, सरकार को भी सोचने पर विवश करे, तो ही बात बनेगी। सरकार को अपने स्तर पर इस रिपोर्ट की जमीनी पड़ताल करनी चाहिए। रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि राजमार्गों पर कथित धार्मिक वजहों और चंदे के नाम पर ड्राइवरों से पैसे वसूलने वालों की भी कोई कमी नहीं है।
यह रिपोर्ट वसूली के विस्तार में जाकर बताती है कि स्थानीय पुलिस जहां रिश्वत के रूप में हर साल 22,000 करोड़ रुपये लेती है, वहीं क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) के अधिकारी सालाना 19,500 करोड़ रुपये की रिश्वत वसूल लेते हैं। जाहिर है, इतनी भारी रिश्वत की कीमत देश अपने पिछड़ेपन से और देश के लोग महंगाई भुगतकर चुकाते हैं। इस स्याह सच की पड़ताल सरकार को जरूर करनी चाहिए। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, 25 फरवरी को राजस्थान में एक बस अनियंत्रित होकर नदी में जा गिरी और 24 लोग मारे गए।
पता यह चला कि बस के कागज पूरे नहीं थे, वह अवैध रूप से दौड़ रही थी। यहां यह स्वाभाविक सवाल पैदा होता है कि क्या बिना रिश्वत ऐसी बसों या वाहनों का चलना मुमकिन है? क्या ऐसी सिलसिलेवार दुर्घटनाओं के बावजूद परिवहन विभाग के अफसरों और पुलिस की मोटी चमड़ी का कभी इलाज हुआ है? यदि इस आर्थिक-सामाजिक महामारी का सही इलाज होता, तो यह नौबत ही नहीं आती।  

यह बात छिपी नहीं है कि राजमार्गों की गुणवत्ता सुधरी है। नए-नए राजमार्ग बन रहे हैं, लगातार चौड़े हो रहे हैं। लोगों को परिवहन में पहले की तुलना में सहूलियत भी हो रही है, लेकिन अगर राजमार्गों पर रिश्वत की वसूली बढ़ी है या जारी भी है, तो कहना न होगा कि राजमार्गों की गुणवत्ता बढ़ने का यह दावा बेमानी है। 

बहुत से लोग इन दिनों परेशानी का कारण बने हुए हैं। वे लोग, जो लॉकडाउन का अनुशासन नहीं मान रहे और छोटे-मोटे काम या महज घूमने के लिए घर से निकलकर सड़क पर आ जाते हैं। या वे लोग, जो सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल नहीं रखते। सड़क, गली, बाजार, मंडी, कहीं भी भीड़ बना लेते हैं। लॉकडाउन जब लागू हुआ था, तब बहुत सारे विस्थापित मजदूर और दिहाड़ी पर काम करने वाले अपने-अपने घर-गांव जाने के लिए निकल पड़े। बस अड्डों और स्टेशनों पर भीड़ लग गई। इतनी भीड़ कि सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन की अवधारणाएं धूल चाटती दिखाई दीं। उस समय हमारे पास उन्हें कोसने के लिए बहुत सारी चीजें थीं। उनकी आर्थिक स्थिति से जुड़ी समस्या तो सभी स्वीकार कर रहे थे, लेकिन आम सोच यही थी कि इनमें से ज्यादातर लोग अशिक्षित हैं। जो शिक्षित हैं, वे भी ज्यादा समझदार नहीं हैं, इसीलिए इस तरह की नौबत आई है। कुछ टिप्पणियां ऐसी भी थीं कि भारत के लोग नहीं सुधर सकते। इस तरह की बातों की पीछे धारणा यह रहती है कि अगर लोग ठीक से पढे़-लिखें और समझदार हों, तो ऐसी हरकत नहीं करेंगे। यह भी मान लिया जाता है कि ऐसा सिर्फ भारत जैसे देश में ही हो सकता है, विकसित देशों में इसकी उम्मीद नहीं है। क्या वाकई ऐसा है?
बाकी दुनिया में हालात क्या हैं, इसे जानना हो, तो सबसे अच्छा उदाहरण अमेरिका है। एक ऐसा देश, जो महाशक्ति तो है ही, वहां न तो भारत की तरह गरीबी है और न अशिक्षा। कोरोना वायरस के संक्रमण से इस समय जो देश सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, उनमें अमेरिका भी है। दिक्कत यह है कि वहां संक्रमण काफी तेजी से फैल रहा है और कहा जा रहा है कि इसकी वजह से एक लाख से ज्यादा लोगों की जान जा सकती है। जब इतना बड़ा खतरा हो, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि लोग जिम्मेदारी भरा व्यवहार करेंगे। पिछले दिनों अमेरिका की चिकित्सा संस्था गुडआरएक्स के शोध प्रमुख थॉमस गोएट्ज और उनके सहयोगी मैट मेहोबी ने एक सर्वेक्षण किया। उन्होंने 22 मार्च के बाद लॉकडाउन वाले राज्यों के करीब एक लाख लोगों से बात की। उन्होंने पाया कि अमेरिका के 15 फीसदी से ज्यादा लोगों को यह पता ही नहीं था कि लॉकडाउन का जो आदेश दिया गया है, यह उनके लिए ही है, या उन्हें इसका पालन करना है। कुछ राज्यों में तो 50 फीसदी लोगों ने ऐसे आदेश पर ध्यान नहीं दिया। वे जान-बूझकर लॉकडाउन का उल्लंघन नहीं कर रहे थे, बल्कि वे इसके बारे में जानते ही नहीं थे। लोगों को घर पर ही रहना है और बाहर नहीं निकलना है, यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया था। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि अमेरिका जैसे सूचना-तकनीकी पर हर तरह से निर्भर समाज में यह लोगों तक नहीं पहुंच पाया होगा। दरअसल, यह संदेश तो लोगों तक पहुंचा, लेकिन बहुत सारे लोगों ने इस पर कान ही नहीं दिए।
अगर किसी समृद्ध समाज में लोग अपनी निजी जिंदगी और अपने नागरिक अधिकारों के साथ इतने मस्त हैं कि उन्हें खतरे की चेतावनियों तक पर ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं होती, तो उस सभ्यता के बारे में कई चीजें फिर से सोची जानी चाहिए। इसके विपरीत भारत को देखें, जहां यह चेतावनी करोड़ों लोगों ने सुनी और समझी कि महामारी का खतरा है और वे जान बचाने के लिए अपने गांव की ओर निकल पडे़।1086



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