01-05-2020 may editorial dictation
ऋषि कपूर का इस दुनिया से चले जाना वास्तव में भारतीय सिनेमा की
मजबूत बुनियाद से एक जरूरी ईंट का सरक जाना है। वर्ह ंहदी सिनेमा की कम से कम
तीन-चार पीढ़ियों के बीच एक सशक्त सेतु की तरह थे। बेहद खुशनुमा और सदा सक्रिय।
जितने पारंपरिक, उतने ही आधुनिक। जितने गंभीर, उतने ही खिलंदड़। जितने लोकधर्मी, उतने ही
प्रयोगधर्मी। अपने दादा पृथ्वीराज कपूर और पापा राज कपूर की दुनिया से खाद-पानी
लेकर नई दुनिया के लिए तत्पर रहने वाले ऋषि कपूर को भूलना नामुमकिन है। भारतीय
सिनेमा में उनकी छवि एक ऐसे चमकदार प्रेमी के रूप में रही, जिसने देश की कम से कम तीन पीढ़ी के प्रेमियों को प्रेरित किया।
राजेश खन्ना के सुपर स्टार दौर की स्नेहिल पुकार से होकर निकले बॉबी के
प्रेमी ने न केवल एंग्री यंगमैन के दशक को पार किया, बल्कि समांतर
सिनेमा के खुरदुरे आक्रोश भरे दशक के भी पार पहुंच गए। यह उनकी अभिनय प्रतिभा और
अथक प्रेमी की छवि का ही प्रताप था कि 1992 में वह दीवाना
में सोचेंगे तुम्हें प्यार करें कि नहीं.. गाते नजर आए और दर्शकों ने उन्हें
हाथों-हाथ लिया। हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे पर उनके जैसा आधुनिक प्रेमी दूसरा
कोई नहीं। 1970 में मेरा नाम जोकर जैसी बेमिसाल
फिल्म से शुरू हुआ यह किशोर प्रेमी 1997 में कौन सच्चा
और कौन झूठा पर आकर ही थमा, पर दूसरी एक से एक
प्यारी भूमिकाओं में उतर गया। ऋषि कपूर प्रेम को परदे पर उतारने का जुनून रखने
वाले अभिनेताओं के लिए हमेशा एक स्कूल की तरह रहेंगे। हाथों में गिटार हो या डफली, शायद ही कोई वैसे बजाता दिखेगा, जैसे ऋषि कपूर
दिखते थे।
एक प्रेमी के रूप में उनकी स्मार्टनेस हमेशा सीखने योग्य रहेगी। न जाने कितनी अभिनेत्रियों को उनके साथ फिल्मों में कदम रखने का मौका मिला। यह भी अनुकरणीय है कि जिंदगी में उनका पहला और आखिरी प्यार नीतू सिंह ही रहीं। 1970 से शुरू हुए उनके फिल्म करियर में शायद ही कुछ वर्ष ऐसे बीते, जिनमें उनकी एकाधिक फिल्में प्रदर्शित नहीं हुईं। खूब काम करते थे, दिन-रात काम करने का माद्दा था। अभिनय के अलावा कोई दूसरी कला उन्हें नहीं भाई। एक अफसोस उनके प्रेमियों को जरूर रहा कि पिता राज कपूर द्वारा स्थापित आरके फिल्म्स को वह आगे नहीं बढ़ा पाए। अपने स्तर पर आ अब लौट चलें जैसी फिल्म निर्देशित करने वाले ऋषि कपूर को कभी यह गुमान नहीं था कि वह अपने पिता की जगह लेंगे। उन्हें अपनी क्षमताओं का बेहतर अंदाजा था, वह वही करते थे, जो उन्हें ठीक से करना आता था। उनका चरित्र लगभग पारदर्शी था। आश्चर्य नहीं, उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम रखा खुल्लम खुल्ला। उनकी यह किताब उन पर रोशनी डालने के लिए अपने आप में मुकम्मल है और इसमें दादा-पापा के पेशावर की पठानी छाया भी है और मुंबई की तीखी धूप भी।
एक प्रेमी के रूप में उनकी स्मार्टनेस हमेशा सीखने योग्य रहेगी। न जाने कितनी अभिनेत्रियों को उनके साथ फिल्मों में कदम रखने का मौका मिला। यह भी अनुकरणीय है कि जिंदगी में उनका पहला और आखिरी प्यार नीतू सिंह ही रहीं। 1970 से शुरू हुए उनके फिल्म करियर में शायद ही कुछ वर्ष ऐसे बीते, जिनमें उनकी एकाधिक फिल्में प्रदर्शित नहीं हुईं। खूब काम करते थे, दिन-रात काम करने का माद्दा था। अभिनय के अलावा कोई दूसरी कला उन्हें नहीं भाई। एक अफसोस उनके प्रेमियों को जरूर रहा कि पिता राज कपूर द्वारा स्थापित आरके फिल्म्स को वह आगे नहीं बढ़ा पाए। अपने स्तर पर आ अब लौट चलें जैसी फिल्म निर्देशित करने वाले ऋषि कपूर को कभी यह गुमान नहीं था कि वह अपने पिता की जगह लेंगे। उन्हें अपनी क्षमताओं का बेहतर अंदाजा था, वह वही करते थे, जो उन्हें ठीक से करना आता था। उनका चरित्र लगभग पारदर्शी था। आश्चर्य नहीं, उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम रखा खुल्लम खुल्ला। उनकी यह किताब उन पर रोशनी डालने के लिए अपने आप में मुकम्मल है और इसमें दादा-पापा के पेशावर की पठानी छाया भी है और मुंबई की तीखी धूप भी।
