28april 2020 editorial dictation


कोविड-19 के खिलाफ छिड़ी जंग में प्लाज्मा थेरेपी की इन दिनों खूब चर्चा है, तो कोई आश्चर्य नहीं। दिल्ली व केरल के कुछेक अस्पतालों में प्लाज्मा थेरेपी से उपचार के अनुकूल संकेत मिले हैं, जिनका हमें न केवल स्वागत, बल्कि चिकित्सकीय परीक्षण भी जारी रखना चाहिए। चूंकि कोविड-19 नई बीमारी है, इसलिए इलाज की प्लाज्मा पद्धति को सोलह आना सटीक सिद्ध करने में वक्त लग सकता है। इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने कोरोना के इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी को सीमित मंजूरी दे रखी है, मगर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने इसे मान्यता नहीं दी है। इस पद्धति से ठीक होने वालों का ऐसा उच्च प्रतिशत चाहिए, जो डॉक्टरों को आश्वस्त कर सके। अभी इस पर सफलता की मुहर नहीं लगी है, हां, उपलब्ध संकेत अच्छे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी स्वयं आगे आकर बताया है कि प्लाज्मा थेरेपी का लाभ लेने वाले मरीजों की सांस की गति भी सुधरी है, और ऑक्सीजन स्तर भी। 
वैसे प्लाज्मा थेरेपी कोई नई तरक्की नहीं है। करीब 70 वर्ष से चली आ रही इस थेरेपी का हाल के वर्षों में सार्स, स्वाइन फ्लू, इबोला जैसी बीमारियों में भी प्रयोग हुआ है। कोरोना के इलाज में भी यह पद्धति सफल होती है, तो कोरोना संक्रमण से उबरने वाले लोग ही इस महामारी के विरुद्ध युद्ध में सबसे ज्यादा काम आएंगे। ठीक हो चुके लोगों के शरीर में मौजूद कोरोना का अंत करने वाले एंटीबॉडी तत्व ही इसकी दवा का काम करने लगेंगे। 
जिस प्लाज्मा की ओर हम उम्मीद से देख रहे हैं, वह हमारे रक्त का ही एक हिस्सा है। आम तौर पर रक्तदान चार तरह के होते हैं, सामान्य रक्तदान, लाल रक्त कोशिका दान, प्लेटलेट दान और प्लाज्मा दान। प्लाज्मा का इस्तेमाल किसी के जलने, सदमे में होने, आघात और अन्य अनेक चिकित्सा आपात स्थितियों के समय नया जीवन देने के लिए किया जाता है। प्लाज्मा हमारे रक्त का सबसे बड़ा हिस्सा है। हल्का पीला तरल प्लाज्मा एंटीबॉडी के साथ पानी, लवण, एंजाइम और कुछ अन्य तत्वों को वहन करता है। प्लाज्मा की मुख्य भूमिका पोषक तत्वों, हार्मोन और प्रोटीन को शरीर के उन हिस्सों में ले जाना है, जहां उनकी जरूरत है। ऐसे में, कोरोना के जो मरीज बहुत विकट स्थिति में पहुंच गए हैं, उनको बल देने में प्लाज्मा की भूमिका निस्संदेह होगी, लेकिन कितनी होगी, यह लगातार परीक्षण से ही पता चलेगा। यहां एक सहज सवाल है, किसी उपचार पद्धति में अगर थोड़ी भी संभावना दिख रही है, तो हम किसी मरीज के विकट स्थिति में पहुंचने का इंतजार क्यों करें? संभव है, समय रहते इस थेरेपी को आजमाया जाए, तो नतीजे ज्यादा कारगर हों। यह सुखद है कि देश में लगभग 6,000 लोग ठीक हो चुके हैं, उनकी मदद से ठीक होने वालों की पूरी शृंखला बनाई जा सकती है। दिलचस्प है कि दुनिया में एबी ब्लड टाइप वाले लोगों की मांग बढ़ जाएगी, क्योंकि उनका प्लाज्मा किसी भी मरीज में काम आ सकता है। बहरहाल, अभी यही साबित नहीं हुआ है कि एक बार जिसे कोरोना हो गया, उसे फिर नहीं होगा, इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने डॉक्टरों को सावधान किया है। वाकई, सावधानी की जरूरत कदम-कदम पर है। लेकिन इतना तय है कि प्लाज्मा थेरेपी के रूप में हमारे तरकश में एक बाण मौजूद है, उम्मीद कीजिए कि यह रामबाण सिद्ध हो।
