30 april 2020 editorial dictation 100wpm


अपनी अनुपम सहजता से अभिनय का वैभव गढ़ने वाले अभिनेता इरफान की विदाई न केवल मनोरंजन उद्योग, बल्कि भारतीय समाज के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है। अभी गत शनिवार को ही जयपुर में उनकी मां सईदा बेगम का निधन हुआ था और बुधवार को इरफान भी हमारे बीच से चले गए। उनके जाने से फिल्मों की दुनिया में स्वाभाविक ही जो शोक की लहरें उठी हैं, वे कुछ दिनों तक उनके मुरीदों को खूब भिगोएंगी। बहुत याद आएंगे इरफान और टीवी धारावाहिक श्रीकांत  व भारत एक खोज  से शुरू हुआ उनका पेशेवर कला जीवन। इरफान अभिनय के प्रति जुनून वाले अभिनेता थे, इसलिए उनके शुरुआती काम को देखकर ही लग गया था कि वह कला-दुनिया में दूर और ऊंचाई तक जाएंगे। प्रतिकूल पारिवारिक पृष्ठभूमि के बावजूद जयपुर से एक हठ के साथ निकले और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षित इरफान ने मनोरंजन की दुनिया में इतना लंबा सफर तय किया कि वह हमेशा एक मिसाल रहेंगे। अव्वल तो यह दूरदर्शन या छोटे परदे के लिए भी हमेशा गर्व की बात रहेगी कि उसने अपने शुरुआती दौर में एक ऐसे कलाकार को मौका दिया, जो आगे चलकर न केवल भारतीय सिनेमा, बल्कि वैश्विक सिनेमा का एक चमकदार चेहरा बना। 
भारतीय सिनेमा की दुनिया में इरफान जैसे उर्वर अभिनेता को परखने और उनसे सीखने की जरूरत हमेशा रहेगी। बेशक, इरफान की सबसे बड़ी पूंजी उनकी आंखें रहीं। कुछ उभरी हुई, बड़ी-बड़ी आतुर आंखें, जो उनकी भाव प्रबलता को आसानी से सरेआम कर देती थीं। उन्होंने फिर एक बार सिद्ध किया कि कद-काठी कुछ खास मायने नहीं रखती। चॉकलेटी और पहलवान होना भी जरूरी नहीं है। जो भी है, आपके अंदर है, वही सात्विक अभिनय के रूप में बाहर आना चाहिए। भारत में ऐसे आला दर्जे के मेथड एक्टर बहुत कम हैं, जो यह आभास नहीं होने देते कि वे अभिनय कर रहे हैं। खासकर 2001 में बनी द वॉरियर से लेकर अंग्रेजी मीडियम  (2020) तक इरफान के अभिनय का शानदार सफर हमेशा काबिले-गौर रहेगा। न जाने कितनी भूमिकाओं को उन्होंने परदे पर जीवंत कर दिया, इनमें पान सिंह तोमर  एक ऐसी फिल्म है, जो हमेशा कालजयी फिल्मों में गिनी जाएगी। 
यह बेहिचक स्वीकार करना चाहिए कि एक अभिनेता के रूप में उनकी सहजता हिंदी सिनेमा के अलग-अलग खेमों या पहलुओं के बीच के अंतर को मिटा देती थी। हिंसा का प्रदर्शन हो या प्रेम का, अमीरी का प्रदर्शन हो या गरीबी का, क्रोध में उतरना हो या हास्य में, इरफान हर जगह मिसाल कायम करके ही लौटते थे। पुरस्कारों की बात करें, तो ऐसा दौर आ चुका था, जब वह किसी भी तरह के सिनेमा में नजरअंदाज नहीं किए जा सकते थे। मकबूल, हैदर, पीकू, हिंदी मीडियम, द लंच बॉक्स, तलवार, लाइफ ऑफ पाइ, रोग, हासिल  आदि 50 से ज्यादा यादगार फिल्में वह दे गए हैं। अभिनय के लिए चार से ज्यादा फिल्म फेयर अवॉर्ड और एक राष्ट्रीय पुरस्कार वह जीत चुके थे। यह उनके जाने की उम्र नहीं थी। भारत ने एक सच्चा नागरिक खोया है। सांप्रदायिक नफरत के विरुद्ध हमेशा बुलंद रहने वाली उनकी यादगार भोली आवाज गूंजती रहनी चाहिए। भारतीय सिनेमा ने अपना सबसे हरफनमौला आम आदमी खो दिया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों को विभिन्न शहरों में रुके-थमे कामगारों के साथ पर्यटकों और