24-04-2020 HINDI EDITORIAL
वैसे तो यह दौर पूरी दुनिया पर भारी है, लेकिन अगर देश की सीमाओं के भीतर देखें, तो गुजरा एक महीना शायद आजाद भारत का सबसे कठिन समय रहा है। 22 मार्च को जनता कफ्र्यू अगर एक पूर्वाभ्यास था, तो इसके एक दिन बाद ही लॉकडाउन की घोषणा उस अग्निपरीक्षा की शुरुआत थी, जो अभी भी जारी है और हम नहीं जानते कि इसे और कब तक निभाना पडे़गा। कोरोना वायरस की आपदा से देश को बचाने का दबाव इतना बड़ा था कि पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन करना पड़ गया। अचानक आन पडे़ इस संकट ने कई परेशानियां खड़ी कीं, लेकिन इसकी उपलब्धियां भी कम नहीं हैं। यह सच है कि हम लॉकडाउन के इस एक महीने में कोरोना वायरस के संक्रमण को पूरी तरह रोकने में कामयाब नहीं हो सके, लेकिन उसके आगे एक गतिरोधक जरूर खड़ा कर दिया। दुनिया के तमाम विकसित देशों जैसी चिकित्सा सुविधाएं न होने के बावजूद हम उन देशों की तरह संकट में गले तक डूबने से बच जरूर गए। कम से कम हमने कोरोना संक्रमण को दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ने वाली वृत्ति से काफी पीछे रखने में सफलता जरूर हासिल की। आग को भले ही हम पूरी तरह न रोक सके हों, लेकिन विस्फोट को दबाने में हम कामयाब जरूर रहे। खतरा हालांकि अभी भी बरकरार है, इसलिए यह सफलता फिलहाल बहुत मायने नहीं रखती, लेकिन अगर हम इसमें भी असफल होते, तो इससे बुरा शायद कुछ और नहीं होता।
पिछले एक महीने के लॉकडाउन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह सफलता नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मोटे तौर पर पूरे देश ने मौके की नजाकत को समझा और लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग के अनुशासन में अपना पूरा सहयोग भी दिया। बेशक इसके ढेर सारे अपवाद भी गिनाए जा सकते हैं। कुछ जगह परले दर्जे की अनुशासनहीनता भी दिखी, कई जगह बेवजह की अफरा-तफरी हुई, कुछ एक हिंसा की घटनाएं भी। और सबसे निंदनीय चीज यह भी हुई कि कुछ जगहों पर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले किए गए। मामला इतना चिंताजनक हो गया कि सरकार को उनकी सुरक्षा के विशेष प्रावधान करने पडे़। ये घटनाएं खबरों में छाई भी रहीं, लेकिन अगर पूरे देश के स्तर पर इन्हें देखें, तो इनकी संख्या बहुत बड़ी भी नहीं है। बल्कि अगर अमेरिका या यूरोपीय देशों से तुलना करें, तो इस दौरान भारत की जनता ने लॉकडाउन का ज्यादा गंभीरता से पालन किया है। जहां तक यूरोप की बात करें, तो वहां सिर्फ अफवाहों के चलते लोगों ने कई सारे 5-जी टॉवर तोड़ डाले थे। भारत के लिए एक बड़ी बात यह भी रही कि संकट की इस घड़ी में पक्ष-विपक्ष, सभी राजनीतिक दल एक साथ खड़े दिखाई दिए।
लॉकडाउन अभी जारी है, इसकी दूसरी मियाद खत्म होने में अभी कुछ दिन शेष हैं। शायद सभी जगह पूर्ण लॉकडाउन को मौजूदा स्वरूप में और बढ़ाना अब संभव न हो, लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि अगले दस या पंद्रह दिनों में खतरा पूरी तरह से टल जाएगा, इसकी संभावनाएं अभी नजर नहीं आ रहीं। इसलिए अगर कुछ राहत दी भी जाए, तो इस तरह देनी होगी कि हालात किसी सूरत विस्फोटक न बनने पाएं। पहली प्राथमिकता अभी भी संक्रमण को रोकना है, सरकार और जनता, सभी के लिए यह समय अपने धैर्य को विस्तार देने का है।
पिछले एक महीने के लॉकडाउन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह सफलता नहीं है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मोटे तौर पर पूरे देश ने मौके की नजाकत को समझा और लॉकडाउन व सोशल डिस्टेंसिंग के अनुशासन में अपना पूरा सहयोग भी दिया। बेशक इसके ढेर सारे अपवाद भी गिनाए जा सकते हैं। कुछ जगह परले दर्जे की अनुशासनहीनता भी दिखी, कई जगह बेवजह की अफरा-तफरी हुई, कुछ एक हिंसा की घटनाएं भी। और सबसे निंदनीय चीज यह भी हुई कि कुछ जगहों पर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमले किए गए। मामला इतना चिंताजनक हो गया कि सरकार को उनकी सुरक्षा के विशेष प्रावधान करने पडे़। ये घटनाएं खबरों में छाई भी रहीं, लेकिन अगर पूरे देश के स्तर पर इन्हें देखें, तो इनकी संख्या बहुत बड़ी भी नहीं है। बल्कि अगर अमेरिका या यूरोपीय देशों से तुलना करें, तो इस दौरान भारत की जनता ने लॉकडाउन का ज्यादा गंभीरता से पालन किया है। जहां तक यूरोप की बात करें, तो वहां सिर्फ अफवाहों के चलते लोगों ने कई सारे 5-जी टॉवर तोड़ डाले थे। भारत के लिए एक बड़ी बात यह भी रही कि संकट की इस घड़ी में पक्ष-विपक्ष, सभी राजनीतिक दल एक साथ खड़े दिखाई दिए।
लॉकडाउन अभी जारी है, इसकी दूसरी मियाद खत्म होने में अभी कुछ दिन शेष हैं। शायद सभी जगह पूर्ण लॉकडाउन को मौजूदा स्वरूप में और बढ़ाना अब संभव न हो, लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि अगले दस या पंद्रह दिनों में खतरा पूरी तरह से टल जाएगा, इसकी संभावनाएं अभी नजर नहीं आ रहीं। इसलिए अगर कुछ राहत दी भी जाए, तो इस तरह देनी होगी कि हालात किसी सूरत विस्फोटक न बनने पाएं। पहली प्राथमिकता अभी भी संक्रमण को रोकना है, सरकार और जनता, सभी के लिए यह समय अपने धैर्य को विस्तार देने का है।
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