20 april editorial dictation hindi
Steno help pp
Good morning editorial dictation
आज अगर यह कहा जाए कि दुनिया में विज्ञान पर सर्वाधिक चुनौतियां
मंडरा रही हैं, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मनुष्य की व्यापक
सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी विज्ञान पर ही है। ऐसे वैज्ञानिक चाहिए, जो हमें असमय बारिश, आंधी, भूकंप व अन्य जलजलों से बचा सकें; जो हमें
महामारियों से बचा सकें। भारत की चर्चा करें, तो अनेक
इलाकों में खेतों में खड़ी फसल पर बारिश की जो मार पड़ी है, क्या विज्ञान के अलावा किसी के पास इसका उपचार था? क्या मौसम के बिगड़ते मिजाज को समझने में हम नाकाम होने लगे हैं? कहीं न कहीं हम अपनी बुनियादी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले
रहे हैं। क्या हमारे वैज्ञानिकों का ध्यान उपभोक्तावादी वस्तुओं और सेवाओं के
निर्माण में ज्यादा है और मूलभूत आपदाओं का उपचार खोजने पर कम ध्यान दिया जा रहा
है? भारत की बात करें, तो महामारी के बीच बिगड़ते मौसम की चुनौती भी एक मौका है, जब विज्ञान की प्राथमिकताओं पर विचार करना होगा।यह बहस
अमेरिका में भी चल रही है कि विज्ञान की प्राथमिकताओं को आखिर कौन तय करता है? इसमें कोई शक नहीं कि विज्ञान की प्राथमिकताएं समकालीन सत्ता या
राजनीति ही तय करने लगी हैं। एक समय था, जब केवल लोगों
की जरूरत के हिसाब से विज्ञान चलता था, लेकिन अब
राजनीति के हाथ में बागडोर है। वर्तमान महाशक्ति अमेरिका का विज्ञान हो या
महाशक्ति होने को आतुर चीन का विज्ञान, दोनों की ही
दिशा वहां की राजनीति तय कर रही है। विशेषज्ञ परेशान हैं कि राजनीति की
प्राथमिकताएं बाजार तय करने लगा है। दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिए विज्ञान
और राजनीति के बीच समन्वय पर सर्वाधिक चर्चा अमेरिका में ही हो रही है। अनुसंधानों
को साझा करने, विज्ञान को अधिक खुला बनाने, अधिक कुशल और सहयोगी बनाने पर विचार तेज हुआ है, तो इसका सभी को स्वागत करना चाहिए। इसके लिए दुनिया में राजनीति
और वैज्ञानिक चिंतन का तरीका बदलना पड़ेगा। इसमें शक नहीं कि दुनिया को विज्ञान के
देश अमेरिका से ही सर्वाधिक उम्मीदें हैं, लेकिन वह जिस
तरह से कोरोना के जाल में फंसा है, उससे दुनिया
की चिंता बढ़ी है। कोरोना अनुसंधान की ही अगर चर्चा करें, तो चीन ने जिस तरह से सूचनाओं की जमाखोरी की है, उससे सर्वाधिक विचलित अमेरिका और उसके वैज्ञानिक हैं।
वैज्ञानिकों की दुनिया में एक चिंता यह भी है कि कोरोना के दौर में कहीं सूचनाओं
को छिपाने की अमानवीय परंपरा की बुनियाद मजबूत न हो जाए। कोरोना की सर्वाधिक मार
झेल रहा अमेरिका जो कीमत चुका रहा है, संभव है कि
उसका राजनीतिक नेतृत्व और ज्यादा स्वार्थी या राष्ट्रवादी होकर उभरे। दुनिया के वैज्ञानिक सर्वाधिक चिंतित हैं।
आश्चर्य नहीं, रिसर्चगेट जैसे पेशेवर नेटवर्क उभर आए हैं, जो दुनिया में खुले अनुसंधान की वकालत कर रहे हैं। ऐसे
व्यावहारिक और आशावादी वैज्ञानिक मंचों की आज जरूरत है, ताकि हम विज्ञान द्वारा विश्व को बेहतर बनाने के लिए मिलकर काम
कर सकें। जब कोई आपदा या महामारी भौगोलिक सीमाओं को नहीं मान रही है, तब विज्ञान को ऐसी सीमाओं का आदर क्यों करना चाहिए? जरूरी है, बदलते समय के साथ
विज्ञान व उसकी संस्कृति भी बदले, ताकि किसी भी
महामारी या आपदा का समाधान दुनिया भर के वैज्ञानिक परस्पर समन्वय और मित्र भाव से
खोज सकें।527words
Comments
Post a Comment