छात्रों को कुछ शर्तों के साथ उनके घर-गांव ले जाने की अनुमति देकर लाखों लोगों को एक बड़ी राहत दी है। ऐसे किसी फैसले की प्रतीक्षा ही की जा रही थी, क्योंकि कई जगह कामगार बेचैन हो रहे थे और कहीं-कहीं तो वे यह मांग भी कर रहे थे कि उन्हेंं उनके घर-गांव जाने दिया जाए। इनमें से कुछ तो लॉकडाउन के चलते कोई काम न होने के कारण अपने घर लौटना चाह रहे थे और कुछ फसल कटाई का काम करने के लिए। एक बड़ी संख्या में ऐसे भी कामगार थे जो भावनात्मक संबल के लिए अपने घर-गांव जाना चाह रहे थे।
चूंकि कुछ राज्यों ने अपने यहां के मजदूरों, छात्रों को लाना शुरू कर दिया था इसलिए दूसरे राज्यों पर भी ऐसा ही करने के लिए दबाव पड़ रहा था। हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कामगारों, छात्रों आदि को लाने-ले जाने के मामले में राज्य सरकारों को कुछ मानकों का पालन करने को कहा है, लेकिन उसे इस पर निगाह रखनी चाहिए कि इन मानकों का पालन वास्तव में हो। न केवल यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कामगारों, छात्रों के रजिस्ट्रेशन के साथ उनका स्वास्थ्य परीक्षण उचित तरीके से हो, बल्कि यह भी कि वे क्वारंटाइन अवधि का पालन सही तरह करें। इसमें थोड़ी सी भी असावधानी ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण के प्रसार का कारण बन सकती है।
ध्यान रहे कि अभी तक ग्रामीण इलाके संक्रमण से बचे हुए हैं। हालांकि अपने घर-गांव लौटे लोगों की निगरानी आरोग्य सेतु एप के जरिये आसानी से हो सकती है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो इस एप से लैस न हों। यदि राज्य सरकारें बेहतर तालमेल कर सकें तो एक राज्य से कामगारों को ले जाने वाली बसें लौटते हुए दूसरे राज्य के कामगारों को अपने यहां या फिर बीच के किसी राज्य ला सकती हैं।
जो भी हो, केंद्र और राज्य सरकारों को इसकी भी चिंता करनी होगी कि अपने-अपने ठिकानों पर लौटने वालों के सामने रोजी-रोटी का संकट न खड़ा होने पाए। इसी तरह उन्हेंं यह भी देखना होगा कि कारोबारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की तैयारी में कामगारों की कमी बाधक न बनने पाए। यह एक तरह का विरोधाभास ही है कि एक ओर कारोबारी गतिविधियां शुरू करने की तैयारी हो रही है और दूसरी ओर कामगारों को उनके गांव-घर पहुंचाने की। सरकारों को इसका आभास होना चाहिए कि जल्द ही इन कामगारों को वापस उनके कार्यस्थलों में पहुंचाने की आवश्यकता संयुक्तराष्ट्र की श्रम इकाई अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन ने कोरोना वायरस महामारी के कारण लोगों की जाने वाली नौकरियों का पूर्वानुमान एक बार फिर से बढ़ा दिया है। संगठन के अनुसार अप्रैल से जून के दौरान महज तीन महीने में ही करीब 30.5 करोड़ लोगों की पूर्णकालिक नौकरियां समाप्त हो सकती हैं। संगठन ने पिछले पूर्वानुमान में कहा था कि इस महामारी के कारण जून तिमाही में हर सप्ताह औसतन 48 घंटे की कार्यअवधि वाले 19.5 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों का नुकसान हो सकता है। संगठन ने कहा कि महामारी पर काबू पाने के लिये दुनिया भर में लॉकडाउन के बढ़ाये जाने से उसे अनुमान में संशोधन करना पड़ा है।पड़ सकती है। इस आवश्यकता की भी कोई रूपरेखा बना ली जाए तो बेहतर।1050


Comments