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देश की सामाजिक, राजनीतिक और
प्रशासनिक जटिलताओं के बीच ग्राम पंचायतें अपनी एक अलग भूमिका निभाती रही हैं। हर
ग्राम पंचायत की अपनी एक राजनीति होती है, और अपनी ही
समस्याएं। सैद्धांतिक रूप से हम भले इन ग्राम पंचायतों को देश के लोकतंत्र की
आधारभूत इकाई मानते हों और उनसे बड़ी उम्मीदें भी बांधते हों, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हमें उनकी याद साल में एक बार 24 अप्रैल को ही आती है, जब पंचायती राज दिवस आता है। आम तौर पर यह दिवस शुभकामना
संदेशों, कुछ सरकारी योजनाओं की घोषणा और पंचायतों
की भूमिका के यशोगान जैसी औपचारिकताओं के साथ ही बीत जाता है। लेकिन इस साल
पंचायती राज दिवस ऐसे मौके पर पड़ा, जब देश एक
अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। ऐसे में, इस दिवस ने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह मौका दे दिया कि वे न सिर्फ इस मुद्दे पर ग्राम
पंचायतों से सीधा संवाद बनाएं, बल्कि कोरोना वायरस
के खिलाफ चल रही लड़ाई के लिए उन्हें तैयार भी करें। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर
देश की ढाई लाख ग्राम पंचायतों के सरपंचों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जो बात
की, उस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस लड़ाई को
गांव के स्तर पर शुरू किया जा सकता है।
कोरोना वायरस के संक्रमण के शुरुआती डेढ़-दो महीनों में इसका ज्यादातर विस्तार महानगरों और छोटे-बडे़ शहरों में हुआ है। लेकिन तमाम पाबंदियों और लॉकडाउन के बावजूद जिस तेजी से यह फैल रहा है, उसमें यह खतरा हमेशा बना हुआ है कि यह वायरस संक्रमण किसी भी समय ग्रामीण क्षेत्रों में भी पहुंच सकता है। यही एक ऐसी आशंका है, जो केंद्र व राज्य सरकारों और पूरे चिकित्सा जगत को परेशान कर रही है। संक्रमण के ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचने का अर्थ होगा, देश की 70 फीसदी आबादी पर खतरे का मंडराना। गांवों में अभी भी मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं बहुत नहीं हैं। कम से कम इतनी तो कहीं नहीं है कि वहां कोविड-19 के मरीज की पूरी देखभाल हो सके। शहरी अस्पताल वहां से बहुत दूर हैं और वे पहले ही काफी दबाव में हैं। ऐसे हालात में ग्राम पंचायतें अहम भूमिका निभा सकती हैं। खासकर कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए। प्रधानमंत्री के संबोधन ने उन्हें यह भूमिका सौंपने की शुरुआत कर दी है। प्रधानमंत्री अच्छी तरह जानते हैं कि गांव वालों को ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ जैसी शब्दावली में नहीं समझाया जा सकता, इसलिए उन्होंने ‘दो गज की दूरी’ जैसी शब्दावली का इस्तेमाल किया। इसमें राज्य सरकारों और प्रशासन के लिए यह संदेश छिपा है कि गांवों से संवाद बनाने के लिए उन्हें उन्हीं की भाषा को अपनाना होगा।
इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने एक और महत्वपूर्ण बात यह कही है कि कोरोना संकट ने एक सबसे बड़ा सबक यह दिया है कि अब हमें आत्मनिर्भर बनना होगा, बिना आत्मनिर्भर बने इस तरह के संकटों का मुकाबला नहीं हो सकता। राष्ट्रीय स्तर पर हमने पिछले चंद रोज में ही यह देख लिया है कि चिकित्सा सामग्री के मामले में विदेशी बाजारों पर निर्भरता कितनी तरह की समस्याएं खड़ी कर सकती है। प्रधानमंत्री ने यह बात ग्राम पंचायतों से कही है, इसलिए इसका यह अर्थ भी लगाया जाएगा कि उनका संकेत गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की ओर भी है, खासकर चिकित्सा सुविधा के मामले में। अगर सचमुच ऐसा हो सका, तो यह एक बहुत बड़े बदलाव की शुरुआत होगी।539
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