बेशक, पारिवारिक, अर्थपूर्ण, मनोरंजक, बहुसितारा फिल्मों की वह जान थे। हर भूमिका में सहजता से उतर जाने वाले ऋषि कपूर को प्रेमी, भाई, दोस्त, पति और चरित्र कलाकार के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। इस दुनिया से उनकी विदाई हुई है, लेकिन रुपहले परदे पर तो वह हमेशा रहेंगे और उनके दीवानों का दिल यही गुहार लगाता रहेगा, डफली वाले डफली बजा...।
1528 में मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद
बनाई। 307 साल बाद 1885 में मामला पहली बार
फैजाबाद अदालत पहुंचा। इसके 125 साल बाद 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहला बड़ा फैसला दिया। इसे चुनौती देने
वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज फैसला सुनाया। इस फैसले से जुड़ी प्रमुख
बातें क्या हैं, हिंदू-मुस्लिम पक्ष को इससे क्या मिला, सरकार की क्या भूमिका होगी और क्या इस फैसले से यह माना जाए कि
अयोध्या विवाद का आखिरकार अंत हो गया,
देश में
पिछले शनिवार से एक अजीब माहौल है। सड़क पर चल रहा, पार्क में टहल रहा, बस-ट्रेन में सफ़र कर रहा या कैफे में
बैठा हर व्यक्ति एक ही चर्चा कर रहा है और अंत में कह रहा है कि ‘यह मोदी ही कर सकते हैं’। सुप्रीम कोर्ट के उन पांच महान जजों
का, जिनमें
जस्टिस अब्दुल नजीर भी हैं, गीता के ‘निष्काम कर्मयोगी’ के भाव में दिया गया फैसला दुनिया के
न्यायशास्त्र में एक नजीर बनेगा।
इतने जटिल मुद्दे पर इतिहास में
श्रेय लेने की ललक के प्रति स्पृहा-शून्य होकर इस ऐतिहासिक फैसले को सर्वसम्मति से
लिखना जन-विमर्श से बाहर है। यह फैसला भारत में ही नहीं, विश्व-शांति के लिए अनुकरणीय पैगाम
है। दुनिया के न्यायविदों के लिए यह ‘सर्वसम्मति’ भी एक पहेली रहेगी। एक-दूसरे के
विरोधी अपुष्ट प्रमाणों, तार्किक
दोषों और संवैधानिक नैतिकता-बनाम ऐतिहासिक गलतियों के द्वंद्व से निकला यह फैसला
उस सागर-मंथन की तरह था, जिसमें
अमृत भी निकला और विष भी।
तात्कालिक भविष्य के विश्लेषक
और आने वाली पीढ़ियां कई दशकों तक इस फैसले का विभिन्न कोणों से चीर फाड़ करेंगी।
लेकिन, जजों ने
सहमति ही नहीं दिखाई, बल्कि
अलग-अलग फैसले न देकर गुमनामी का भाव लेते हुए शिव की तरह विष धारण किया। फैसला 926 पृष्ठों का है और अंत में सभी जजों के
हस्ताक्षर। यहां तक कि इसके बाद एक जज ने 116 पृष्ठ का अलग, लेकिन समान फैसला तो दिया परंतु उसे
केवल संलग्नक के रूप में फैसले में शामिल किया गया और उस पर कोई हस्ताक्षर भी नहीं
है। यह अलग बात है कि अनजाने में लोग ‘मोदी है तो मुमकिन है’ के भाव में श्रेय प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी को दे रहे हैं।
गलत श्रेय देने से मोदी की
गरिमा को ठेस ही लगेगी। बहरहाल इस मुफ्त के श्रेय के पीछे की पृष्ठभूमि में कुछ ही
महीने पहले सरकार द्वारा एक अन्य विवादास्पद मुद्दे अनुच्छेद 370 काे हटाया जाना है। ऐसे समय में जब
मूडीज सहित तमाम मकबूल संस्थाओं ने भारत की आर्थिक स्थिति पर चिंता व्यक्त की है
और सभी सरकारी व स्वतंत्र रिपोर्टें बढ़ते बेरोजगारी के आंकड़ों की पुष्टि कर रही
हैं, यह फैसला
और मोदी के प्रति जन-सकारात्मकता राजनीतिशास्त्र के सभी स्थापित सिद्धांतों को गलत
साबित कर रही है। भारत जैसे देश में यह एक ‘भावना और भोगे यथार्थ’ के बीच का द्वंद्व है। जैसे-जैसे राम
मंदिर का स्वरूप उभरेगा या उभारा जाएगा, वैसे-वैसे यथार्थ के ऊपर भावना हावी
होती जाएगी।998
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