21-04-2020 EDITORIAL DICTATION
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DAILY EDITORIAL
21-04-2020
कोरोना संक्रमण के इस त्रासद दौर में परस्पर शारीरिक दूरी बरतने
की अनिवार्यता को अगर हम अपने जीवन में नहीं उतार पाए हैं, तो यह न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि समाज के
प्रति अपराध भी है। समाज के जरूरतमंद तबकों को राहत पहुंचाने और आर्थिक मजबूरी की
वजह से लॉकडाउन में कुछ ढील देने का केंद्र सरकार ने जो फैसला किया था, उसकी बिना देरी मुंबई जैसे महानगर में भी धज्जियां उड़ गईं।
दफ्तर में काम करने वाले लोग बसों में पहले की तरह ही आसपास आ बैठे, बैठने की जगह नहीं मिली, तो सीटों के
बीच खड़े हो गए। यात्रा का यह हठ न सिर्फ निंदनीय, बल्कि
आत्मघाती भी है। सवाल बहुत सहज, लेकिन गंभीर है कि
दफ्तर जाने वाले पढ़े-लिखे लोग ऐसे कैसे बैठ गए और किसने उन्हें ऐसे बैठने दिया? उधर, केरल सरकार ने तो कुछ ज्यादा ही ढील देने
की तैयारी कर रखी थी, वहां सिटी बस चलाने की तैयारी के अलावा, सैलून, रेस्तरां, बुक स्टोर, वर्कशॉप खोलने की तैयारी थी। पर समय रहते केंद्र ने आपत्ति जताई, तो केरल सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए। सावधान, खतरा टला नहीं है, पुरजोर मंडरा
रहा है। हम उसे लॉकडाउन से कुछ रोक पा रहे हैं, लेकिन तब भी
खतरा काबू में नहीं है। अब भी लोग कोरोना संक्रमण के दायरे में आ रहे हैं। सावधानी
हटी और दुर्घटना घटी का सिद्धांत अभी भी लागू है। अत: जरूरी है कि परस्पर शारीरिक
दूरी को सुनिश्चित रखा जाए।
गहरे दुख की बात है कि जब जान बचाने के लिए भीड़ को जुटने से रोका जा रहा है, तब महाराष्ट्र के पालघर में तीन लोगों की हत्या के लिए भीड़ जुट गई। पुलिस भी उस हिंसक भीड़ को रोक नहीं पाई। यह भारतीय समाज पर एक नया दाग है। क्या कुछ लोगों के लिए बीमारी से बचना नहीं, बल्कि मात्र संदेह के आधार पर पुलिस की मौजूदगी में निर्दोषों की हत्या कर देना प्राथमिकता है? ऐसी कुंठित, अद्र्धसूचित, अंधविश्वासी भीड़ देश में कहीं और नहीं पल रही होगी, इसकी क्या गारंटी है? यह हमारी सरकारों के लिए भी बड़ी चुनौती है, जब महामारी के समय सभी के लिए अन्न और मन से जुड़ जाने का समय है, तब ऐसे बहुत से लोग हैं, जो वास्तव में बिखरे हुए हैं। ऐसे बिखरे हुए, लापरवाह, असंवेदनशील लोग कब भीड़ में तब्दील हो जाएंगे और कैसी हिंसा को अंजाम दे देंगे, इसका अनुमान भर लगाया जा सकता है।
गहरे दुख की बात है कि जब जान बचाने के लिए भीड़ को जुटने से रोका जा रहा है, तब महाराष्ट्र के पालघर में तीन लोगों की हत्या के लिए भीड़ जुट गई। पुलिस भी उस हिंसक भीड़ को रोक नहीं पाई। यह भारतीय समाज पर एक नया दाग है। क्या कुछ लोगों के लिए बीमारी से बचना नहीं, बल्कि मात्र संदेह के आधार पर पुलिस की मौजूदगी में निर्दोषों की हत्या कर देना प्राथमिकता है? ऐसी कुंठित, अद्र्धसूचित, अंधविश्वासी भीड़ देश में कहीं और नहीं पल रही होगी, इसकी क्या गारंटी है? यह हमारी सरकारों के लिए भी बड़ी चुनौती है, जब महामारी के समय सभी के लिए अन्न और मन से जुड़ जाने का समय है, तब ऐसे बहुत से लोग हैं, जो वास्तव में बिखरे हुए हैं। ऐसे बिखरे हुए, लापरवाह, असंवेदनशील लोग कब भीड़ में तब्दील हो जाएंगे और कैसी हिंसा को अंजाम दे देंगे, इसका अनुमान भर लगाया जा सकता है।
आज आधा देश कोरोना से सुरक्षित हो गया है। देश के 57 जिलों में पिछले 14 दिनों में संक्रमण का एक भी नया मामला सामने नहीं आया है, लेकिन इन आंकड़ों से अभिभूत होकर कोरोना से बचने की अनिवार्य शर्त को भूलना नहीं चाहिए। परस्पर शारीरिक दूरी से कोई समझौता नहीं करना चाहिए। जहां यात्रा जरूरी है, वहां पाबंद करना होगा कि लोग परस्पर दूर बैठकर ही यात्रा करें। जो दफ्तर या कारखाने खुल गए हैं, उन्हें भी सावधान रहना होगा। वे तभी तक खुले रह सकते हैं, जब तक वहां परस्पर दूरी और सुरक्षा सुनिश्चित है। जहां अवहेलना हुई, जहां कोरोना का कोई संक्रमण हुआ, वहां फिर लॉकडाउन लागू हो जाएगा। देश में कोई आम हो या खास, मजदूर हो या मंत्री यदि इस अनिवार्यता का मखौल उड़ाता है, तो सरकार को समय रहते यथोचित दंड भी तय कर लेने चाहिए। कोरोना की दवा खोजे जाने तक परस्पर दूरी कायम रखना न सिर्फ नागरिक कर्तव्य, बल्कि देशसेवा भी है।556
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