राजनीति शास्त्र में जीव की तरह राजनीतिक दल भी जैविक माने जाते हैं। मानव चेतना की एक मेडिकल स्थिति होती है कोमाऔर दूसरी वेजिटेटिव स्टेट। कोमा में व्यक्ति सोया लगता है, शरीर व दिमाग प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है, लेकिन सिर्फ रिलेक्स एक्शन ही उसके जिंदा होने की सनद है। चोट लगने पर भी शरीर प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन कभी-कभी अंगुलियां हिलती हैं, सांसें अनियमित रूप से चलती हैं। वेजिटेटिव स्टेट में आंखें खुली होने से चैतन्यता का अहसास तो होता है पर दिमाग के काम न करने के कारण बाहरी दुनिया से असंबद्धता रहती है। मेडिकल विज्ञान के अनुसार इस स्थिति में लिक्विड व ऑक्सीजन चेंबर में होते हैं, लिहाज़ा लिक्विड रोगी को जीने नहीं देता और ऑक्सीजन मरने नहीं देता। कांग्रेस अब इसी स्थिति की ओर जा रही है।
गाहे-बगाहे रिफ्लेक्स एक्शन में अंगुलियां हिलने की तरह चुनावी हार के झटके इसे जीवन में लाने की उम्मीद बंधाते हैं। केंद्रीय नेतृत्व को पहला झटका तब लगा जब असम के एक कद्दावर नेता ने पार्टी छोड़ भाजपा ज्वाइन करते हुए कहा कि मैं तीन दिन बैठा रहा पर दिल्ली नेतृत्व नहीं मिला और एक बार जब बात हुई भी तो उस तरह जिसके बारे में ग़ालिब ने कहा था ये क्या कि तुम कहा किए, और वो कहें कि याद नहीं। असम हाथ से निकल गया।
पहले जनमंचों से पीएम की आलोचना से रिफ्लेक्स एक्शन का अहसास तो होता था, लेकिन जब मध्यप्रदेश की हालत पर प्रतिक्रिया तो दूर, नेतृत्व ने मुख्यमंत्री से ही नहीं, दूसरे सबसे कद्दावर युवा नेता से मिलने से इनकार कर दिया तब लगा कि शायद पार्टी नेतृत्व की आंखें खुली हैं पर बाहरी दुनिया का अहसास नहीं है। राज्य में दोनों नेताओं की लड़ाई इस हालत में इसलिए पहुंची कि नेतृत्व ने प्रभावी अंकुश नहीं लगाया।
1970 के दशक के मध्य एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने कई बार मुख्यमंत्रियों को अलसुबह बुलवाकर मिलने की जगह किसी पीए से कहलवा दिया कि इस्तीफा दे दो, लेकिन आज यह व्यवहार इसलिए सफल नहीं होगा कि बगल में दूसरा राजा, जिसकी ताकत और प्रसिद्धि भी कई गुना ज्यादा है, उसे बड़ा मंसब देने को तैयार है। नेतृत्व इस बात से भी गाफिल है कि अगला नंबर राजस्थान का हो सकता है। जनता यह अहसास दिला रही है कि 135 साल पुरानी पार्टी की जिंदगी के लिए जरूरी ऑक्सीजन तो है पर लिक्विड संकट पैदा कर रहा है।
अगर किसी समृद्ध समाज में लोग अपनी निजी जिंदगी और अपने नागरिक अधिकारों के साथ इतने मस्त हैं कि उन्हें खतरे की चेतावनियों तक पर ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं होती, तो उस सभ्यता के बारे में कई चीजें फिर से सोची जानी चाहिए। इसके विपरीत भारत को देखें, जहां यह चेतावनी करोड़ों लोगों ने सुनी और समझी कि महामारी का खतरा है और वे जान बचाने के लिए अपने गांव की ओर निकल पडे़1007words

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