22-04-2020
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22-04-20
तेल दुनिया में आज एक ऐसा इतिहास लिख रहा है, जिसके बारे में सोचा भी नहीं गया था। आधुनिक अर्थव्यवस्था
में यह बात निर्विवाद मानी गई थी कि तेल या ईंधन एक ऐसा उत्पाद है, जिसका भाव कभी कम नहीं होगा। जब तक तेल है, उसके कारोबारियों को ग्राहकों के लिए कहीं भटकना नहीं
पड़ेगा। लेकिन अफसोस, कोरोना वायरस ने एक ऐसी दुनिया रच दी है, जहां तेल की कीमत शून्य हो गई है। अमेरिका में कच्चा तेल
फूटी कौड़ी के भाव से भी नहीं बिक रहा है। बेचना मजबूरी है, क्योंकि सारे तेल भंडार लबालब हैं। तेल निकालने की गति बनी
हुई है, ऐसे में, निकल रहे तेल को
रखना एक मुसीबत है। यह कैसी दुनिया का संकेत है? क्या कोरोना के
कारण तेल और तेल बेचने वालों की बादशाहत खत्म हो गई है? दुनिया के किसी कोने में तेल की कीमत शून्य हो गई है, तो इसका मतलब यह भी नहीं है कि लोग खुश हो जाएं। अव्वल तो
तेल के भाव में ऐसी कमी का अभी कोई लाभ सीधे आम ग्राहकों तक नहीं पहुंचने वाला, लेकिन यह जरूर है कि अगर यह गिरावट कायम रही, तो इसकी कीमत आखिरकार ग्राहकों को चुकानी पड़ेगी। अभी तेल का
बाजार भाव बना रहेगा। अभी तेल की व्यावहारिक कीमत 20 डॉलर प्रति बैरल
बनी हुई है और यह बनी रहनी भी चाहिए, वरना तेल उत्पादक
देश-दुनिया की मुश्किलें और अधिक गंभीर बढ़ जाएंगी।
हालांकि इसका एक पक्ष यह भी है कि अमेरिका तेल दोहन का प्रबंधन ठीक से नहीं कर पा रहा है। जब पूरी दुनिया में लॉकडाउन से तेल की खपत एकदम कम हो गई है, तब उसका दोहन भी कुछ समय तक रोक देना चाहिए था। ऐसा नहीं होना चाहिए कि धरती पर तेल रखने की जगह नहीं है और हम धरती के नीचे से तेल निकाले चले जा रहे हैं। अमेरिका को तेल का मूल्य समझना चाहिए, तेल को ऐसा उत्पाद नहीं बनने देना चाहिए कि उसे बिना मोल फेंकना पड़े, जैसे टमाटर या अन्य उपज की अधिकता होने पर किसान करते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कर्णधारों को यह सलाह दी जा रही है कि तेल का भाव बना रहे। उसके बने रहने से ही अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों की मजबूती बनी रहेगी।
इधर, भारत में शेयर भावों में गिरावट का रुख भी ठीक नहीं है। भारत को केवल विदेशी शेयर बाजार से जोड़कर देखना ठीक नहीं। विकसित और बूढ़े होते देशों के सूचकांक की तुलना युवा भारत के सूचकांक से जितनी कम हो, उतना अच्छा है। भारत में शेयर बाजार का नकारात्मकता के साथ खुलना और वैसे ही बंद हो जाना ज्यादा समय तक नहीं चलना चाहिए। भारत सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, उस पर लगभग सवा अरब लोगों की जिम्मेदारी है। तेल और शेयर बाजार, दोनों ही हमारे लिए चिंता के विषय हैं। कोरोना के दौर में भारतीय कंपनियों का बाजार भाव करीब 30 प्रतिशत तक कम हो गया है। केवल फार्मा कंपनियां ही ठीक कारोबार कर रही हैं। अच्छा है, भारतीय कंपनियों ने 20 अप्रैल से सामान्य कारोबार की ओर लौटने की शुरुआत की है। कंपनियों की दुनिया में यह एक नए तरह का शैशव काल है, जिसमें जिसमें तेल व शेयर भाव की भारी गिरावट से डरने की बजाय संभलकर बढ़ते जाने में भलाई है। घबराहट की बजाय सावधानी जरूरी है। चाक-चौबंद होकर खुद को धीरे-धीरे मजबूत करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि दुनिया हमें उम्मीद से देख रही है।
हालांकि इसका एक पक्ष यह भी है कि अमेरिका तेल दोहन का प्रबंधन ठीक से नहीं कर पा रहा है। जब पूरी दुनिया में लॉकडाउन से तेल की खपत एकदम कम हो गई है, तब उसका दोहन भी कुछ समय तक रोक देना चाहिए था। ऐसा नहीं होना चाहिए कि धरती पर तेल रखने की जगह नहीं है और हम धरती के नीचे से तेल निकाले चले जा रहे हैं। अमेरिका को तेल का मूल्य समझना चाहिए, तेल को ऐसा उत्पाद नहीं बनने देना चाहिए कि उसे बिना मोल फेंकना पड़े, जैसे टमाटर या अन्य उपज की अधिकता होने पर किसान करते हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कर्णधारों को यह सलाह दी जा रही है कि तेल का भाव बना रहे। उसके बने रहने से ही अर्थव्यवस्था के अन्य घटकों की मजबूती बनी रहेगी।
इधर, भारत में शेयर भावों में गिरावट का रुख भी ठीक नहीं है। भारत को केवल विदेशी शेयर बाजार से जोड़कर देखना ठीक नहीं। विकसित और बूढ़े होते देशों के सूचकांक की तुलना युवा भारत के सूचकांक से जितनी कम हो, उतना अच्छा है। भारत में शेयर बाजार का नकारात्मकता के साथ खुलना और वैसे ही बंद हो जाना ज्यादा समय तक नहीं चलना चाहिए। भारत सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, उस पर लगभग सवा अरब लोगों की जिम्मेदारी है। तेल और शेयर बाजार, दोनों ही हमारे लिए चिंता के विषय हैं। कोरोना के दौर में भारतीय कंपनियों का बाजार भाव करीब 30 प्रतिशत तक कम हो गया है। केवल फार्मा कंपनियां ही ठीक कारोबार कर रही हैं। अच्छा है, भारतीय कंपनियों ने 20 अप्रैल से सामान्य कारोबार की ओर लौटने की शुरुआत की है। कंपनियों की दुनिया में यह एक नए तरह का शैशव काल है, जिसमें जिसमें तेल व शेयर भाव की भारी गिरावट से डरने की बजाय संभलकर बढ़ते जाने में भलाई है। घबराहट की बजाय सावधानी जरूरी है। चाक-चौबंद होकर खुद को धीरे-धीरे मजबूत करते हुए हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि दुनिया हमें उम्मीद से देख रही है।
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